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कश्मीर घाटी में तनाव की कोशिश और महबूबा मुफ्ती का रुदाली रोदन

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एक बार पुन: घाटी में मजहब के आधार पर लोगों को निशाना बनाने की रणनीति । हिन्दु -सिख की शिनाख्त कर उनकी हत्या करने की रणनीति । इसी नई रणनीति के अन्तर्गत एक सरकारी स्कूल में दो हिन्दु सिख शिक्षकों की हत्या कर दी गई ।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री, वरिष्ठ पत्रकार
kuldeepagnihotri@gmail.com

जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति अनेक देशी विदेशी ताकतों को रास नहीं आई थी। लेकिन यह समाप्ति राज्य की आम जनता को बहुत रास आई थी क्योंकि उसे वे सभी अधिकार प्राप्त हो गए थे जो देश के बाकी नागरिकों को प्राप्त थे। सबसे बड़ा लाभ यह हुआ था कि घाटी में से आतंकवादियों का नेटवर्क कमजोर पडऩे लगा था। प्रदेश की आम जनता ही उनके बारे में सुरक्षा बलों को सूचना देने लगी थी क्योंकि उसका प्रशासन पर पुन: विश्वास जमने लगा था।

राजनीतिज्ञ- सरकारी नौकरशाही और आतंकवादियों के बीच का तालमेल टूटने लगा था। प्रशासन में से उन सरकारी कर्मचारियों की शिनाख्त होने लगी थी जिन्होंने आतंकवादियों से तालमेल बिठा रखा था। गुपकार मोर्चे के बहिष्कार के बावजूद आम लोगों ने जिला विकास परिषदों के चुनावों में बड़ी संख्या में भाग लेकर उन राजनीतिज्ञों को गहरा निराश किया था जो सोचते थे कि उनके बिना प्रदेश की जनता लोकतांत्रिक प्रक्रिया का बहिष्कार करेगी । सबसे बड़ी बात यह कि प्रदेश सरकार ने कश्मीरियों हिन्दुओं की उस सम्पत्ति को मुक्त करवाना शुरु कर दिया था जिस पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया था । लगभग एक हजार ऐसी सम्पत्तियाँ मुक्त करवा ली गईं थीं।

स्वभाविक है इससे पाकिस्तान समेत प्रदेश के उन राजमीतिज्ञों को गहरी निराशा होती जिनकी राजनीति ही आतंकवादियों के समर्थन से चल रही थी। आतंकवादी बहुत बड़ी संख्या में मारे भी जा चुके थे। पाकिस्तान को आशा थी कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घाटी में अराजकता की हालत पैदा हो जाएगी और गुपकार मोर्चा वालों को लगता था कि उनके घाटी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया सम्भव ही नहीं हो सकेगी । लेकिन हुआ इसके उलट। घाटी में शान्ति व्याप्त होने लगी। आतंकियों के मारे जाने पर पहले जो भीड जुटती थी अब वह आतंकियों के हाथों मारे गए निर्दोषों के जनाजे पर जुटने लगी। इतनी ही नहीं पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए जम्मू कश्मीर के इलाके में कहीं कहीं पाकिस्तान के ख़िलाफ़ प्रदर्शन होने लगे। कश्मीर घाटी में पर्यटक का बड़ी संख्या में आना जाना शुरु हो गया। हुर्रियत कान्फ्रेस एक ही झटके में हवा में उड़ गई। घाटी के गाँवों तक में उनके भ्रष्टाचार के चर्चे होने लगे। विधान सभा की सीटों के पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया लगभग समाप्ति पर है और जल्दी ही निकट भविष्य में वहाँ विधान सभा के चुनाव हो सकते हैं, ऐसी चर्चा भी शुरु हो गई।

इस नई परिस्थिति में पाकिस्तान ने भी अपनी रणनीति बदली। एक बार पुन: घाटी में मजहब के आधार पर लोगों को निशाना बनाने की रणनीति। हिन्दु-सिख की शिनाख्त कर उनकी हत्या करने की रणनीति। इसी नई रणनीति के अन्तर्गत एक सरकारी स्कूल में दो हिन्दु सिख शिक्षकों की हत्या कर दी गई। श्रीनगर में एक फार्मेसी के हिन्दु मालिक को गोली मार दी गई। अन्य प्रान्तों से आकर कश्मीर घाटी में मेहनत मजदूरी कर रहे श्रमिकों को निशाना बनाया जा रहा है। बिहारी श्रमिकों को निशाना बनाया जा रहा है।

पुलिस का कहना है कि ये हत्याएँ करने के लिए आतंकवादियों के सीमा पार नियंत्रकों ने तरीका भी बदल लिया है। ये हत्याएं उन लोगों से करवाई जा रही हैं जिनका कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं हैं। ये आतंकवादियों के ओवरग्राऊंड वर्कर हैं। वे हत्या करके फिर अपने सामान्य कामकाज में व्यस्त हो जाते हैं ।इन हत्याओं के लिए छोटे हथियारों जैसे पिस्टल आदि का प्रयोग किया जाता है। लेकिन हिन्दु सिखों की इन सिलैक्टड हत्याओं से जाहिर है घाटी में अल्पसंख्यकों में भय व्याप्त होता और वे घाटी छोडऩे लगते।

लेकिन इन सिलैक्टड हत्याओं के बाद सुरक्षा बलों ने भी अपनी रणनीति बदली और एक साथ ही प्रदेश के अनेक स्थानों पर छापामारी कर लगभग पाँच सौ से भी ज्यादा आतंकवादियों के ओवरग्राऊंड वर्करों को पांडाल पर लाया गया । पुलिस की सक्रियता का आलम यह था कि कुछ महीने पहले तक राज्य के राज्यपाल मनोज सिन्हा के सलाहकार रहे एक सज्जन भी पुलिस की जद में आ गए। जितनी तेजी और व्यापकता से सरकार ने प्रहार किया, उसकी आशंका शायद न पाकिस्तान को थी और न ही पाकिस्तान को।

बल्कि पाकिस्तान को यह लगता था कि अब वह तालिबान का हौवा खड़ा कर भारत सरकार को डरा सकेगा और कश्मीर घाटी के लोगों को एक बार फिर देश के खिलाफ उकसा सकेगा। लेकिन इस बार न तो कश्मीरी पाकिस्तान के झाँसे में आए और न ही प्रशासन के हाथ पैर फूले। कश्मीर घाटी में बहुत से सरकारी कर्मचारी भी आतंकवादियों की किसी न किसी रुप में सहायता करते रहे हैं। आज तक किसी सरकार ने प्रमाण होते हुए भी उन पर शिकंजा कसने की कोशिश नहीं की। इतना ही नहीं कुछ विधायक तक भी आतंकवादियों का मूक समर्थन नहीं बल्कि सार्थक समर्थन करते रहे हैं। वर्तमान सरकार ने इन सभी चोर दरवाजों को बन्द करने का उपक्रम शुरु कर दिया है।

जाहिर है अब पाकिस्तान के पास अपना अन्तिम तुरप का पत्ता बचा था, जिसे मैदान में उतारे बिना काम नहीं चलने वाला था । यह तुरुप का पत्ता है घाटी का एटीएम। बैंक वाला एटीएम नहीं, बल्कि कश्मीर घाटी की राजनीति का एटीएम। एटीएम यानि अरब सैयद, तुर्क और मुगल मंगोल मूल के लोग जो अरसे पहले अपने अपने देशों से कश्मीर में आकर बस गए थे । इसी ब्रिगेड की एक स्तम्भ सैयदा बीबी महबूबा मुफ्ती को एक बार फिर मैदान में उतरना पड़ा। वह पहले की तरह ही सेना पर आरोप लगाने लगीं कि सेना ने फिर कश्मीरियें को तंग करना शुरु कर दिया है।

महबूबा मुफ्ती का कहना है जब सुरक्षा बल मारते हैं तब तो कोई नहीं चिल्लाता , लेकिन जब आतंकवादी किसी को मारते हैं तो सभी चिल्लाते हैं। वे कहती हैं कि इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार को कश्मीर को लेकर पाकिस्तान से बात करनी चाहिए। महबूबा इक्कीसवीं शताब्दी के अन्त में भी वहीं खड़ी हैं, जहाँ उसकी बहन का तथाकथित अपहरण हुआ था और उसके बदले सरकार ने कुछ आतंकवादियों को छोड़ दिया था।

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