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राजद्रोह के मुकदमे के बाद भी अडिग रहे डॉ. हेडगेवार

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  • स्वतंत्रता आंदोलन व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-3

जिनका ये मानना है कि संघ अंग्रेजों का समर्थक रहा है, उन्हें डॉक्टर साहब पर किए गए राजद्रोह के मुकदमे की कार्यवाही को अवश्य पढऩा चाहिये। डॉक्टरजी के अदालत में बचाव में दिये लिखित और मौखिक वक्तव्य को सुनकर स्मेली को अपने निर्णय में कहना पड़ा – ‘उनके मूल भाषण की अपेक्षा प्रतिवाद में दिया भाषण अधिक राजद्रोहपूर्ण है। डॉक्टर साहब द्वारा एक वर्ष तक राजनैतिक भाषण नहीं करने के अभिवचन के लिये एक-एक हजार रुपए की जमानत और मुचलका भरने से इंकार करने के बाद 1 वर्ष का सश्रम कारावास दिया गया। डॉक्टर साहब ने कहा कि ‘एक भारतीय के किये की जांच और न्यायदान पराई राजसत्ता करे,यह मैं अपना और अपने महान देश का अपमान मानता हूं। यह बात कहकर उन्होंने अंग्रेजी सत्ता की वैधता को ही नकार दिया।

नरेन्द्र जैन, प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यक्षेत्र
narendra21021957@gmail.com

डॉक्टर हेडगेवार ‘एक वर्ष में स्वराज्य’ की घोषणा से सहमत नहीं थे। उनका निष्कर्ष था कि अभी समाज इसके लिये तैयार नहीं है। आंदोलन के असफल होने की स्थिति में निराशा फैलेगी। डॉक्टर साहब मानते थे कि असहयोग आंदोलन के कारण जनता में कुछ सीमा तक जागृति आयेगी। ऐसी स्थिति में केवल प्रेक्षक बने रहने की बजाय उन्होंने आन्दोलन में सक्रिय भूमिका को अपनाया। इस उद्देश्य से उन्होंने गांव-गांव में प्रवास कर सभाओं को सम्बोधित किया। नारायण राव सावरकर और डॉक्टर साहब ने मुंबई के उपनगर तक जाकर सभाएं लीं। स्वदेशी विद्यालय, स्वदेशी वस्त्र, घर-घर में चरखा लाने का आह्वान किया।

डॉक्टर साहब के प्रयत्न के कारण आंदोलन के निमित्त एकत्र की जाने वाली स्वराज निधि में भी तेजी से वृद्धि होने लगी। डॉक्टर साहब के उस समय के वक्तत्व से प्रभावित दादा राव परमार्थ के अनुसार ‘अंग्रेज और अंग्रेजी राज्य की चर्चा आते ही डॉॅक्टर काबू में नहीं रहते थे। ऐसा लगता था मानो शत्रु सामने ही खड़ा है और डॉक्टर साहब उस पर प्रबल प्रहार कर रहे हैं। उनके भाषणों की दाहकतादाह से कांग्रेस के नरम दल कतराते थे। वे चाहते थे कि डॉक्टर साहब को भाषण के लिये न बुलाया जावे। डॉक्टर साहब के जोरदार और जोशीले भाषणों का परिणाम यह हुआ कि उनके भाषणों पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया।

परन्तु जाग्रत करने के उद्देश्य से सभायें जारी रहीं। अंतत: मई 1921 को डॉक्टर साहब पर राजद्रोह का मुकदमा कायम कर दिया गया। जिनका ये मानना है कि संघ अंग्रेजों का समर्थक रहा है, उन्हें डॉक्टर साहब के मुकदमे की कार्यवाही को अवश्य पढऩा चाहिये। डॉक्टरजी के अदालत में बचाव में दिये लिखित और मौखिक वक्तव्य को सुनकर स्मेली कोको अपने निर्णय में कहना पड़ा – ‘उनके मूल भाषण की अपेक्षा प्रतिवाद में दिया भाषण अधिक राजद्रोहपूर्ण है।

डॉक्टर साहब द्वारा एक वर्ष तक राजनैतिक भाषण नहीं करने के अभिवचन के लिये 1000-1000 हजार की जमानत और मुचलका भरने से इंकार करने के बाद 1 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई। डॉक्टर साहब ने कहा कि एक भारतीय के किये की जांच और न्यायदान पराई राजसत्ता करे,यह मैं अपना और अपने महान देश का अपमान मानता हूं। ऐसा यह बात कहकर उन्होंने अंग्रेजी सत्ताकर्ता की ही वैधता को ही नकार दिया।

उन्होंने कहा – ‘मैंने अपने देशवासियों को अपनी दीन-हीन मातृभूमि के प्रति उत्कट भाव जगाने का प्रयत्न किया। उनके हृदय में यह अंकित करने का प्रयत्न किया कि भारत भारतवासियों का ही है। यदि एक भारतीय, राजद्रोह के बिना राष्ट्रभक्ति के ये तत्व प्रतिपादित नहीं कर सकता तो जो अपने को भारत सरकार कहते हैं, उन्हें सावधान हो जाना चाहिये। अब उनका ससम्मान जाने का समय आ गया। न्यायालय के बाहर डॉक्टर साहब के स्वागत के लिये उपस्थित कांग्रेस के प्रमुख नेता डॉ. मुंजे, विश्वनाथ केलकर, समिमुल्ला खां को सम्बोधित करते हुए डॉक्टर साहब ने कहा ‘मातृभूमि की रक्षा के लिये जेल तो क्या, काले पानी जाने या फांसी के तख्ते पर लटकने के भी तैयार रहना चाहिये।

परन्तु जेल जाना मानो स्वर्ग जाने का रास्ता है, वही स्वातंत्र्य प्राप्ति है- इस प्रकार का भ्रम नहीं पालना चाहिये। केवल जेल जाने से स्वराज मिलेगा यह मत समझिये। जेल न जाकर, बाहर रहकर भी अनेक तरह से राष्ट्रसेवा की जा सकती है। वे केवल जेल जाने को ही देशभक्ति का प्रमाण मानने को तैयार नहीं थे। वे युवाओं से कहते थे कि यदि तुम्हें एक वर्ष घर छोड़कर सामाजिक कार्य करने को कहा जाये तो क्या तुम तैयार हो । डॉक्टर साहब की इस भूमिका से स्पष्ट है कि उन्होंने साम्राज्य का विरोध भावनात्मक न होकर नैतिक,आर्थिक और राजनैतिक आधार पर ‘अप्राकृतिक शासन की संज्ञा दी।

डॉक्टर साहब का आंदोलन के बारे में जो निष्कर्ष था, जेल से बाहर आने पर वैसा ही परिदृश्य दिखा। चोरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लेने एवं 1922 में गांधीजी 6 वर्ष के कारावास के कारण समाज नेतृत्वविहीन होकर अपनी घर-गृहस्थी में लीन हो गया था। दूसरी ओर विदर्भ में गांधी समर्थक अभ्यंकर और गांधीजी को न मानने वाले डॉक्टर मुंजे की प्रतिस्पर्धा ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को दो गुटों में बांट दिया।

12 फरवरी को असहयोग आंदोलन को वापस लेते समय गांधीजी ने कहा ‘ ईश्वर ने मुझे तीसरी बार सावधान किया है कि जिसके बल पर सामूहिक असहयोग समर्थनीय एवं न्यायोचित ठहराया जा सकता है, वह तथ्यपूर्ण व अहिंसा का वातावरण अभी भारत में नहीं है। यह कहा जा सकता है कि गांधीजी का यह वक्तव्य डॉक्टर हेडगेवार के ‘सार्थक चिंतन, अनुशासन, समर्पण, निरंतरता व ध्येयनिष्ठा ही संगठन का सशक्त आधार हो सकता है की पुष्टि करता है।

जिसकी आवश्यकता स्वामी विवेकानंद ने अनुभव की थी, डॉक्टर हेडगेवार ने संघ की स्थापना कर उसे धरातल पर उतारना प्रारम्भ किया। आंदोलन की विफलता ने जनता को दिखाए ‘एक वर्ष में स्वराज्य के सपने को धराशायी किया था। उधर खलिफत आंदोलन को महात्मा गांधी द्वारा समर्थन दिए जाने पर जो आशंका डॉ. साहब ने जताई थी, सत्य सिद्ध हुई। डॉ.साहब के चिंतन के अनुसार भारत के मुसलमान उतने ही भारतीय हैं जितने हिंदू क्योंकि वे हिंदू पूर्वजों की संतानें हैं और यही विचार-तत्व उन्हें भारत की मुख्यधारा से जोड़कर रख सकता है जिसके वे अभिन्न अंग हैं।

परन्तु गांधीजी इस चिरस्थायी मार्ग को चुनने के स्थान पर तुष्टिकरण के पृथकतावादी मार्ग चल पड़े। जिसका खामियाजा हिन्दुओं को लाखों (लाखाधिक) के नरसंहार, जन्मभूमि से विस्थापन, अपनी प्रिय मातृभूमि के त्रासदीपूर्ण विभाजन और सीमा पर स्थायी शत्रु के रूप में भोगना पड़ रहा है। असहयोग आंदोलन के बाद अंग्रेज सरकार ने गांधीजी पर नाटकीय ढंग से मुकदमा चलाकर 6 वर्ष के कारावास में भेज दिया। 18 मार्च को उनके जेल जाने पर गांधी दिवस मनाने की परम्परा प्रारम्भ हुई। डॉक्टर साहब इसे सफल बनाने हर सम्भव प्रयास करते थे। उन्होंने इस कार्यक्रम का उपयोग व्याप्त निराशा दूर करने के लिये किया।

ऐसी ही एक सभा को सम्बोधित हुए उन्होंने कहा ‘आज का दिन अत्यंत पवित्र दिन है। महात्मा जैसे पुण्यश्लोक पुरुष के जीवन में व्याप्त सद्गुणों के श्रवण एवं चिंतन का यह दिन है। उनके अनुयायी कहलाने वालों पर उनके गुणों को अनुकरण करने की जिम्मेदारी है। महात्मा गांधी के आन्दोलन को उनके अनुयायी से यदि किसी चीज की अपेक्षा है तो वह है स्वार्थ त्याग की। कहना एक और करना दूसरा, इस प्रकार के दोहरे व्यवहार के लोग महात्माजी को नहीं चाहिये।..महात्माजी का अनुयायी बनना है तो अपने सिर पर तुलसी-पत्र रखकर सर्वस्व त्याग करके रणांगन में उतरिये।

अपने गहन ऐतिहासिक चिंतन एवं देश की सर्वांग स्वतंत्रता के उद्देश्य से डॉक्टर हेडगेवार ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। तब भी डॉक्टर साहब का कांग्रेस की आंदोलनात्मक गतिविधियों में भाग लेने का क्रम जारी रखा। स्वयंसेवकों को भी उन्होंने कांग्रेसी के नेतृत्व में भाग लेने का आदेश दिया। उनका मानना था कि स्वतंत्रता आन्दोलन किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं हो सकता, यह सभी देशवासियों का आन्दोलन है ।

जब तक विदेशी राज्य पूर्णतया धराशायी नहीं हो जाता, तब तक अपनी अलग ढपली बजाना दूरदर्शिता नहीं होगी। डॉक्टर साहब ने स्पष्ट कर दिया कि गांधीजी के नेतृत्व को सभी स्वीकार करें, भले ही कितनी मतभिन्नता हो। मध्यभारत के संदर्भ में यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यहां कांग्रेस तिलकवादी गरम दल एवं गांधीवादी नरम दल बंटा हुआ था। जिनका नेतृत्व डॉ.मुंजे और अभ्यंकर करते थे और जिनके बीच गलाकाट स्पर्धा अमर्यादित सीमा तक चलती थी। स्वयं डॉक्टर साहब एवं संघ कार्य में उनके निकटतम सहयोगी अप्पा जोशी 1928 तक कांग्रेस की प्रांतीय समिति के सदस्य बने रहे। (क्रमश:)

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