आत्मनिर्भरता और रोजगार बढ़ाएगा ‘हीरा’

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  • छतरपुर जिले के बक्सवाहा में प्रस्तावित हीरा उत्खनन

उत्खनन के लिए आस्ट्रेलिया की रियो टिंटों कंपनी को 954 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई थी। लेकिन कंपनी 2017 में परियोजना से बाहर हो गई। अब एस्सेल को 590 हेक्टेयर भूमि कम करके महज 364 हेक्टेयर भूमि का पट्टा एस्सेल को दिया गया है। जिससे वन क्षेत्र को हानि न हो। इस भूमि से 3.4 करोड़ कैरेट्स हीरा निकाला जाएगा।

  • प्रमोद भार्गव

आजकल मध्यप्रदेश में छतरपुर जिले की शुरू होने जा रही हीरा खदानें चर्चा में है। जिले के बक्सवाहा क्षेत्र में ‘बंदर हीरा खदानÓ का पट्टा मध्यप्रदेश सरकार ने आदित्य बिरला समूह की खनन कंपनी एस्सेल को दिया है। इसमें उत्खनन शुरू हो जाता है तो पचास हजार करोड़ के हीरे प्राप्त किए जाएंगे। साफ है, ये हीरे सरकार की आमदनी का बड़ा जरिया तो बनेंगे ही, प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के साथ कुशल-अकुशल हजारों बेरोजगारों को बड़ा रोजगार भी देंगे।

न्ना के बाद हीरा उत्खनन के क्षेत्र में छतरपुर जिले की पहचान देशव्यापी स्तर पर बनेगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान जल्द से जल्द हीरा खनन का काम शुरू कराकर प्रदेश को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने की तैयारी में हैं। इस खदान का पता 2005 से 2011 के बीच चला था। इसके उत्खनन के लिए आस्ट्रेलिया की रियो टिंटों कंपनी को 954 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की अनुमति दी गई थी। लेकिन कंपनी 2017 में परियोजना से बाहर हो गई।

अब एस्सेल को 590 हेक्टेयर भूमि कम करके महज 364 हेक्टेयर भूमि का पट्टा एस्सेल को दिया गया है। जिससे वन क्षेत्र को हानि न हो। इस भूमि से 3.4 करोड़ कैरेट्स हीरा निकाला जाएगा। अनुमान है कि यहां प्रतिवर्ष तीन लाख कैरेट्स कच्चे हीरे उत्पादित किए जाएंगे। इस परियोजना के शुरू होते ही भारत दुनिया के 10 सबसे बड़े कच्चे हीरे उत्पादन करने वाले देशों में शामिल हो जाएगा। उत्पादन शुरू होने के साथ ही बंदर हीरा खदान एशिया की सबसे बड़ी हीरों के खनन से जुड़ी खदान होगी। इसकी गिनती दुनिया की सबसे बड़ी 15 हीरा खदानों में शुमार हो जाएगी।

छतरपुर जिला सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा जिला है। चूंकि यहां हीरों के उत्खनन के साथ इसे तराशने, पोलीस करने और गहने बनाने के उद्योग विकसित होंगे, इसलिए छतरपुर की सूरत बदल जाएगी। प्रदेश में हीरों की नीलामी के नए केंद्र भी बनेंगे। इस क्षेत्र में कोई गांव नहीं है, इसलिए सरकार को विस्थापन का संकट झेलना नहीं पड़ेगा। एस्सेल को काम देने से पहले 275 करोड़ रुपए अग्रिम धनराशि के रूप में सरकार को देने होंगे। इस वनभूमि में जो जंगल हैं, वह छतरपुर जिले के कुल जंगल का मात्र 0.25 प्रतिशत है।

गोया, परियोजना पर अमल होने से 400 पेड़ों में से मात्र एक पेड़ प्रभावित होगा। इसके बदले में कंपनी को 3.83 लाख पेड़ लगाने होंगे। जबकि प्रभावित पेड़ों की संख्या 2.15 लाख हैं। पौधारोपण का सिलसिला उत्खनन की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही आरंभ हो जाएगा। इसीलिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी दी है कि विकास परियोजना में कटने वाले पेड़ों से कई गुना ज्यादा पेड़ लगाए जाएंगे, जिससे पर्यावरण के नुकसान की भरपाई की जा सके।

भूगर्भ में कार्बन का शुद्धतम रूप हीरा है। मन को प्रफुल्ल करने वाली अनूठी और बेशकीमती दौलत है हीरा। और इस जगमग हीरे की खानें हैं विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो के आसपास। पन्ना जिले के ग्राम मझगांव और छतरपुर के ग्राम बंदर में हीरे की विश्व प्रसिद्ध खदानें हैं। इन्हीं खदानों के गर्त में दबा पड़ा कोयला कई जटिल क्रिया-प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद चमचमाता और चकाचैंध करता स्वच्छ एवं सुस्पष्ट हीरा के रूप में परिवर्तित होता है। कभी आंध्रप्रदेश की गोलकुंडा और कुलूर की खानों से भी हीरे निकाले जाते थे, लेकिन अब ये खानें इतिहास की दंतकथाएं भर रह गई हैं। भारत में वर्तमान में केवल पन्ना और छतरपुर में ही हीरे की खानें हैं, जो भारतीय खनिज विकास निगम के अंतर्गत हीरा उत्पादन के कार्य से जुड़ी हैं। भारत के अलावा दुनिया के 20 अन्य देशों में भी हीरे की खदानें हैं।

खानों में हीरा की तलाश कर उसे कैसे तराशा जाता है, यह जानने से पहले थोड़ा हीरे के इतिहास के बारे में जान लें। हीरा यानी एक रत्न, जो पत्थर की एक जाति है और अमूल्य व दुर्लभ है। हीरे को संस्कृत में हीरक, चंद्र, मणिवर, वज्रक, हीर, रत्नमुख्य, अभेद्य आदि नामों से जाना जाता है। एक जमाना था जब पूरी दुनिया में भारत की गोलकुण्डा (आंध्रप्रदेश) खानों से हीरे निर्यात किए जाते थे। पंद्रहवीं शताब्दी तक हीरों के गहने केवल राजा-महाराजाओं के उपयोग तक सीमित थे।

यूरोपीय देशों में फ्रांस ही एकमात्र ऐसा देश था, जो आधुनिक फैशन व आभूषण अपनाने में अव्वल था। सन् 1734 में यहीं की एक ऐगन्स सोरल नाम की धनाढ्य महिला ने हीरे के गहने पहनकर राजा-महाराजाओं के मिथक को तोडऩे का दुस्साहस कर तहलका मचाया। कालांतर में धनी व संभ्रात महिलाओं में हीरे के गहने पहनने ही होड़ सी लग गई और हीरा स्तरीय जीवन का प्रतीक बन गया। इससे फ्रांस व अन्य यूरोपीय देशों में हीरे की मांग बढ़ गई और भारत लगातार तीन सौ साल तक इन देशों में हीरों की आपूर्ति करता रहा। इसी प्रकार फ्रांस के टैवर्नियर नाम के रत्नों के एक व्यापारी ने सन् 1688 में भारत की यात्रा की। इस यात्रा में उसने गोलकुंडा खानों में हीरे का उत्खनन किए जाने का वृत्तांत लिखा है। हीरे का गहनों में इस्तेमाल सबसे पहले इटली की राजधानी रोम में शुरू हुआ। यह घटना ईसा से करीब चार सौ साल पहले घटी, ऐसा माना जाता है।

मध्यप्रदेश की हीरा खानों से दौलत के अद्भुत पाषाण को निकालने के लिए करीब डेढ़ हजार मजदूर रोज ठेकेदारों को पट्टे पर दिए गए जमीन के टुकड़ों में खुदाई करते हैं। जमीन का पट्टा भारतीय खनिज विकास निगम द्वारा दिया जाता है, जिसके सर्वेसर्वा पन्ना और छतरपुर के पदेन जिलाधीश होते हैं। यह पट्टा ठेकेदार को मात्र 25 वाई 25 का टुकड़ा दिया जाता है, जो केवल 625 वर्गफीट का होता है। ठेकेदार से इसका प्रीमियम शुल्क भी लिया जाता है। खुदाई में हीरे की प्राप्ती होती है तो उस पर 10 फीसदी हक ठेकेदार का होता है और 20 फीसदी सरकार अथवा निगम का। किंतु अब खदानें एकमुश्त ठेके पर देने की परंपरा है।

हीरों की खोज के लिए जिन गड्डों में उत्खनन किया जाता है, उन गड्ढ़ोंं का इलाका भुरभुरी एवं दोमट मिट्टी का होता है। इस मिट्टी के बीच-बीच में कार्बन की कठोर चट्टानें होती हैं। इसलिए इनकी खुदाई बेहद कठिन होती है। यदि हीरा के पारखियों को हीरे की उम्मीद दिखती है तो ज्यादा से ज्यादा 20 फीट गहरे गडढे खोदकर ही हीरा मिल जाता है। खदान के गड्डों से निकाला गया चट्टानों का करीब 500 टन चूरा एक निश्चित स्थान पर एकत्रित किया जाता है और फिर पत्थरों के इन टुकड़ों को कूटा व तोड़ा जाता है।

कुटाई का यह कार्य सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच मजदूर करते हैं। पत्थर तोडऩे के इस दुष्कर कार्य के बीच हीरे के पारखी कारीगारों को अपनी निगाहें चैकस रखनी होती हैं और पत्थर से हीरे को अलग करने का काम केवल एक हाथ से करना जरूरी होता है। मजदूरों का दूसरा हाथ पीठ के पीछे कर दिया जाता है, जिससे यकायक हीरा निकलने पर उसके चोरी किए जाने की संभावनाएं जाती रहें। इस तरह से पांच सौ टन चट्टानों की हाड़तोड़ तुड़ाई के बाद बमुश्किल दस-बारह ग्राम हीरे का चूरा मिलता है।

इन चट्टानों से मायावी पाषाण के रूप में जो हीरा निकलता है वह कार्बन का कठोरतम आकार होता है। बाद में इस साधारण पत्थर को कारीगरों के अनुभवी हाथ तराशकर इन्हें भांति-भांति के हीरों के रूप में आकार देते हैं। ये सभी आकार ज्यामितीय होते हैं।
(लेखक साहित्यकार व वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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