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सच्चिदानंद से ही अस्तित्व

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प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

जिस प्रकार अग्नि की ज्वाला से अनेक प्रकार की असंख्य चिंगारियां निकलती हैं, उसी प्रकार अविनाशी-अमर शक्ति से भिन्न प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं और जन्म लेते हैं। उनमें अपनी विशिष्टताओं के अतिरिक्त ‘सर्वोच्च शक्तिÓ का सार भी है। इसलिएप्रत्येक व्यक्ति मेंशाश्वत मूल्य होते हैं जो विशेष और स्थायी होते हैं;और साथ ही होते हैं कुछ सापेक्ष मूल्य, जो केवल उनके लिए विशिष्ट होते हैं। वह गुण जो प्रत्येक व्यक्ति में वास्तविक है, वह सभी में एक ही प्रकृति और सार का है;लेकिन जो उस व्यक्ति के लिए विशेष है, मात्र वही विशिष्ट है।

सभी अपने-अपने सार में समान हैं, लेकिन हर कोई अपने विचार और तद्पश्चात निर्णय और कर्म में भिन्न हैं। इसकी उपयुक्त उपमा वृक्षों से समझाई जा सकती है। सभी वृक्षों की जड़ें पृथ्वी में होती हैं,मात्र पृथ्वी द्वारा पोषित होती हैं और पृथ्वी से उत्पन्न भोजन पर ही निर्भर रहती हैं; लेकिन फिर भी, हर एकवृक्ष अपने रूप या बाहरी विकास में एक दूसरे से भिन्न होता है। इसी प्रकार अलग-अलग व्यक्ति सार्वभौमिक सर्वोच्च शक्ति के सामान्य सार में निहित तो हैं, लेकिन उनके सतही स्वभाव उनके व्यक्तित्व के लिए विशिष्ट हैं। इसके पश्चात, जो तत्व अच्छे को बुरे से अलग करता है, वह है इस सार की अनुभूति। जो इस सार की खोज करने में सफल हो जाते हैं, वे सत्कर्मऔर धर्म के मार्ग पर अग्रसर होते हैं; किन्तु जो इसे समझ नहीं पाते, वे सदैव खण्डन करते हुए, हर पक्ष को अस्वीकार करते हुए भ्रममें जीते हैं।


परिणामस्वरूप,व्यक्ति अपने आप में विशिष्ट प्रकृति की चेतना को सभी व्यक्तित्वों मं् अंतर्निहित सामान्य सार की चेतना में अवशोषित करता है। सीमित चेतना के इस अवरोध को नष्ट करना ही पूर्णता प्राप्त करने की ओर पहला कदम है। देह और मन-मस्तिष्कसे ही हमारे अस्तित्व में सार आता है, हम भेद कर पाते हैं और इसके बिना हम कुछ अनुभव नहीं कर सकते। योग से व्यक्ति इस अंतर से परे जा कर परम चेतना प्राप्त कर सकता है। सभी व्यक्ति एक अनंतउद्देश्यों में निहित एक सर्वोच्च उद्देश्य हेतु ही जन्म लेते हैं, उसी के तहत जीते हैं और अंत में उसी में समाहित हो जाते हैं।

चूंकि सभी निर्मित वस्तुएं या तत्व अंतत: इस ब्रह्माण्ड मेंलुप्त हो जाती हैं, वैसे ही सभी व्यक्ति भी अंतत: अपने मूल स्रोत परएक समान स्थिति में, अपनी विशिष्टता और व्यक्तित्व को त्यागते हुए लौट जाते हैं और लुप्त हो जाते ।
नाम और आकर, रूप और धारणा के ब्रह्मांड का गठन करते हैं, जबकि ‘सच्चिदानंद से वास्तविकता का गठन होता हैं। सच्चिदानंद के प्रतिबिंब के कारण नाम और आकर वास्तविक प्रतीत होते हैं। ‘पुरुष दिव्य, निराकार, भीतर और बाहर विद्यमान, अजन्मा, प्राण और मन से मुक्त, पवित्र और अव्यक्त से भी महान है।

‘पुरुष वह है जो सार्वभौमिक है और प्रकृति में दिव्य है। यह अजात है और अजन्मा है क्योंकि यह अकारण है और इसका कोई उद्देश्य नहीं, और यह जीवन और उसके अनुभवों जैसी किसी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है न ही उन प्रक्रियाओं से गुजरता है। विराट, हिरण्यगर्भ और ईश्वर की प्रकृति ‘पवित्र चेतना की है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो व्यक्ति की विशेष विशेषता से संबंधित हो। हिरण्यगर्भ और विराट के बीच कोई अंतर नहीं है सिवाय इसके,विराट वह तरीका हैजिसमें हिरण्यगर्भ उद्देश्यों से परिपूर्ण, अनुभव के ब्रह्मांड के रूप में मौजूद है।

कभी-कभी लोगों को आश्चर्य होता है कि इस विराट को मानव या अन्य रूपों में क्यों दर्शाया गया है। विराट का कुछ चरित्रों और रूपों में वर्णन होना मात्र सार्वभौमिक प्रकृति की स्पष्ट समझ को सुविधाजनक बनाने के लिए है, जिसे एक व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान के साथ नहीं समझ सकता है। निराकार को समझना और स्वयं और अन्य में सार की खोज करना व्यक्ति को सभी से मुक्त कर देगा। यह भ्रम, क्रोध, घृणा और ऐसी अन्य नकारात्मकताओं से मुक्ति देता है जिसकी हमें खोज है।

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