‘आपातकाल’ भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर अमिट धब्बा

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  • 25 जून 1975 देश के लिए एक दुर्भाग्यशाली तिथि कही जा सकती है

25 जून 1975 देश के लिए वह काला दुर्भाग्यशाली दिन था जिस दिन कांग्रेस नेत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अत्यंत क्रूरता से देश पर अकारण आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की सभी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया था।

  • रामभुवन सिंह कुशवाह

25 जून 1975 देश के लिए वह काला दुर्भाग्यशाली दिन था जिस दिन कांग्रेस नेत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अत्यंत क्रूरता से देश पर अकारण आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की सभी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया था। आज भी उस दिन का स्मरण करने पर अजीब सी सिहरन पैदा होने लगती है। आपातकाल के वे काले दिन और डरावनी रातेें भारतीय कैसे भूल सकते हैं? भले ही उसको 45 साल बीत गए हों। देश की सभी जेलें विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं, साधु-संतों, संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों, सर्वोदय के कार्यकर्ताओं, विद्यालयों और कॉलेजों में पढऩे वाले छात्रों,पत्रकारों और यहां तक कि बड़ी संख्या में महिलाओं से भर दी गईं।

उन महिलाओं और बच्चों के साथ भी निर्ममता का व्यवहार किया गया जिनकी गोद में बच्चे थे। हजारों -लाखों लोगों को अकारण मीसा और डीआईआर में निरुद्ध कर जेल में डाल दिया गया। यही नहीं जो जेल में थे वे तो जेल में थे ही किन्तु जो जेल के बाहर थे उन पर भी कम जुल्म नहीं हुआ। उस समय देश में आतंक का साम्राज्य स्थापित हो गया था कि जेल से अधिक बदतर स्थिति में बाहर रह रहे लोगों की थी।

आधी रात को भारत के संविधान कुछ प्रावधानों को निलम्बित कर ,राष्ट्रपति को जगाकर, उनके जबरिया हस्ताक्षर लेकर व केबिनेट को अंधेरे में रखकर देश पर आपातकाल लादा गया था। उसकी खबर पूरे देश को सबेरे मिली। कोई सरकार की आलोचना न कर सके, इसके लिए अधिकांश समाचार पत्रों पर दबाव डाला गया और विरोधी समझे जाने वालों को प्रतिबंधित कर दिया गया तो बहुतों के कार्यालयों में ताला डलवा दिया गया, उनके संवादाताओं और संपादकों और संचालकों को या तो जेल में निरुद्ध कर लिया गया या उन्हें नजरबन्द कर दिया गया। उनके संस्थानों पर सेंसरशिप लगा दी गई। इसके बाबजूद कुछ प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने उस दिन अपने संपादकीय कॉलम खाली रखकर विरोध जताया।

अब प्रश्न उठता है कि क्या उस समय देश में कोई भयानक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी या किसी विदेशी शत्रु ने हमला कर दिया था अथवा देश आंतरिक कलह से जूझ रहा था जिसके कारण देश पर आपातकाल लगाया गया। वास्तव में तो तीन स्थितियों में एक भी नहीं थी। वास्तविकता तो यह थी कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ दायर एक चुनाव याचिका को स्वीकार कर उनका चुनाव रद्द कर दिया था। पर उससे भी कोई खास प्रभाव शायद न पड़ता, क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार वे बिना किसी सदन की सदस्य रहते हुए 6 माह तक प्रधानमंत्री रह सकती थीं और 6 माह के अंदर फिर से कोई चुनाव जीतकर आ सकतीं थीं। पर हकीकत यह थी कि उनका चुनाव रद्द होने के बाद कांग्रेस में भी आंतरिक कलह की स्थिति पैदा हो जाने की संभावना थी। कांग्रेस का एक प्रभावशाली गुट उनके खिलाफ था।

इंदिरा गांधी को डर था कि इस स्थिति में उनके अलावा किसी दूसरे वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री बनाने की मांग उठ सकती है। दूसरा कारण जयप्रकाश नारायण ने छात्र आंदोलन के माध्यम से समग्र क्रांति का आव्हान कर ‘भारत बन्दÓ की घोषणा कर रखी थी। इंदिरा गांधी ने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को उस स्थिति से निपटने के लिए आपातकाल लगाने का औचित्य बताया और हमारे देश की कर्तव्यनिष्ठ नौकरशाही भी उनके इस झांसे में आ गई। इसका प्रमाण यह है कि मैं ग्वालियर केंद्रीय कारागार में निरुद्ध था। मैंने अपने घर के लोगों को न तो पेरोल मांगने और न ही जेल में मिलने से रोक दिया था किंतु कुछ दिनों बाद भिण्ड के कलेक्टर और एसपी ने गांव के एक वकील के माध्यम से मेरी पत्नी के हस्ताक्षर कराके पेरोल का एक आवेदन मंगवाकर पेरोल दे दी।

मैं तो हैरान रह गया किन्तु जब भिण्ड पंहुचा तो तत्कालीन कलेक्टर ने सबसे पहले उनसे मिलने का संदेश भिजवाया। जब मैं उनसे मिला तो वहां एसपी भी मौजूद थे। उन दोनों ने क्षमायाचना करते हुए कहा था कि उन्हें नहीं मालूम था कि आपको इतने दिनों के लिए जेल भेजा जावेगा। उनका अनुमान था कि जयप्रकाश नारायण के बंद के आव्हान के बाद आप सबको छोड़ दिया जावेगा। मैंने उनसे यही कहा कि इसमें आप लोगों का कोई दोष नहीं। मेरे लिए जेल जाना कोई अपवाद नहीं।

आपातकाल में मीसा के अंतर्गत निरुद्ध लोगों में प्रमुख रूप से दो किस्म के लोग थे। एक वे, जिन्हें राजनीतिक कारणों से निरुद्ध किया गया था और दूसरे वे जो अपराधी प्रकृति के थे। इसका फर्क जेल में शासन द्वारा उन्हें दी गई श्रेणी से समझ में आता था। किंतु अपराधी श्रेणी में कई राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल थे इसलिये हम लोगों ने उन्हें समान श्रेणी में ही माना और सभी ने मिलकर एक ही श्रेणी बना ली पर गैर राजनीतिक बंदी जेल से छूटने की सदैव कोशिश करते रहते थे और कई साम्य या समाजवादी कार्यकर्ताओं से मिलकर माहौल बनाते और कहते कि अब जेल में ही उन्हें किसी दिन गोलियों से उड़ा दिया जावेगा। जब जेल में बंद कुछ साथियों की मौत पर आशंका व्यक्त करने लगे।

इस बीच बाहर भी सर्वदलीय विरोध के लिए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संगठन खड़ा हुआ जिसमें राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की प्रमुख भूमिका थी। और आपातकाल के खिलाफ भूमिगत आंदोलन शुरू हुआ, खुलकर विरोध की रणनीति बनीं। इस आंदोलन के अंर्तगत देश भर में करीब दो ढाई लाख युवाओं ने आन्दोलन कर गिरफ्तारियां दीं। यह आंदोलन स्वतंत्रता आंदोलन से भी कहीं बड़ा था क्योंकि उस समय कभी भी इतनी बड़ी संख्या में आंदोलन कर एक समय जेल भरने वालों की इतनी संख्या नहीं थी।

इस बीच सरकार मीडिया और समस्त सूचना तंत्र पर शिकंजा कसा जा चुका था जिसके कारण राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में इंदिरा गांधी के विरोध की मानसिकता लगभग समाप्त हो गई। सत्ता में बैठे मंत्री ‘इंदिरा ही इंडिया’ बताने लगे और चाहे पुलिस हो या अन्य प्रशासनिक क्षेत्र सर्वत्र इन्दिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गांधी के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

आतंक का इतना बड़ा जलजला छा गया कि सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी मीसा में बन्द करने की धमकी दी जाने लगीं। पर इससे जनता के अंदर आक्रोश की स्थिति पैदा होने लगी। इस बीच विपक्ष और लोगों की आजादी के समर्थकों ने भूमिगत आंदोलन शुरू कर दिया। ग्वालियर सहित देश की तमाम जेलों में खबर पंहुची तो मीसावंदियों ने जेलों। में गुप्त आंतरिक समितियां गठित कर लीं थीं। ग्वालियर जेल में गठित संचालन समिति के संयोजक स्व.नरेश जौहरी थे और मैं उनका स्वाभाविक रूप से सहायक था। इसलिए जेल के बाहर के आंदोलन की खबरें मुझे सबसे पहले मिलती थीं जो बाहर से आने वाली खाद्य सामग्री या मिलने आने वाले लोगों के माध्यम से हम तक आ जाया करती थीं।

मेरी यह जिम्मेदारी थी कि उस गुप्त सामग्री को सब तक पंहुचाकर नष्ट कर दिया करता था। क्योंकि बीच-बीच में हमारी तलाशी होती रहती थी। ऐसी सभी अवांछनीय सामग्री नष्ट करना ही उचित था। पर इसलिए भारत में चल रहे इस सर्वदलीय अभियान की कुछ जानकारी मुझे भी थी। इसीलिये में अधिकृत रूप से यह भी कह सकता हूं कि जनता पार्टी का गठन जेल में हुआ और चुनाव लडऩे का निश्चय किया गया और सरकार को इसकी चुनाव परिणाम आने तक भनक नहीं पड़ी।

यद्यपि यह विषय इस आलेख का विषय नहीं है पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि जेल में निरुद्ध मीसा बंंदियों के साथ भूमिगत आंदोलन में लगे नेता हमारे संपर्क में थे। उनके अथक परिश्रम से 1977 में ही गठित जनता पार्टी को अभूतपूर्व विजय मिली और राजनीति में ‘इंदिरा युग’ की समाप्ति हुई। चुनाव में स्वयं को ‘लौहपुरुष’ मानने वाली इंदिरा गांधी भी बुरी तरह चुनाव हार गईं और अपनी जमानत बचाने में असफल रहीं। अंतत: आपातकाल समाप्त हुआ।


आज कांग्रेसी और मीडिया का एक वर्ग जब देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर तानाशाही का आरोप लगाते हैं तो हंसी आती है। उन्हें नहीं मालूम कि स्वतंत्रता का श्रेय लेने वाली कांग्रेस के अंतस में कितनी बड़ी तानाशाही पनप रही है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण स्वयं वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व में पाया जाता है कि उसके खिलाफ कोई आवाज तक नहीं उठा पाता। दुर्भाग्य का विषय यह भी है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में गठित जनता पार्टी का हिस्सा रहे लालू और मुलायम सिंह जैसे नेता भी राष्ट्रीय हितों को तिलांजलि देकर पारिवारिक पार्टियों के झंडाबरदार बनकर कांग्रेस का साथ दे रहे हैं, पर वे सत्ता में आकर अपनी प्रमाणिकता खो चुके हैं। इसलिए तत्कालीन जनता पार्टी का विकसित स्वरूप भारतीय जनता पार्टी आज अजेय स्थिति में भारतीय राजनीति में केंद्र में सत्तारूढ़ है और उनका भविष्य देश की जनता से जुड़ा हुआ है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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