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आध्यात्मिकता और पंथाचार में भिन्नता

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प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

मुझसे कई बार पंथाचार और आध्यात्मिकता के बीच के अंतर और महामारी के इस काल में आध्यात्मिकता की भूमिका के महत्त्व के बारे में प्रश्न पूछे गए हैं। इस सप्ताह,मेरा यह आलेख इसी प्रासंगिक प्रश्न के उत्तर को समर्पित है।

पंथ और अध्यात्म ने सदैव व्यापक पंथी/आध्यात्मिक विश्वासों, प्रथाओं और अनुभवों के रूप में हम सभी के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। परिणामस्वरुप,पंथ और आध्यात्मिकता के मनोवैज्ञानिक अन्वेषण को कई लोगों ने समर्थन भी दिया, लेकिन व्यवहारवाद के उदय के साथ यह शनै: शनै: लप्त हो गया। पंथाचार आमतौर पर संरचित, संस्थागत प्रथाओं, अनुष्ठानों और आस्थाओं, रूढि़वाद, सत्तावाद और शुश्रूषा से सम्बंधित होता है। वहीं दूसरी ओरआध्यात्मिकता, आमतौर पर ‘पवित्रता और ‘व्यक्तिगत श्रेष्ठता की भावनाओं से जुड़ी होती है; जहां श्रेष्ठता,’व्यक्तियों की वह क्षमता है जिससे वे अपने समय और स्थान की तात्कालिक भावना से परेअपने जीवन को एक बड़े, अधिक उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण से देख सकें।

नवीन अध्ययनों के अनुसार, स्वयं को ‘आध्यात्मिक किन्तुपंथी/पंथाचारी नहीं मानने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है; और इनके स्वतंत्र, शिक्षित और अज्ञेयवादी होने की अधिक संभावना है।इनकी उच्च आय है, ये अपरंपरागत ‘नए युग के विश्वास रखते हैं, इनके अनुभव ‘अनन्य, अद्वितीय और रहस्यमयÓ हैं, और इनमेंपारंपरिक मान्यताओं को धारण करने या इनमें पंथाचारकी भावना होने की संभावना कम है।


व्यक्तिपंथाचार को नकारात्मक रूप से और उत्कृष्टताप्राप्त करने में एक बाधा के रूप में देखते हैं, जबकि आध्यात्मिकता को पारगमन के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण के रूप में जाना जाता है। हाल ही मेंकुछ अध्येताप्रश्न कर रहे हैं, कि क्या आध्यात्मिकता को किसी उच्च शक्ति या श्रेष्ठता की भावनाओं से जोड़ा जाना चाहिए? उदाहरण के लिए, अपने अध्ययनों मेंमैंने आध्यात्मिकता को इस प्रकार परिभाषित किया है: ‘हमारी स्वयं की समझ, जीवन में उद्देश्य और ब्रह्माण्ड से हमारे सम्बन्ध की समझ के माध्यम से हमारे विवेक का विकास (और हमारे दायित्वों का विस्तार), और तद्पश्चात, इस विकसित विवेक के अनुसार कार्य करनाÓ। मेरी यह परिभाषा वेदों पर आधारित है, जो विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ माने जाते हैं और अपने संदेश और अर्थ में सार्वभौमिक हैं।


आध्यात्मवाद से कई सकारात्मक विशेषताएं जुड़ी हैं। जर्किविज और गियाकैलोन ने एक मूल्य तंत्र बनाया और इसका उपयोग कार्यस्थल की आध्यात्मिकता का अध्ययन करने के लिए किया। इस तंत्र द्वारा समर्थित आध्यात्मिक मूल्य हैं – परोपकार, उदारता (दीर्घकालिक केंद्र बिंदु), मानवतावाद, अखंडता, न्याय, पारस्परिकता (अंतरसंबंध और परस्पर-निर्भरता को पहचानना), ग्रहणशीलता, सम्मान, जिम्मेदारी और विश्वास। इसके अतिरिक्त, वीएमएस मापदंड आध्यात्मिकता को तीन आयामों में मापता है: दृढ़ता, आत्मनिरीक्षण और समभाव।


आध्यात्मिकता कई सकारात्मक परिणामों से जुड़ी है, इसकी पुष्टि करने के लिए अब कई सबूत हैं। मनोवैज्ञानिक आयाम में, आध्यात्मिकता नकारात्मक रूप से अवसाद, चिंता और तनाव से संबंधित है और सकारात्मक रूप से कल्याण, और प्रतिकूलताओं और परिवर्तनों से निपटने और उनका सामना करने से संबंधित है। सामाजिक आयाम में, चूंकि आध्यात्मिकता मानवीय गुणों, जैसे विनम्रता, धैर्य, क्षमा, आत्म-अनुशासन, ईमानदारी, आदि को बढ़ावा देती है, इसलिए इसे बेहतर सामाजिक समर्थन, परस्पर जुड़ाव और समुदाय की भावना, वैवाहिक स्थिरता और न्यूनतम आपराधिक गतिविधियों से संबंधित माना गया है।

शारीरिक स्वास्थ्य के संदर्भ में, आध्यात्मिकता सुरक्षित लैंगिकव्यवहारों, धूम्रपान, नशीली दवाओं और शराब के सेवन में कमी, अधिक व्यायाम और बेहतर आहार से जुड़ी हुई है।संगठनों मेंआध्यात्मिकता संगठनात्मक प्रतिबद्धता और स्नेहपूर्ण प्रतिबद्धता, संगठनात्मक परिवर्तन के बेहतर प्रबंधन, प्रदर्शन और विकास, कार्यभार को बेहतर ढंग से संभालने, नौकरी की संतुष्टि, कार्यस्थल पर उद्देश्य की भावना और नैतिक व्यवहार से संबंधित है।


यह सब कुछ यही सिद्ध करता है कि आध्यात्मिकता नैतिक निर्णय लेने, नैतिक नेतृत्व, कार्य-जीवन संतुलन और प्रसन्नता जैसे कई महत्वपूर्ण चर से संबंधित है। कोविड-19 महामारी के इस वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमारे लिए आध्यात्मिकता और उसकी बारीकियों को बेहतर ढंग से समझना महत्वपूर्ण है -न सिर्फस्वयं की कुशलता के लिए, अपितु अपने आस-पास के अन्य सभी लोगों की मदद करने, और प्रसन्नता बांटने के लिए।

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