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हिंदुस्तानी संगीत के विख्यात संगीतकार पंकज मलिक

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वर्ष 1915 के आसपास का वक्त। कलकत्ते के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए पंकज को संगीत का जुनून था। बालक हारमोनियम के साथ सुर साधना चाहता था। उसने अपने पिता से हारमोनियम मांगा, मगर पिता ने हंसकर हारमोनियम की मांग टाल दी। उधर पंकज को तो जैसे संगीत का सुरूर चढ़ा हुआ था। उसके पड़ोस में शैलेंद्रनाथ घोष रहते थे। घोष बाबू भी संगीत के शौकीन थे, पर नौकरी का चक्कर उनसे उनका घर छुड़वाकर उन्हें इराक ले गया था।

इराक जाने से पहले घोष बाबू अपने घर की चाबी पंकज के पिता को दे गए थे। एक दिन पंकज घोष बाबू के घर पहुंचा, तो उसे वहां हारमोनियम दिखा। हारमोनियम देखते ही उसकी बाछें खिल गईं, पर साथ में पिता थे तो उस वक्त वह शांत रहा। उसके बाद तो जब भी पंकज के पिता घर से बाहर होते, या उसे डांट पडऩे का डर न होता, वह चुपके से घोष बाबू के घर की चाबी उठाता, ताला खोलता, अंदर से सिटकनी लगाता और जब तक उसे दिल को तसल्ली ना हो जाती, वह उल्टा-सीधा, कैसे भी करके हारमोनियम बजाता रहता। इस तरह से चोरी-चोरी पंकज का रियाज तब तक चलता रहा, जब तक कि घोष बाबू इराक से वापस नहीं लौट आए।

घोष बाबू आए तो पंकज ने अपनी चोरी उनके सामने रखी। घोष बाबू ने उसे हारमोनियम बजाकर सुनाने के लिए कहा। पंकज ने हारमोनियम बजाया। इतने पक्के सुर सुनकर घोष बाबू हक्के-बक्के रह गए। खुश होकर उन्होंने हारमोनियम पंकज को दे दिया, और भविष्यवाणी की कि यह बालक आगे चलकर महान संगीतकार बनेगा।

घोष बाबू की भविष्यवाणी सही निकली। यह बालक था पंकज मलिक, जो आगे चलकर हिंदुस्तानी फिल्मों के शुरुआती दौर का सबसे विख्यात संगीतकार बने। किसी ने सच ही कहा है कि पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।

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