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जलवायु पर भी असर डालता है फैशन

  • बबीता भंडारी
    परिधानों ने हमेशा पर्यावरणीय परिस्थितियों से शरीर की रक्षा करने से कहीं अधिक काम किया है। एक विशेष समय का फैशन उसकी सामाजिक मानसिकता, आर्थिक स्थिति, पर्यावरणीय स्थिति, राजनीतिक मामलों, तकनीकी प्रगति इत्यादि को दर्शाता है। इतिहास के दौरान फैशन किसी भी समाज में परिवर्तन का मानचित्रण करने में एक प्रभावी उपकरण साबित हुआ है। औद्योगिक क्रांति के बाद पावरलूम के उच्च उत्पादन स्तर, भारत और अन्य विकासशील देशों में सस्ते उपलब्ध श्रम और वस्त्र बनाने के लिए सिंथेटिक सामग्री की आसान उपलब्धता के कारण कपड़ा उद्योग कई गुना बढ़ गया है। हालांकि कई रंगों में अंतहीन डिजाइन विकल्पों के साथ सस्ते में उपलब्ध कपड़ों का अपना नुकसान है।
    संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 25 खरब डॉलर का फैशन उद्योग वैश्विक अपशिष्ट जल का करीब 20 फीसदी उत्पादन करता है और अपनी लंबी आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा गहन उत्पादन के कारण वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत योगदान देता है इसके साथ ही मैकिसे के एक अध्ययन के अनुसार, हर साल पांच नए कपड़ों के उत्पादन के पीछे तीन कपड़ों के बराबर सामग्री चर्चाद हो जाती है। शोध के अनुसार, हमारे 90 फीसदी कपड़े जरूरत से पहले ही फेंक दिए जाते हैं। फैशन के अंधाधुंध उत्पादन और खपत ने एक खतरनाक स्थिति पैदा कर दी है, जैसा कि आंकड़ों से स्पष्ट है।
    हाल के कुछ वर्षों में, फैशन का कुछ गैर- संवेदनशील फैशन लेबलों द्वारा डिस्पोजेबल वस्तु के रूप में विपणन किया जा रहा है। आम आदमी अक्सर फैशन को दुनिया के चमकदार ग्लैमर पक्ष से मोहित और प्रभावित हो जाता है। फैशन के दिखावे के पीछे की सच्चाई अब भी आम आदमी से छिपी हुई है। आम आदमी कभी-कभी बाजार में आए फैशन का आंख मूंदकर अनुसरण करता है, वह जाने बिना कि फैशन ट्रैड्स आते हैं और चले जाते हैं और कुछ ट्रेड्स एक सीजन तक भी नहीं टिकते, जो पुनः एक चिंताजनक स्थिति पैदा कर रहा है। इसलिए उपभोक्ता के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वह अपने निर्णय के बारे में जागरूक हो कि क्या और कितना कपड़ा खरीदना है।

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