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अमर आत्मा का अस्तित्व

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प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

भारतीय अध्यात्म दर्शन में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के पश्चात होने वाली घटनाओं के बारे में कई सिद्धांत दिए गए हैं।कठोपनिषद मेंयम और नचिकेता के बीच संवाद के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार किया गड्डया है। इस संभाषण में आत्मा के अस्तित्व का भी वर्णन है। क्या शरीर की समाप्ति के बाद आत्मा का कोई अस्तित्व होता है? कठोपनिषद में कहा गया है:
‘नजायतेम्रियतेवाविपश्र्चिन्नायंकुतश्र्चिन्नबभूवकश्र्चित्।
अजोनित्य:शाश्वतोऽयंपुराणोनहन्यतेहन्यमानेशरीरे॥

अर्थात, ‘विभिन्न प्रकार के ज्ञान से परिपूर्ण यह ज्योतिर्मय आत्मा न तो जन्म लेती है और न ही नष्ट होतीहै। इस आत्मा का कोई रचयिता नहीं है। यह अजात, चिरस्थायी, अमर और प्राचीन है। साथ ही, यह ‘हन्यमान है, अर्थात यह एक नाशवान देह में मौजूदतो अवश्य है;किन्तु जब यह देह नष्ट हो जाती है, तब भी यह आत्मा नष्ट नहीं होती (कठोपनिषद 2/18)।
आत्मा की अमरता और अविनाशिता पर प्रकाश डालते हुए उपनिषद में कहा गया है,
‘हन्ताचेन्मन्यतेहन्तुंहतश्र्चेन्मन्यतेहतम्।
उभौतौनविजानीतोनायंहन्तिनहन्यते॥

अर्थात ‘अगर कोई नाशक मानता है कि ‘मैंने इस आत्मा को मारा है या अगर आत्मा मानती है कि ‘मुझे किसी ने मारा हैÓ, तो दोनों गलत हैं, भ्रमित हैं। आत्मा न किसी का वध करती है और न किसी के द्वारा नष्ट की जा सकती है (कठोपनिषद 2/19)।
संयोगवश, इसी सिद्धांत को भगवदगीता में भी दोहराया गया है, जिसमें कहा गया है,
‘न जायतेम्रियतेवाकदाचिन्नायंभूत्वाभवितावा न भूय:।
अजोनित्य:शाश्वतोऽयंपुराणो न हन्यतेहन्यमानेशरीरे॥(गीता 2/20)।
‘य एनंवेत्तिहन्तारंयश्र्चैनंमन्यतेहतम।
उभौतौ न विजानीतोनायंहन्ति न हन्यते॥ (गीता 2/19)।

आत्मा की इस विशेषता की व्याख्या करते हुए, इस उपनिषद में आत्मा, देह, बुद्धि, मन और इंद्रियों की विशिष्ट पहचान को स्पष्ट रूप से समझाने के लिए एक रथ और उसके चालक की उपमा का प्रयोग किया गया है।
‘आत्मानंरथिनंविद्धिशरीरंरथमेवतु।बुद्धिंतुसारथिंविद्धिमन:प्रगहमेवच॥
इन्द्रियाणिहयानाहुॢवषयांस्तेषुगोचरान्?।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तंभोक्तेत्याहुर्मनीषिण:॥

अर्थात,’यह देह रथ है, और यह आत्मा इसका स्वामी है। बुद्धि इसकी चालक है; मन उसकी लगाम है। इंद्रियां रथ को आगे खींचने वाले घोड़े हैं। दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श आदि के विषय इसके मार्ग हैं। अत:आत्मा सांसारिक सुखों का आनंद लेने के लिए इंद्रियों और मन का संसाधन के रूप में उपयोग करती है। (कठोपनिषद 3/3-4)।
इन सभी के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए उपनिषद में कहा गया है कि स्वामी,इन सभी से अर्थात रथ, चालक, घोड़े, लगाम, पथ और अन्य सभी वस्तुओं से भिन्न है, और इसीलिए रथ का मालिक कहा जाता है। इसी प्रकारआत्मा, बाकि सबसे अर्थात शरीर, मन, इंद्रियों और अन्य सभी से पूरी तरह अलग है, और उन सभी कीस्वामी है। यह सादृश्य स्पष्ट रूप से आत्मा के अस्तित्व, उसकी अमरता, उसकी अपरिवर्तनीय प्रकृति, देह से उसके अलगाव और उसकी अन्य विशेषताओं का वर्णन करता है।

इसका परिणाम यह है, कि बाल्यावस्था, यौवन, वृद्धावस्था, स्थूलकायता या दुर्बलता, जन्म और मृत्यु जैसी विशेषताएँ या घटनाएँ, ये सब शरीर के सभी पहलू हैं; इसलिए उन्हें कभी भी ‘आत्मा नहीं समझा जाना चाहिए। दूसरी ओर, अविनाशी या अक्षय होना, कभी वृद्ध न होना, अमरत्व प्राप्त करना, आनंदित होना, या शाश्वत और बाहरी अस्तित्व की प्रबलता होनाआत्मा के ही पहलू हैं; उन्हें कभी भी, किसी भी प्रकार से शरीर से संबंधित नहीं माना जाना चाहिए। इस प्रकार मृत्यु (नश्वर देह की मृत्यु) के बाद भी आत्मा का कभी नाश नहीं होता; वह सदैव अस्तित्व में होती है, अमर होती है।

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