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आपातकाल : भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय

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  • प्रो. (डॉ.) राजेन्द्र गुप्ता


स्वातंत्र्योतर
भारत में 26 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा हुई। वस्तुत: 25 जून, 1975 की देर रात को ही आपातकाल के मुद्दे पर तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो गए थे और रात से ही पुलिस-प्रशासन का तांडव शुरु हो चुका था। 25 जून की देर रात से ही तत्कालीन वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारियां भी शुरू हो गई थी। लोकनायक जयप्रकाश को रात में ही सोते हुए से जगा कर गिरफ्तार कर लिया गया। जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेई सहित अनेक प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए। मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह सहित अनेक अन्य नेता भी गिरफ्तार किए जा चुके थे। प्रेस पर प्री-सेंसरशिप लगा दिया गया था।

शाह कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार 21 माह तक चले इस आपातकाल के दौरान कुल 1 लाख 10 हजार लोगों की गिरफ्तारियां की गई थी,जबकि सत्याग्रह सहित अन्य गिरफ्तारियां तो इससे भी अधिक हुई थी। इनमें से 253 पत्रकार भी गिरफ्तार किए गए थे। इसके अतिरिक्त आपातकाल के दौरान विदेशी पत्रकारों को भारत से निष्कासित किया गया, 51 अधिमान्य पत्रकारों की मान्यताएं रद्द की गई, 18 पत्र-पत्रिकाएं बंद कर दी गईं, 290 समाचार पत्रों के विज्ञापन रोक दिए गए थे। इसके अलावा प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी भंग कर दिया गया था।


भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की गई थी। अनुछेद 352 में सशस्त्र विद्रोह एवं आंतरिक सुरक्षा संकट की स्थिति में आपातकाल का प्रावधान है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन दिनों देशभर में राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल था और आपातकाल लगाने के कुछ अन्य कारण भी थे। उनमें से एक बड़ा कारण यह था कि प्रयागराज उच्च न्यायालय ने 12 जून, 1975 को एक निर्णय में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा जी का चुनाव रद्द कर दिया था। इसके अतिरिक्त 6 वर्षों के लिए श्रीमती गांधी को चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित कर दिया गया था।

श्रीमती गांधी के चुनाव में सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं लेने का श्री राजनारायणजी का आरोप भी सिद्ध हो गया था। कांग्रेसी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मोहन धरिया द्वारा श्रीमती गांधी से त्यागपत्र देने की मांग की गई थी। तत्कालीन सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के ही 58 सांसदों ने श्री ललित नारायण मिश्र पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए ज्ञापन दिया था। इन्हीं कारणों से स्पष्ट था कि कांग्रेस के अंदर विद्रोह की आशंका प्रबल होने लगी थी। विपक्षी दलों ने भी आंदोलन की घोषणा कर दी थी। कांग्रेस के चापलूस नेताओं के बीच श्रीमती गांधी फंस चुकी थी। 70 के दशक की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां सत्तारूढ़ दल के अनुकूल नहीं थी।


सार्वजनिक प्रसारण करने वाला दूरदर्शन भी आपातकाल के प्रभाव से अछूता नहीं था। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि उन दिनों श्रीमती गांधी के समर्थन में आयोजित रैली के प्रचार में 90 घंटे खर्च किए गए और 29 हज़ार फीट फिल्म प्रदर्शित की गई जबकि विपक्षी दलों की रैली को 35 सेकंड ही दिखाया गया। इसलिए उन दिनों दूरदर्शन को सरकारी भोंपू भी कहा गया। विपक्षी दलों के अनेक वरिष्ठ नेताओं को जेल में डाल कर विपक्ष की आवाज को भी बंद करने के हरसंभव प्रयास किए जा रहे थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई अन्य सामाजिक संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। सत्ता केन्द्रीकरण का स्तर यह था कि 12 दिसंबर, 1975 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक बैठक में यह निर्णय लिया कि सरकारी विज्ञापनदाता संस्थान डीएवीपी प्रतिबंधित संगठनों के विरोध में तथा श्रीमती गांधी के समर्थन में प्रचार अभियान चलाए। शाह आयोग के द्वारा अधिप्रमाणित रिपोर्ट में आपातकाल के दौरान एक लाख दस हजार गिरफ्तार लोगों में से संघ विचार परिवार के लगभग 75 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
(लेखक बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं।)

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