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धरोहरों को सहेजना सबका काम

  • शिवकुमार विवेक
    विश्व विरासत दिवस पर हर साल हम अपनी धरोहर की चिंता में बहुत से शब्द खर्च करते हैं। ऐसा अक्सर बहुत सी जयंतियों, पुण्यतिथियों और दिवसों पर होता है। सभाओं और सम्मेलनों में हमारा वातूनी-सूचकांक काफी ऊंचा है। उसके बाद वही ढाक के तीन पात। इसलिए बहुत से ढकोसले भी हमारी विरासत का हिस्सा हैं। इनमें से यदि एक प्रतिशत पर भी सार्थक काम हो जाए तो देश का कायाकल्प हो सकता है। यद्यपि देश में धरोहरों की संरक्षा के लिए काफी काम हाल के वर्षों में देखा जा रहा है। हम कह सकते हैं कि कुछ समय से इसमें ज्यादा ही तेजी आई है। सरकार के स्तर पर कुछ क्षेत्रों में काफी सक्रियता दिखाई गई है जिसमे विदेश ले जाई गईं मूर्तियों को लौटाने का काम एक है। हाल में प्रकाशित समाचार में मध्यप्रदेश की नर्मदा परिक्रमा और इंदौर की रंगपंचमी की गेर को विश्व विरासत सूची में शामिल करवाने की कोशिश जैसे काम भी इस क्रम में गिने जा सकते हैं। लेकिन इस देश की विरासत जितनी विस्तीर्ण, व्यापक और समृद्ध है उसके मुकाबले यह काम ऊंट के मुंह में निवाला जैसा है और ज्यादा बड़े पैमाने पर काम करने की आवश्यकता है।
    भारत दुनिया का शायद इकलौता देश है जिसमें इतनी बड़ी तादाद में प्राचीन धरोहरें मौजूद हैं। इसकी वजह इस देश की प्राचीनता है। भारत की संस्कृति और सभ्यता ने सदैव किसी न किसी निर्माण या रचनात्मकता पर जोर दिया है जिसकी वजह से हर कालखंड में यहां अनुपम कृतियों की रचना हुई है। वह चाहे कला का क्षेत्र हो, संस्कृति हो या अन्य क्षेत्र। पच्चीकारी या शिल्प का कौशल सरकारों से ज्यादा समाज ने विकसित किया था। मूर्तियां, मंदिर और किले सत्ता ने खड़े किए। कला को दोनों ने अपने-अपने स्तर पर या संयुक्त रूप से सहेजा। यह सब इतना विस्तृत है कि हर कोस पर हमें कोई न कोई परंपरागत चीज मिलती है। यहां मूर्तियों की तो इतनी प्रचुरता रही है कि गांव-गांव में लाखों मूर्तियां या तो घरों की दीवारों में चुनी गई या किसी पुल के स्तंभ में इनका उपयोग कर लिया गया। पुरातत्व विभाग इनका ब्योरा तक रखने में असमर्थ रहा है, उन्हें सहेजने की बात तो दूर।
    हाल में भारत के महालेखा परीक्षक व नियंत्रक वर्ष 2021 के प्रतिवेदन में मध्यप्रदेश के ऐसे अनेक पुरातत्व स्थलों को गिनाया गया है जिनकी कोई देखरेख नहीं हो पा रही है। इसके अलावा अनेक महत्वपूर्ण स्मारक अनधिकृत कब्जे में हैं। इसमें बताया गया है कि प्रदेश के पुरातत्व विभाग के पास वार्षिक रखरखाव के लिए कोई नीति ही नहीं है। वार्षिक संरक्षण योजनाएं तैयार नहीं की जा रही हैं और समय-समय पर निरीक्षण तक नहीं किया जा रहा है। संग्रहालयों में कई कृतियां खुले में पड़ी हैं या अकुशल रखरखाव की शिकार है। संग्रहालय प्रबंधन का नितांत अभाव है। कलाकृतियों के भौतिक सत्यापन की कोई प्रणाली नहीं है। 8 संग्रहालयों की 2649 कलाकृतियां असुरक्षित अवस्था में फर्श पर पड़ी पाई गईं। 12290 कलाकृतियों की चोरी की आशंका है। इसे अगर हम व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो यह केवल मप्र की स्थिति नहीं है बल्कि देश के सभी हिस्सों में यही हाल दिखाई देगा। इसके लिए राज्य सरकारों की उदासीनता या उनके तंत्र में जवाबदेही का अभाव या उसकी ठीक निगरानी की कमी तो है ही, समाज का उत्तरदायित्व की भावना से वंचित होना भी एक कारण है। पुरातत्व के प्रति समाज में अपेक्षित जागरूकता या जवाबदारी का नितांत अभाव है। लोग खुद पुरातात्विक महत्व की जगहों पर कब्जा कर बैठे हैं या उन्हें विरूपित करते हैं। ऐसा दो कारणों से होता है-या तो वे इसके प्रति अज्ञानता रखते हैं या अपनी जरूरत के लिए इसका उपयोग करने में कोताही नहीं करते।
    पिछले वर्ष मप्र के विदिशा जिले के उदयपुर कस्बे के मंदिरों और मूर्तियों को एक निजी कब्जे से मुक्त कराया गया। यह काम किसी सरकार के भरोसे नहीं हुआ अपितु कुछ लोगों ने इस दिशा में मुहिम शुरु की जिसके फलस्वरूप स्थानीय व्यक्ति को अपना बेजा कब्जा छोड़ना पड़ा और प्रशासन को संरक्षण के लिए आगे आना पड़ा। उदयपुर जैसी हजारों जगहों पर आम लोगों का एक सा रवैया है। यद्यपि धरोहर को कब्जाने या विरुपित करने का काम चंद लोग करते हैं किंतु बाकी गांव या कस्बा मौन साधकर देखता रहता है क्योंकि उसे आगे आने पर कोई समर्थन या सहयोग नहीं मिलता। न समाज का, न प्रशासन का। प्रशासन के लिए यह सबसे अंतिम प्राथमिकता होती है।
    ऐसे में जरूरी यह है कि धरोहर के प्रति स्थानीय समाज को सुशिक्षित और सचेत किया जाए। जब तक उसे इस काम से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक उसका इसके प्रति अपनत्व का बोध पैदा नहीं होगा। नौकरशाही की दिक्कत यह है कि समाज को जोड़ने वाली किसी भी पहल को प्रशासनिक अधिकारी एक बोझ की तरह समझते हैं। उनकी अरुचि से अक्सर लोगों की समितियों में ऐसे लोग प्रभावी हो जाते हैं जिनके अपने निहित स्वार्थ होते हैं। इससे जनता की भागीदारी का विचार ही विफल हो जाता है। कायदे से गांव-गांव में फैली पुरा-संपदा को सहेजना उस गांव के समाज की जिम्मेदारी है किंतु आजादी के बाद सरकारों ने जिस तरह सारी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ओढ़ लीं, उससे समाज भी इससे विमुख हो गया।
    अब यदि गांव-गांव में पुरातत्व धरोहर को सहेजने का काम स्थानीय समितियों के हवाले किया जाए और यह देखा जाए कि वह केवल इसके नाम पर मिलने वाली धनराशि को हड़पने का काम न करें। इससे स्थानीय स्कूलों, संस्थाओं और लोगों के समूह को जोड़ा जाए तो अरबों-खरबों की पुरासंपदा का आसानी से संरक्षण संभव हो सकेगा। इससे पुरा संपदा की चोरी की घटनाएं भी कम हो सकेंगी। इतिहास के प्राध्यापकों जैसे लोगों को इन समितियों का प्रेरक प्रवर्तक बनाया जा सकता है। अब हमारे पास बहुत आधुनिक तकनीक उपलब्ध है जिसने जीवन के कई क्षेत्रों को बहुत आसान और कुशल बना दिया है। सोमवार को ही स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचार में बताया गया है कि सेटेलाइट के माध्यम से अब शहरों के अतिक्रमण को पहचाना जा सकेगा लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके बाद भी अतिक्रमण हटाए गए? क्या तकनीक का बेहतर इस्तेमाल करके हम प्रशासन को बेहतर बना रहे हैं?
    राजधानी भोपाल में कुछ वर्षों पहले सड़कों पर कैमरे लगाते हुए बताया गया था कि अब यातायात का उल्लंघन कठिन काम हो जाएगा और इससे परिवहन बहुत सुविधाजनक हो जाएगा। लेकिन इन कैमरों से क्या यह सब हुआ। उनके उपयोग करने वाले तो जैसे-जहां थे वैसे-वहीं रहे। यदि सेटेलाइट से चीन्हकर अतिक्रमण हटाए जा सकते हैं तो क्या पुरातात्विक महत्व के स्थानों से यह अतिक्रमण हटाए जाएंगे। इनकी जानकारी तो बिना तकनीक के भी प्रशासन के पास है। तकनीक वहीं काम कर रही है जहां प्रशासन के पास इच्छाशक्ति है। केंद्र सरकार ने कई मामलों में इसका प्रदर्शन किया है और आगे इसके ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल की मंशा जताई है। कई अपराध नई तकनीक के कारण ही पकड़े जा पा रहे हैं इसलिए आवश्यक है कि धरोहरों की संरक्षा के मामले में भी तकनीक का प्रशिक्षण, प्रबंधन और प्रदर्शन बेहतर किया जाए। सांस्कृतिक पुनरुत्थान की जो बात की जा रही है वह धरोहरों के बेहतर प्रबंधन के बिना अधूरी रहेगी।

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