जी भर के खाओ, मध्यप्रदेश से आए हो..

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मध्यप्रदेश के ‘बडऩगर वाले प्रदीपजी’, फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार, जिनके गीत पुरानी पीढ़ी की जुबान पर अब भी रहते हैं, दिलचस्प इंसान थे। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ उनका कालजयी गीत है तो ‘रामचंद्र कह गए सिया से’ भी लोकजयी। जब हम उनके मुंबई स्थित बंगले पर साक्षात्कार लेने पहुंचे तो उन्होंने आवभगत करते हुए यह कहते हुए सहज कर दिया-जी भर के खाओ, आप मध्यप्रदेश से आए हो।

  • राजीव सक्सेना, फिल्म समंीक्षक व धारावाहिक निर्माता

दूरदर्शन पर, अपने शो ‘हमारे आसपास’ के लिए पंडित प्रदीपजी से मुलाकात कई मामलों में खास साबित हो गई। 1998 यानी इक्कीस बरस पहले की बात होगी। सुपर-डुपर हिट फिल्म ‘जय संतोषी माँ’ और ‘जय बाबा अमरनाथ’ जैसी धार्मिक फिल्मों के निर्माताओं में से एक फिल्म समीक्षक बी पी जोशी साहब से मेरे पिताजी के मित्रवत रिश्ते का लाभ उठाकर मैंने उनसे लगातार जिद करके अपने मूड के लिए चर्चित स्वनामधन्य गीतकार कवि प्रदीप से, जिन्हें हम बडऩगर के बाशिंदे के तौर पर भी जानते हैं, एक्सक्लूसिव इंटरव्यू का समय आखिर फिक्स करवा ही लिया। निश्चित समय पर मुंबई के मलाड पश्चिम में स्थित जोशी के ‘राजभवन’ नामक बँगले से उन्हें साथ लेकर, कार से हमारी टीम, विले पार्ले में प्रदीपजी के पुरानी स्टाइल के बँगले ‘पंचामृत’ पहुँच गई।

सबसे पहले जोशीजी के साथ मैं, छोटे से पर बेहद सादगी वाले सौम्य ड्राइंग रूम में गया और एक तख्त पर गाव-तकिये से टिके पंडितजी के पाँव छूकर उनका आशीर्वाद लिया। उन्होंने इशारे से पास रखी कुर्सियों पर हम दोनों को बैठने को कहा। जोशीजी ने बिना देर किये, कैमरा टीम को भीतर बुलाने की इजाजत उनसे मांग ली। पंडितजी की बेटी कांग्रेस की नेता मितुलजी ने बाहर जाकर सबको बुला लिया। कैमरामैन के प्रवेश करते ही पंडितजी उनके पीछे आने वाले टेक्निशियंस की गिनती करने लगे। ‘एक.. दो… तीन .. चार.. पांच… छह..’ जोशीजी उनके मूड से आशंकित हो मानो सफाई देने लगे। ‘पंडितजी, दूरदर्शन प्रोग्राम की टीम थोड़ी बड़ी होती है। ये साउंड रिकार्डिस्ट, लाइट्समेन, असिस्टेंट्स हैं।’

प्रदीपजी जवाब में कहने लगे… ‘मुझे सब मालूम है, मैं नाश्ते की प्लेट्स का हिसाब लगा रहा हूं।’ फिर बेटी मितुल को, नाश्ता, चाय लाने का निर्देश दिया। कैमरा, लाइट सैट हो पाते इससे पहले गुजराती व्यंजन खमण – ढोकले, नमकीन सेव, मिठाई..और चाय के साथ, खानसामा नरेश भाई हाजिर हो चुके थे। ‘पहले पेट पूजा, फिर काम दूजा.. सब कुछ घर का बना है … जी भर के खाओ..आप मेरे मध्यप्रदेश से आये हो..’ पंडितजी आदेश के स्वर में बोले। इसके बाद शुरू हुए साक्षात्कार में पहले ही सवाल पर, इकहरे शरीर के वयोवृद्ध कवि भड़क गए।

जोशीजी, मैं और सभी डर गए। मैंने माफी मांगी गुस्ताखी की। बोले.. ‘नहीं ये गुस्सा आप पर नहीं है, आप जवाब रिकॉर्ड करिये।’ सवाल था… ‘सिनेमा में लेखक और गीतकार को पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता, आप क्या कहना चाहेंगे।’ कैमरा ऑन हुआ… पंडितजी किसी सधे हुए अभिनेता की तरह बिना आवाज बोलने का अभिनय करते हुए मुंह चलाने लगे। हम सब उन्हें ताज्जुब से देख रहे थे। कैमरामैन शादुद्दीन मेरी तरफ सवालिया नजर से देख रहे थे मैंने रिकॉर्डिंग जारी रखने का इशारा किया। 30 सेकंड के लगभग, बिना आवाज मुंह से कुछ बोलने के एक्शन के बाद प्रदीपजी बोले… ‘जरा सोचो, अगर गीतकार या राइटर कुछ नहीं लिखेगा तो कलाकार बिना बोले बिना गाये… ऐसे ही अजीब लगेगा कि नहीं, जैसा मैं लग रहा हूं? पंडित जी की बात में वजऩ था।

अपने मशहूर गीत ‘ए मेरे वतन के लोगों, जऱा आंख में भर लो पानी..’ को सुनकर, पं. जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आंसू आने के किस्से को सुनाते हुए… प्रदीपजी बताने लगे… ‘षणमुखानंद हॉल में नेहरूजी ने मुझे और लता बाई को बुलाया। प्रधानमंत्री का कार्यक्रम… समय से पहले पहुँच गया मैं। आयोजक ने सीधे स्टेज पर बैठा दिया। आधा घंटा होने आया। ए सी इतना तेज कि मेरी हवा खराब हो गई।

मैं ठहरा हड्डी का ढांचा। सारे बड़े-बड़े लोग… संकोच में ए सी कम करने का, बंद करने का भी बोल न पा रहा था। तभी नेहरूजी आ गये। स्टेज पर आकर मुझसे गले मिले, पूछा पंडितजी आपको इंतज़ार करना पड़ा, कोई परेशानी तो नहीं हुई? मैंने कान के पास मुंह ले जाकर कहा.. ए सी का टेम्प्रेचर कम करवा दीजिये, ठण्ड लग रही है। नेहरूजी ने ठहाका लगाया और अपने सहायक को बोलकर ए सी बंद करवा दिए।’

इसके बाद तो पूरे मूड में आकर उन्होंने ना सिर्फ म प्र के अपने जन्मस्थल बडऩगर और अटल बिहारी बाजपेयी जी के साथ वहीं बने रिश्ते के तमाम रोचक किस्से अपनी ही शैली में सुनाये, बल्कि अपनी शानदार आवाज में.. देख तेरे संसार की हालत.. ..पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द ना जाने कोई… से लेकर…. यहाँ वहां, जहां तहां मत पूछो कहां कहां हैं संतोषी माँ… तक मशहूर गीतों के मुखड़े सुनाकर मेरे टीवी शो में चार चाँद लगा दिए।

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