‘आपातकाल’ भारतीय लोकतंत्र के चेहरे पर अमिट काला धब्बा

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-रामभुवन सिंह कुशवाह

25 जून 1975 देश के लिए वह दुर्भाग्यशाली दिन था जिस दिन कांग्रेस नेत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने क्रूरता से देश पर अकारण आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की सभी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया था। 47 वर्ष पूर्व आज भी उस दिन का स्मरण करने पर अजीब सी सिहरन पैदा होने लगती है। भले ही उस दुर्घटना को आधी सदी बीतने वाली हो। देश की सभी जेलें विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं, साधु संतों, संघ के प्रचारकों और स्वयंसेवकों, सर्वोदय के कार्यकर्ताओं, विद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों, पत्रकारों और यहां तक कि बड़ी संख्या में महिलाओं से भर दी गईं। हजारों -लाखों लोगों को अकारण मीसा और डीआईआर में निरुद्ध कर जेल में डाल दिया गया। यही नहीं, जो जेल में थे वे तो जेल में थे ही किन्तु जो जेल के बाहर थे उन पर भी कम जुल्म नहीं हुए।
आपातकाल आधी रात को भारत के संविधान कुछ प्रावधानों को निलम्बित कर राष्ट्रपति को जगाकर उनके हस्तक्षर लेकर कैबिनेट को अंधेरे में रखकर देश पर लाद दिया गया। उसकी खबर पूरे देश को देर सबेर मिली। कोई सरकार की आलोचना न कर सके इसके लिए अधिकतर समाचार पत्रों पर दबाव डाला गया और विरोधी समझे जाने वालों को प्रतिबंधित कर दिया गया तो बहुतों के कार्यालयों में ताला डलवा दिया गया, उनके संवादाताओं और संपादकों और संचालकों को या तो जेल में निरुद्ध कर लिया गया या उन्हें नजरवन्द कर दिया गया। प्रकाशनों पर सेंसरशिप लगा दी गई। इसके बाबजूद कुछ प्रतिष्ठित समाचारपत्रों ने उस दिन अपने संपादकीय कॉलम खाली रखकर विरोध जताया।
अब प्रश्न उठता है कि क्या उस समय देश में कोई भयानक संकट की स्थिति पैदा हो गई थी या किसी विदेशी शत्रु ने हमला कर दिया था अथवा देश आंतरिक कलह से जूझ रहा था जिसके कारण देश पर आपातकाल लगाया गया? वास्तव में तो तीन स्थितियों में एक भी नहीं थी। वास्तविकता तो यह थी कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ दायर एक चुनाव याचिका को स्वीकार कर उनका चुनाव रद्द कर दिया था। पर उससे भी कोई खास प्रभाव शायद न पड़ता, क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार वे बिना किसी सदन की सदस्य रहते हुए वे 6 माह तक प्रधानमंत्री रह सकतीं थीं और 6 माह के अंदर फिर से कोई चुनाव जीत कर आ सकतीं थीं। पर हकीकत यह थी कि उनका चुनाव रद्द होने के बाद कांग्रेस में भी आंतरिक कलह की स्थिति पैदा हो जाने की संभावना थी। कांग्रेस का एक प्रभावशाली गुट उनके खिलाफ था। इंदिरा गांधी को डर था कि इस स्थिति में उनके अलावा किसी दूसरे वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री बनाने की मांग उठ सकती है। दूसरा कारण जयप्रकाश नारायण ने छात्र आंदोलन के माध्यम से समग्र क्रांति का आव्हान कर ‘भारत बन्द’की घोषणा कर रखी थी। इंदिरा गांधी ने पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को उस स्थिति से निपटने के लिए आपातकाल लगाने का औचित्य बताया और हमारे देश की कर्तव्यनिष्ठ नौकरशाही भी उनके इस झांसे में आ गई। इसका प्रमाण यह है कि मैं ग्वालियर केंद्रीय कारागार में निरुद्ध था। मैंने अपने घर के लोगों को न तो पेरोल मांगने और न ही जेल में मिलने से रोका था किंतु कुछ दिनों बाद भिण्ड के कलेक्टर और एसपी ने गांव के एक वकील के माध्यम से मेरी पत्नी के हस्ताक्षर कराकर पेरोल का एक आवेदन मंगवाकर पेरोल दे दी। मैं तो हैरान रह गया किन्तु जब भिण्ड पंहुचा तो तत्कालीन कलेक्टर ने सबसे पहले उनसे मिलने का संदेश भिजवाया। जब मैं उनसे मिला तो वहां एसपी भी मौजूद थे। उन दोनों ने क्षमायाचना करते हुए कहा था कि उन्हें नहीं मालूम था कि आपको इतने दिनों के लिए जेल भेजा जावेगा। उनका अनुमान था कि जयप्रकाश नारायण के बंद के आह्वान के बाद आप सबको छोड़ दिया जावेगा।
आपातकाल में मीसा के अंतर्गत निरुद्ध लोगों में प्रमुख रूप से दो किस्म के लोग थे एक वे जिन्हें राजनीतिक कारणों से निरुद्ध किया गया था और दूसरे वे जो अपराधी प्रकृति के थे। इसका फर्क जेल में शासन द्वारा उन्हें दी गई श्रेणी से समझ में आता था। किंतु अपराधी श्रेणी में कई राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल थे।
इस बीच बाहर भी सर्वदलीय विरोध के लिए जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संगठन खड़ा हुआ जिसमें राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ की प्रमुख भूमिका थी। आपातकाल के खिलाफ भूमिगत आंदोलन शुरू हुआ, खुलकर विरोध की रणनीति बनीं। इस आंदोलन के अंर्तगत देश भर में करीब दो ढाई लाख युवाओं ने आन्दोलन कर गिरफ्तारियां दीं। इस बीच सरकार. मीडिया और समस्त सूचना तंत्र पर शिकंजा कसा जा चुका था जिसके कारण राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में इंदिरा गांधी के विरोध की मानसिकता लगभग समाप्त हो गई। सत्ता में बैठे मंत्री ‘इंदिरा ही इंडिया’ बताने लगे और चाहें पुलिस हो या अन्य प्रशासनिक क्षेत्र सर्वत्र इन्दिरा गांधी और उनके पुत्र संजय गाँधी के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी। आज कांग्रेसी और मीडिया का एक वर्ग जब देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी पर तानाशाही का आरोप लगाते हैं तो हंसी आती है।

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