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कर्नाटक उच्च् न्यायालय की निकाह की व्याख्या और हिन्दू विवाह पर टिप्पणी

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श्रुति का वचन है- दो शरीर, दो मन और बुद्धि, दो हृदय, दो प्राण व दो आत्माओं का समन्वय करके अगाध प्रेम के व्रत को पालन करने वाले दंपति । यह कभी ना टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक यज्ञ है। विवाह में दो प्राणी (वर-वधू) अपने अलग अस्तित्वों को समाप्त कर, एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं।

  • डॉ. मयंक चतुर्वेदी, फिल्म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य एवं पत्रकार
    mayankchaturvedi004@gmail.com

कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा मुस्लिमों के निकाह पर की एक बड़ी टिप्पणी ने फिर से इस ओर सभी का ध्यान खींचा है। न्यायालय से बहुत ही साफ शब्दों में कहा है कि मुस्लिम निकाह एक अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) है, जिसके कई अर्थ हैं, यह हिन्दुओं की शादी की तरह कोई संस्कार नहीं है।

वस्तुत: जब यह निर्णय आया, तब अनेक का ध्यान इस मामले की ओर गंभीरता से गया कि दोनों धर्मों में दुनिया की आधी आबादी स्त्री को लेकर क्या सोच है । विवाह के संस्कार नहीं होने से कैसे इस्लाम में आज भी महिलाएं तलाक शब्द सुनते ही कैसे परेशान होने पर विवश हैं। इसका यह एक नहीं अब तक के अनेकों उदाहरण हमारे सामने हैं। यही वो कारण भी रहा, जिसके चलते मोदी सरकार साल 2019 में ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाने के लिए बाध्य हुई थी। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक कानून बनने के बाद से अब तक देश में ट्रिपल तलाक के मामले 80 प्रतिशत तक कम हुए हैं । फिर भी यह एक संकट तो है ही।

इस्लाम के विशेषज्ञों का भी यही कहना है कि निकाह एक शादी का क़ानूनी अनुबंध है या कहें कि जो दूल्हे और दुल्हन के बीच एक कऱार नामा है। इस्लामी समाज में ब्रहमचर्य स्वीकार्य नहीं, सभी को निकाह करने का आदेश दिया गया है (कुरान 24:32)। पैगम्बर मोहम्मद ने हदीस में भी निकाह करने का आदेश दिया है। मोहम्मद जी ने कहा है कि निकाह मेरी सुन्नत (तरीका) है, जो मेरी सुन्नत से कतराता है वह हम में से नहीं है। इस तरह से निकाह को ‘निकाह-मिन-सुन्नह या सुन्नत तरीक़े से किया गया निकाह कहते हैं।

अभी आए न्यायालय के निर्णय से पूर्व अब्दुल कादिर बनाम सलीमा के वाद में विवाह की परिभाषा देते हुए न्यायाधीश महमूद ने भी कहा था मुस्लिमों में विवाह शुद्ध रूप से एक सिविल संविदा है, यह कोई संस्कार नहीं है। इसी तरह से एक अन्य प्रकरण सबरूनिशा बनाम सब्दू के वाद में न्यायाधीश मित्तर ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का निर्णय देते हुए मुस्लिम विवाह को विक्रय संविदा के समान एक सिविल संविदा कहा है।


श्रुति का वचन है- दो शरीर, दो मन और बुद्धि, दो हृदय, दो प्राण व दो आत्माओं का समन्वय करके अगाध प्रेम के व्रत को पालन करने वाले दंपति। यह कभी ना टूटने वाला एक परम पवित्र धार्मिक यज्ञ है। विवाह में दो प्राणी (वर-वधू) अपने अलग अस्तित्वों को समाप्त कर, एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। सनातन धर्म विवाह को एक पवित्र-संस्कार के रूप में स्वीकारता है।

वस्तुत: यहां जब दोनों ही पक्ष सभी तरह से संतुष्ट हो जाते हैं तभी इस विवाह को किए जाने के लिए शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। इसके बाद वैदिक पंडितों के माध्यम से विशेष व्यवस्था, देवी पूजा, वर वरण तिलक, हरिद्रालेप, द्वार पूजा, मंगलाष्टकं, हस्तपीतकरण, मर्यादाकरण, पाणिग्रहण, ग्रंथिबन्धन, प्रतिज्ञाएं, प्रायश्चित, शिलारोहण, सप्तपदी, शपथ आश्वासन आदि रीतियों को करते हुए इस संस्कार को पूर्णता प्रदान की जाती है। सात बार वर-वधू साथ-साथ सात चावल की ढेरी या कलावा बँधे हुए सकोरे इन लक्ष्य-चिह्नों को पैर लगाते हुए एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। प्रत्येक कदम के साथ एक-एक मन्त्र बोला जाता है।

पहला कदम अन्न के लिए, दूसरा बल के लिए, तीसरा धन के लिए, चौथा सुख के लिए, पाँचवाँ परिवार के लिए, छठवाँ ऋतुचर्या के लिए और सातवाँ मित्रता के लिए उठाया जाता है। दाम्पत्य जीवन में दोनों का ही बराबर का योगदान रहे, इसकी रूपरेखा यह सप्तपदी निधार्रित करती है। विवाह में सुन्दर कामना लिए यह श्लोक कुछ इस तरह के होते हैं- इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती, प्रजयौनौ स्वस्तकौ विस्वमायुर्व्यऽशनुताम् ॥ अर्थात, हे भगवान इंद्र !

आप इस नवविवाहित जोड़े को इस तरह साथ लाएं जैसे चक्रवका पक्षियों की जोड़ी रहती है, वे वैवाहिक जीवन का आनंद लें, और ये संतान की प्राप्ति के साथ-साथ एक पूर्ण जीवन जिएं। फिर कहा जाता है कि धर्मेच अर्थेच कामेच इमां नातिचरामि. धर्मेच अर्थेच कामेच इमं नातिचरामि॥ यानी कि मैं अपने कर्तव्य में, अपने धन संबंधी विषयों में, अपनी जरूरतों में, मैं हर बात पर जीवन साथी से सलाह लूंगा।

इसके बाद बोला गया, गृभ्णामि ते सुप्रजास्त्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथास:. भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यांत्वादु:गार्हपत्याय देवा: ॥ मैं तुम्हारा हाथ पकड़े रखूंगा ताकि हम योग्य बच्चों के माता-पिता बन सकेंगे और हम कभी अलग न होवें। मैं इंद्र, वरुण और सवितृ देवताओं से एक अच्छे गृहस्थ जीवन का आशीर्वाद मांगता हूं। फिर परस्पर कहा गया कि ससखा सप्तपदा भव. सखायौ सप्तपदा बभूव. सख्यं ते गमेयम सख्यात् ते मायोषम सख्यान्मे मयोष्ठा: – तुम मेरे साथ सात कदम चल चुके हो, अब हम मित्र बन गए हैं।

इस केस में भी जस्टिंग कृष्णा एस दीक्षित की कहीं सभी बातें आज फिर से यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हिन्दू विवाह का अर्थ बहुत व्यापक है। काश, इस निकाह, तलाक और विवाह को लेकर ही यह विचार शुरू हो जाए कि देश में अल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यक कानून क्यों होने चाहिए। धर्म के आधार पर अलग-अलग नियम क्यों व समानता के लिए इस देश को कब तक इंतजार करना होगा।

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