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शब्दबाणों से भी घायल हुई अंग्रेजी सत्ता : स्वाधीनता में कवियों का योगदान

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्रभाषा हिंदी की केंद्रीय भूमिका रही है। हिंदी रचनाकारों ने एक तरफ राष्ट्र को जाग्रत किया दूसरी तरफ संघर्ष के दौरान प्रेरक की भूमिका निभाई। कई कलमकारों ने तो सीधे स्वाधीनता आंदोलन में भी भाग लिया। यूं तो भारत में हिंदी के रचनाकारों और लेखकों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। इसमें कई ऐसे कलमवीर भी हैं जिनकी कलम किसी वज्र से कम नहीं थी।

देश की स्वतंत्रता के लिये स्वाधीनता युग में जहां असंख्य वीरों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संघर्ष किया। वहीं, राष्ट्र कवियों ने अपने शब्दों के बाण से अंग्रेजी राज को हिलाकर रख दिया। कवियों की ओजस्वी कविताओं की लय में पूरी एक पीढ़ी स्वाधीनता आंदोलन के लिए बहती चली गई। भारत का प्रथम मुक्ति संग्राम 1857, देशवासियों का साझा प्रयास था। इसके बाद अंग्रेजों के दमन और शोषण के दर्द से भारत कराह रहा था। आतंक के उस दौर में भारतेंदु हरिश्चंद्र का भारतेंदु युग का प्रवेश हुआ। उन्होंने अंग्रेजों की नीति को अपने काव्य में कुछ इस तरह व्यक्त किया।

भीतर-भीतर सव रस चूसै, हंसि-हंसि के तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखी साजन नहिं अंग्रेज।।

भारतेंदु के समकालीन कवियों में वद्री नारायण चौधरी प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र और राधाकृष्ण दास की कविताएं भी स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रेरणादायी रही हैं। कई कवियों ने सीधे प्रहार के स्थान पर राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति की भावनाएं जाग्रत कर समाज में क्रांति का बीजारोपण किया। द्विवेदी युग और छायावाद युग के कवियों की कविताओं में राष्ट्रीय भावनाओं की पूर्णता का भाव दिखता है। द्विवेदी युग के कवियों ने भारतीयों को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष करने की आंतरिक शक्ति प्रदान की। उन्हें क्रांति पथ पर चलते हुए बलिदान का रास्ता दिखाया।

नाथूराम शर्मा शंकर ने बलिदान गान में लिखा है -देशभक्त वीरों, मरने से नेक नहीं डरना होगा। प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने तेजस्वी हुंकार से राष्ट्रीयता का उद्घोष किया-घरती हिला कर नींद भगा दे/ वज्रनाद से व्योम जगा दे/ देख और कुछ लाग लगा दे। माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन और सुभद्रा कुमार चौहान ने अपनी लेखनी से राष्ट्र तत्व को सम्प्रेषित करने के साथ स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया।

माखनलाल चतुर्वेदी जी ने जेल में रहते हुये भी भारतीय जनों में राष्ट्रीय चेतना की लहर दौड़ा दी। चतुर्वेदी जी के कवि मन ने स्वाधीनता संग्राम के क्रांति भाव को कुछ इस तरह व्यक्त किया-क्या? देख न सकती जंजीरों का गहना। हथकडिय़ां क्यों? यह ब्रिटिश राज्य का गहना।। कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन एक ऐसे कवि थे जो गांधीजी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन से सीधे जुड़ गये। उन्होंने कवि नाथूराम शंकर शर्मा की तरह देश की आजादी के लिये युवाओं को बलिदान के लिये प्रेरित किया।

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