Home » सांकृतिक धरोहर शिव मंदिर भोजपुर

सांकृतिक धरोहर शिव मंदिर भोजपुर

  • वी एस लोधी (योगी)
    भोजपुर भोपाल से 31 किलो की दूरी पर वेत्रवती नदी के किनारे बसा है। प्राचीन काल का यह नगर ‘उत्तर भारत का सोमनाथ’ कहा जाता है। गाँव से लगी हुई पहाड़ी पर एक विशाल शिव मंदिर है। इस नगर तथा उसके शिवलिंग की पुन: स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज (1010 ई.- 105३ ई.) ने की थी। अतः इसे भोजपुर मंदिर या भोजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर पूर्ण रुपेण नहीं बन पाया। इसका चबूतरा बहुत ऊँचा है, जिसके गर्भगृह में एक बड़ा- सा पत्थर का शिव लिंग है, जिसकी ऊँचाई 3.85 मी. है। इसे भारत के मंदिरों में पाये जाने वाले सबसे बड़े शिव लिंगों में से एक माना जाता है।
    इस मंदिर के अध्ययन से हमें भारतीय मंदिर की वास्तुकला के बारे में बहुत- सी बातों की जानकारी मिलती है। गर्भगृह के ऊपर बना अधुरा गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्वान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है। चूँकि यह मंदिर ऊँचा है, इतनी प्राचीन मंदिर के निर्माण के दौरान भारी पत्थरों को ऊपर ले जाने के लिए ढलान बनाई गई थी। इसका प्रमाण भी यहाँ मिलता है।
    मंदिर के निकट स्थित बाँध को राजा भोज ने बनवाया था। बाँध के पास प्राचीन समय में प्रचुुर संख्या में शिवलिंग बनाया जाता था। यह स्थान शिवलिंग बनाने की प्रक्रिया की जानकारी देता है। कुछ बुजुर्गों का कहना हैै कि मंदिर का निर्माण द्वापर युग में पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए इस शिवलिंग का निर्माण एक ही रात में किया गया था। विश्व प्रसिद्ध शिवलिंग की ऊंचाई साढ़़ेे इक्कीस फिट, पिंडी का व्यास 18 फिट आठ इंच व जलहरी का निर्माण बीस बाई बीस से हुुआ हैै। इस प्रसिद्घ स्थल पर साल में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता हैै जो मंकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व होता हैै। एक ही पत्थर से निर्मित इतनी बड़़ी शिवलिंग अन्य कहीं नहीं दिखाई देती हैै। इस मंदिर की ड्राइंंग समीप ही स्थित पहाड़़ी पर उभरी हुुई हैै जो आज भी दिखाई देती हैै। इससे ऐसा प्रतीत होता हैै कि पूर्व में भी आज की तरह नक्शे बनाकर निर्माण कार्य किए जाते रहेे होंगे। माता कुुंती के पिता का नाम भी भोज था अत: इसके नाम से भोजपुर पड़़ा व यह द्वापर युग का निर्मित मंदिर हैै व जीर्णशीर्ण होने पर धार के राजा परमार वंशी राजाभोज ने इसका जीर्णोद्घार कराया।
    भोजपुर से कुछ दूरी पर कुमरी गाँव के निकट सघन वन में वेत्रवती नदी का उद्गम स्थल है। यह नदी एक कुण्ड से निकलकर बहती है। भोपाल ताल भोजपुर का ही एक तालाब है। इसके बाँध को मालवा के शासक होशंगशाह (1405- 1434) में अपनी संक्षिप्त यात्रा में अपनी बेगम की मलेरिया संबंधी शिकायत पर तुड़वा डाला था। इससे हुए जलप्लावन के बीच जो टापू बना वह ‘द्वीप’ कहा जाने लगा। वर्तमान में यह ‘मंडीदीप’ के नाम से जाना जाता है। इसके आस- पास आज भी कई खंडित सुंदर प्रतिमाएँ बिखरी पड़ी हैं।
    यह मन्दिर मूलतः एक 18.5 मील लम्बे एवं 7.5 मील चौड़े सरोवर के तट पर बना था। इस सरोवर की निर्माण योजना में राजा भोज ने पत्थर एवं बालू के तीन बांध बनवाये। इनमें से पहला बांध बेतवा नदी पर बना था जो जल को रोके रखता था एवं शेष तीन ओर से उस घाटी में पहाड़ियाँ थीं। दूसरा बांध वर्तमान मेण्डुआ ग्राम के निकट दो पहाड़ियों के बीच के स्थान को जोड़कर जल का निकास रोक कर रखता था एवं तीसरा बांध आज के भोपाल शहर के स्थान पर बना था जो एक छोटी मौसमी नदी कालियासोत के जल को मोड़ कर इस बेतवा सरोवर को दे देता था। ये कृत्रिम जलाशय १५वीं शताब्दी तक बने थे।

Swadesh Bhopal group of newspapers has its editions from Bhopal, Raipur, Bilaspur, Jabalpur and Sagar in madhya pradesh (India). Swadesh.in is news portal and web TV.

@2023 – All Right Reserved. Designed and Developed by Sortd