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नेहरू की भूलों को दोहराते दिग्विजय सिंह

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  • धारा-370 की बहाली संबंधी बयान ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाने की कोशिश

370 व धारा-35-ए को संसद में मोदी सरकार द्वारा हटाए जाने की कार्यवाही को न केवल दुखद बताया, बल्कि सत्ता में आने पर इन धाराओं की पुर्नबहाली की आस भी जगाई। एक तरह से यह बयान देश के बंटवारे के समय पंडित नेहरू की भूलों को दोहराने का हठ है। हालांकि तत्काल मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा इस बयान का कोई महत्व नहीं है।

  • प्रमोद भार्गव

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य दिग्विजय सिंह ने जम्मू-कश्मीर में लागू अनुच्छेद-370 की बहाली का बयान देकर आग में घी डालने का काम किया है। यह इसलिए और अधिक घातक है, क्योंकि उन्होंने यह बयान चैट एप क्लब हाउस से जुड़े पाकिस्तानी पत्रकार को दिया है। यानी उन्होंने वही कहा जो पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी चाहते रहे हैं। उन्होंने 370 व धारा-35-ए को संसद में मोदी सरकार द्वारा हटाए जाने की कार्यवाही को न केवल दुखद बताया, बल्कि सत्ता में आने पर इन धाराओं की पुर्नबहाली की आस भी जगाई।

एक तरह से यह बयान देश के बंटवारे के समय पंडित नेहरू की भूलों को दोहराने का हठ है। हालांकि तत्काल मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा इस बयान का कोई महत्व नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि विभाजन की जिस अव्यावहारिक व अप्राकृतिक मांग के आगे नेहरू समेत हमारे तत्कालीन नेता जिस तरह से नतमस्तक होते चले गए, उससे न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि पाक अधिकृत कश्मीर, भारत, पाकिस्तान और बंग्लादेश को भी विभाजन का दंड झेलना पड़ा है। जबकि विभाजन के समय ही यह साफ लगने लगा था कि यह अखंड भारत की विरासत को खंडित करने की अंग्रेजी हुकूमत की कुटिल चाल है। बावजूद कांग्रेस नेता यह नहीं समझ पाए कि जो शेख अब्दुल्ला ‘मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन कर कश्मीर की सामंती सत्ता से मुठभेड़ कर रहा है, उसे शह मिलती रही तो वह भस्मासुर भी बन सकता है ?

1931-32 में शेख की मुलाकात नेहरू तथा खान अब्दुल गफ्फार खान से हुई। इसी समय जिन्ना ने पृथकतावादी अभियान चला दिया। फिरंगी शासक तो चाहते भी यही थे कि भारत को आजादी धर्म के आधार पर बंटवारे की परिणति में हो। आमतौर से ऐसा माना जाता है कि कश्मीर समस्या 1947 के बाद पनपी व विकसित हुई। जबकि वास्तव में इसकी शुरूआत जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाबसिंह के दरबार में ‘अंग्रेज रेजिमेंटÓ की नियुक्ति के साथ ही हो गई थी। किंतु अंग्रेज नाकाम रहे। इसी समय दुर्भाग्य से कश्मीर के गिलगिट क्षेत्र के राजा रणवीर सिंह का देहांत हो गया। अंग्रेजों ने शोक में डूबे राज-परिवार की इस कमजोरी को एक अवसर माना और सक्रियता बढ़ा दी।

दरअसल अंग्रेजों ने 1885 में ही यह योजना बना ली थी कि किसी भी तरह जम्मू-कश्मीर के दुर्गम व सुरक्षित क्षेत्र गिलगिट व बलूचिस्तान पर कब्जा करना है। जिससे अमेरिका की सैन्य गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित स्थान मिल सके। लिहाजा अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक इस क्षेत्र को ‘गिलगिट एजेंसीÓ नाम देकर 1889 में अपने कब्जे में ले लिया। इसके अधीनता में आते ही सिंधू नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिम तट तक समूचे पर्वतीय भू-भाग पर अंग्रेजों का नियंत्रण हो गया। इस समय गिलगिट में प्रतापसिंह राजा रणवीर सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में शासक थे। प्रतापसिंह अंग्रेजों की साजिश का शिकार हो गए।

गुलाब सिंह की मृत्यु के बाद हरिसिंह जब राजा बने तो 1925 में उनकी आंखें खुलीं और गिलगिट की साजिश को समझा। तब हरिसिंह ने हिम्मत व सख्ती से काम लेते हुए अपनी सेना गिलगिट भेजकर अंग्रेजी सेना को गिलगिट छोडऩे को विवश कर दिया और यूनियन जैक उतारकर कश्मीरी झंडा किले पर फहरा दिया। यह अप्रत्याशित घटनाक्रम अंग्रेजों को एक शूल की तरह चुभता रहा। 1930 में जब स्वतंत्रता आंदोलन एक प्रखर राष्ट्रवाद के रूप में देशव्यापी हो गया तो इस राजनीतिक समस्या के हल के बहाने लंदन में गोलमेज सम्मेलन आहूत किया गया। भारतीय राजाओं के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में हरिसिंह ने इसमें हिस्सा लिया। यहां हरिसिंह ने गिलगिट बलूचिस्तान समेत, संपूर्ण जम्मू-कश्मीर को ‘संघीय राज्य बना देने की पुरजोर पैरवी की। किंतु यह मांग अंग्रेजों की मंशा के अनुकूल नहीं थी, इसलिए सिरे से खारिज कर दी।

यहां अंग्रेजों ने गिलगिट क्षेत्र से हरिसिंंह द्वारा अंग्रेज सेना की बेदखली की गई थी, उसके प्रतिकार स्वरूप साजिश तो रची ही, औपनिवेशिक कूटनीति व भारत को विभाजित करने की मंशा को फलीफूत देखने के नजरिए से शेख अब्दुल्ला को महत्व देकर उसे कश्मीरी शासक के विरुद्ध उकसाना शुरू कर दिया। नतीजतन शेख ने अलगाववादी संगठन मुस्लिम कांफ्रेंस की नींव डाल दी। इसी दौरान शेख की मुलाकात नेहरू से हुई, जो मित्रता में बदल गई। 1932 से ही शेख ने कश्मीर पर नाजायज कब्जे के लिए जंग छेड़ दी।

इसके बाद से लेकर 1947 तक के कालखंड में 1942 की अगस्त क्रांति और दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जब फिरंगी हुकूमत के खिलाफ जबरदस्त असंतोष और सशस्त्र संघर्ष की घटनाएं आम हो गईं तो अंग्रेजों ने अनुभव किया कि अब भारत पर नियंत्रण संभव नहीं है, तब उन्होंने भारतीय रियासतों के विलीनीकरण के लिए धार्मिक व क्षेत्रीय उपराष्ट्रीयताओं को भी उकसाना शुरू कर दिया। फलत: शेख समेत अनेक हिंदू व मुस्लिम नरेशों में एक नए स्वतंत्र देश पर राज करने की मनोकमना अंगड़ाई लेने लगी। जबकि रियासतों का विलय भारतीय राष्ट्र को अखंड भारत का रूप देकर एक सशक्त व एकीकृत संविधान द्वारा संचालित राजनीतिक ईकाई का निर्माण करना था।

इसी समय शेख ने स्वतंत्र कश्मीर का सुल्तान बनने का सपना देखना शुरू कर दिया। मुस्लिम लीग तो जिन्ना के नेतृत्व में पहले से ही मुसलमानों के लिए पृथक मुस्लिम देश बनाने की मांग कर रही थी। 1946 में शेख ने हरिसिंह के विरुद्ध ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो आंदोलन छेड़ दिया। शेख की गिरफ्तारी हुई और उन्हें तीन साल की सजा सुनाई गई। इस गिरफ्तारी के बाद कश्मीर की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में थी। किंतु यह गिरफ्तारी नेहरू हो रास नहीं आई।

नेहरू ने शेख की गिरफ्तारी को गलत ठहराते हुए दिल्ली के राजनीतिक हलकों में हरिसिंह को दोषी ठहराना शुरू कर दिया। नेहरू शेख को छुड़ाने के लिए इतने उतावले हो गए कि जब देश स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक लड़ाई लड़ रहा था, तब 19 जून 1946 को नेशनल ऐयरवेज के हवाई जहाज से लाहौर होकर रावलपिंडी पहुंचे और फिर रावलपिंडी से कार द्वारा श्रीनगर पहुंच गए। यहां के कश्मीरी पंडितों ने नेहरू को समझाइश भी दी कि आपको गुमराह किया जा रहा है, महाराजा अपनी जगह सही हैं। किंतु नेहरू को ये शब्द कानों में पिघले शीशे की तरह लगे। हरिसिंह ने नेहरू का कहना नहीं माना तो सत्याग्रह की घोषणा कर दी। मित्रता के भुलावे में नेहरू द्वारा की गई यह भूल और शेख को छुड़ाने की जिद्द व जुनून कालांतर में ऐतिहासिक भूल साबित हुए।

हरिसिंह ने कठोरता बरतते हुए नेहरू के हठ को सर्वथा नकार दिया और उन्हें हिरासत में लेकर कश्मीर की सीमा से बाहर का रास्ता दिखाकर रिहा कर दिया। नेहरू ने हरिसिंह से बदला लेने का संकल्प ले लिया। इसलिए देश की 562 रियासतों को विलय करने का जो दायित्व पटेल बड़ी चतुराई से संभाल रहे थे, उसमें एक जम्मू-कश्मीर का दायित्व नेहरू ने जबरदस्ती ले लिया। 24 मार्च 1947 को माउंटबेटन वायसराय होकर आए। उन्होंने भारत विभाजन का प्रस्ताव तैयार किया। 18 जुलाई 1947 को ब्रितानी हुकूमत ने अनुमोदन भी कर दिया। इसी विधेयक के तहत भारत को दो स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्यों में बांट दिया गया। जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय नेहरू के हाथ में होने के कारण असमंजस में रहा।

डोगरा राजा हरिसिंह जहां कश्मीर की स्वतंत्र राज्य की परिकल्पना कर रहे थे, वहीं उनके प्रधानमंत्री रामचंद्र काक पाकिस्तान के साथ विलय पर विचार कर रहे थे, क्योंकि उनकी पत्नी यूरोपियन थीं, इसलिए उनकी आंखें मुंद गईं थीं। इसी अनिश्चिता के दौर में 22 अक्टूबर 1947 को शेख की शह पर पाक फौज जीपों व ट्रकों पर सवार होकर कश्मीर में चढ़ी चली आई। इस संकट से मुक्ति के लिए हरिसिंह विवश हुए और उन्होंने 26 अक्टूबर 1947 को विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद 27 अक्टूबर 1947 को कबिलाइयों को बेदखल करने के लिए हवाईजहाज से सेना भेज दी गई। भारतीय सैनिकों ने कबिलाइयों को खदेड़ दिया, किंतु दुर्गम क्षेत्र होने के कारण मुजफ्फराबाद का गिलगिट व ब्लूचिस्तान क्षेत्र पाक के कब्जे में बना रहा।

नेहरू जल्दबाजी में संयुक्त राष्ट्र संघ चले गए। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् ने इसे विवादित क्षेत्र घोषित कर दिया। परिणाम स्वरूप युद्धविराम तो हो गया, लेकिन कश्मीर की शासन व्यवस्था को लेकर नेहरू, हरिसिंह और शेख के बीच दिल्ली समझौता हुआ। जिसके आधार पर ही नेहरू ने शेख के सुपुर्द जम्मू-कश्मीर की कमान सौंप दी। इसके बाद कश्मीर को विशेष दर्जा देने के लिए 370 का अनुच्छेद पटेल और अंबेडकर के विरोध के बावजूद जोड़ दिए गए। नेहरू ने इतिहास की ये गंभीर भूलें हरिसिंह को सबक सिखाने की दृष्टि से थीं, लेकिन कालांतर में शेख अब्दुल्ला देश व नेहरू के लिए ऐसा भस्मासुर साबित हुआ कि नेहरू ने 9 अगस्त 1957 को राष्ट्रद्रोह के आरोप में शेख को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। यह वह साल था, जब नेहरू विशेष दर्जे के प्रावधान खत्म कर सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वे इस मुगालते में थे कि घिसते-घिसते यह अनुच्छेद स्वयं घिस जाएगा।

(लेखक साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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