Home लेख आहार : कचौरी…नाम सुनते ही आ जाए मुंह में पानी

आहार : कचौरी…नाम सुनते ही आ जाए मुंह में पानी

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कहीं भी घूम आइए, कचौरी जरूर खाइए। क्योंकि देश के कई शहरों में यह पकवान अलग-अलग अंदाज और स्वाद में जुबान पर चढ़ा हुआ मिलेगा। और उस शहर में उसके चटोरों की बड़ी संख्या भी जरूरत पाइएगा। कचौड़ी या कचौरी ! संपूर्ण अल्पाहार जिसमें मूंग की छिलका रहित दाल, बेसन और मिर्च – मसाले ने मैदे का खोल ही नहीं भरा, बल्कि हर मुंह को रस से भी परिपूर्ण किया है। दुनिया को यह भारतीय स्वाद और रस की सौगात है!

पिछली सदी में कचौड़ी का व्यवसायीकरण हुआ अनेक नवाचारों के साथ कचौड़ी ने अपने कलेवर और फ्लेवर बदले! रसोईघर से यह मॉल तक लोकप्रिय हुई। नमकीन और मसालेदार ही नहीं, मीठी कचौड़ी भी जबां पर चढ़ बैठी! वरना मैं तो यही जबां पर लिए बैठा था : हिंग्वधूपितं मुद्गद्विदलपूरितं रसमयञ्च। तीक्ष्णस्वादपूर्णं स कचौरीति कथ्यते।। (आहारवेद) कचौड़ी के नाम पर गांव, गली, चौराहा, घर और दुकान है। आदमी के नाम भी हुए! ऐसा संयोग बंगाल से लेकर राजस्थान और श्रीनगर से लेकर नागरकोइल तक तो है ही; नेपाल, सिंध, बलुचिस्तान और कांधार तक भी रहा है। क्योंकि, कचौड़ी अल्पाहार में ललित व लोकप्रिय रही है और कलेवा की कमसिन सखी भी…! लोगों के नाम भी इस व्यंजन पर पड़े-कजोड़ीमल, कचोरसिंह, पकचोड़ी लाला (या पचकोडी लाला), कचोरी देवी/बाई।

जोधपुर की प्याज वाली और मावे वाली कचौरी पूरे देश में मिलती है लेकिन जोधपुर का स्वाद, क्या कहिए। यह बड़े आकार की होती है लेकिन सीहोर में छोटी सी मोदक की तरह आकृति की कचौरी खाने के लिए भोपाल से तक लोग पहुंचते हैं। राजस्थान के उदयपुर शहर में जगदीश मंदिर मार्ग पर पालीवाल रैस्टोरेंट की कचोरी का स्वाद दशकों बाद भी यथावत है। एक बार जो इसका रसास्वादन कर ले तो बस कभी भूल नहीं पायेगा। उदयपुर मे किसी समय लल्लूराम की कचौरी भी प्रसिद्ध थी, तो कोटा मे अभी भी नयापुरा चौराहे की तीखी वाली मशहूर है। कोटा को कचौरी का शहर ही कहा जाता है। रतलाम में भी तीखी कचौरी के ठिकाने भीड़ जुटाते हैं।

यहां एक दुकान पर तो कचौरी में गर्म तेल अलग से उड़ेलकर परोसी जाती है। उत्तरप्रदेश में कुछ जगह उङद की दाल भी कचौरी खाई जाती है। लखनऊ क्षेत्र में कचौरी को खस्ता भी कहा जाता है। कभी चटनी तो कभी रायता भरकर भी खाया जाता है। बीकानेर के अलावा बमुश्किल कहीं मौठ दाल का उपयोग या उत्पादन होता होगा । इसी वजह से यहां निर्मित भुजिया भी विश्वप्रसिद्ध हुए हैं। इधर आगरा मथुरा में तो प्रात: कचौड़ी, बेड़ई, जलेबी का ही नाश्ता होता है। इलाहाबाद में इससे नाश्ता होता है।

सब्जी रायता अचार भी साथ में होता है। नेतराम और सुलाकी की कचौड़ी जिसने खा ली, वह फिर उन्हीं का हो गया और तो और, भगवान भी कचौड़ी खाते हैं। करौली राजस्थान के मदन मोहन मंदिर में मदनमोहनजी को लगने वाले भोग में कचौरी भी शामिल होती है जो शुद्ध देसी घी से बनती है।यह एकदम खस्ता होती है और इसमें भुनी हुई उड़द की दाल व कालीमिर्च और सेंधा नमक डला होता है। यह पंद्रह दिन तक खराब नहीं होती। एक सामान्य आकार की कचोरी में लगभग 700 कैलोरी ऊर्जा होती है। मोगर के भरावन की प्लेन कचौरी हो या हींग वाली या आलू के भरावन की या फिर प्याज के भरावन की… कचौरी सबकी प्रिय… गरमागरम कचौरी ऐसे ही कोरी खाओ या हरी-लाल चटनी के साथ खाओ या फिर आलू की सब्जी के साथ…।

(श्रीकृष्ण जुगनू की फेसबुक वॉल से )

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