Home लेख तथ्यों से मुंह न मोड़ें सेंट्रल विस्टा परियोजना के आलोचक

तथ्यों से मुंह न मोड़ें सेंट्रल विस्टा परियोजना के आलोचक

193
0

इस पुनर्विकास परियोजना में संसद भवन का विध्वंस नहीं होगा बल्कि कोविड-19 की लड़ाई से समझौता किए बिना यहां रोजगार पैदा होगा

सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत नए संसद भवन का निर्माण, हमारे लोकतंत्र के मंदिर के रूप में, जनता के प्रतिनिधियों को एक स्वास्थ्यप्रद, अत्याधुनिक कार्यालय और बैठक स्थान प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। इसे आधुनिक तकनीक से भूकम्प रोधी और कम से कम 250 वर्ष की आयु के साथ तैयार किया जा रहा है। राजपथ के किनारे बनने वाले सरकारी कार्यालय भारत सरकार के प्रति वर्ष किराए के रूप में करोड़ों रुपये बचाएंगे।

ओपाली ओपराजिता

गार्जियन में 4 जून को शिल्पकार अनीश कपूर ((भारतीय मूल के एक ब्रितानी शिल्पकार) का एक लेख (मोदी द्वारा संसद की इमारत को हटाना दिखाता है कि वे हिंदू तालिबान के निर्माता हैं) बेहद आपत्तिजनक, मगर उम्मीद के मुताबिक है। जब भारत कोविड-19 की दूसरी बेहद खतरनाक और राक्षसी लहर से जूझ रहा है, इस बीच अंतर्राष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया दोनों पर आप भारत और यहां की सरकार पर आत्म-धार्मिकता और प्रदर्शनकारी राय के प्रसारण के साक्षी रहे हैं। इनमें भारत सरकार को सीधे निशाना बनाया गया है।

सबसे पहले, जैसा कि नई दिल्ली की सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना आकार ले रही है, इसके प्रतिष्ठित संसद भवन को ध्वस्त नहीं किया जा रहा है, न ही इसके शानदार नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को हटाया गया है जहां से भारत सरकार के कई कार्यालय चलते हैं। विरासत मानकों के अनुसार, बाद में यहां राष्ट्रीय संग्रहालय का उन्नयन किया जाएगा। अनीश कपूर, कार्यकर्ता और मीडिया को इन तथ्यों को जानने की जरूरत है जिन्हें स्पष्ट तौर पर उन्होंने नजरांदाज किया है-

भारत का संसद भवन, जो अपने समय में सुंदर और मजबूत था, अफसोस कि अब यह जीर्ण-शीर्ण हालत में है। यह 100 साल से अधिक पुराना है, जर्जर, जोखिम भरा है और भूकंप-रोधी तकनीक युक्त नहीं है। यह तेजी से और कमजोर पड़ रहा है। छत के नीचे तार की जाली लगाई गई है ताकि यहां आने वालों के सिर पर मलबे का कोई टुकड़ा न गिर पड़े और भगवान न करे, उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दे।

यहां सीलन के चलते बदबू भी है और किसी भी तरह से यह लोगों की सामूहिक गतिविधि के लिए दुरुस्त नहीं है। मुझे अभी तक याद है कि जब 1999 में मैंने पहली बार उन नेताओं के साथ संसद में भाग लेना शुरू किया था जिनके साथ मैंने काम किया था, संसद भवन की अंदर से स्थिति तब भी ऐसी ही थी। अपनी बेहतरीन बाहरी सुंदरता के बावजूद हमारा संसद भवन, वास्तव में, अंदर से एक अंधकारमय सदन ही है।

2012 में, यह यूपीए सरकार ही थी जिसने एक बेहद जरूरी नए और आधुनिक संसद भवन का विचार पेश किया और जिसे सभी राजनैतिक दलों का समर्थन मिला। जब भाजपा सरकार ने इसी को आगे बढ़ाने की शुरुआत की तो यह अमृत तेजी से जहर में बदल गया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने जिसे ‘राष्ट्रीय महत्वÓ की परियोजना कहा है, उस पर सार्वजनिक बहस में हमें अधिक स्थिरता और परिपक्वता की आवश्यकता है। सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत नए संसद भवन का निर्माण, हमारे लोकतंत्र के मंदिर के रूप में, जनता के प्रतिनिधियों को एक स्वास्थ्यप्रद, अत्याधुनिक कार्यालय और बैठक स्थान प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। इसे आधुनिक तकनीक से भूकम्प रोधी और कम से कम 250 वर्ष की आयु के साथ तैयार किया जा रहा है। राजपथ के किनारे बनने वाले सरकारी कार्यालय भारत सरकार के प्रति वर्ष किराए के रूप में करोड़ों रुपये बचाएंगे। इस परियोजना पर अगले पांच वर्षों के लिए 13,450 करोड़ रुपये (1.8 अरब डॉलर) का आवंटन किया गया है।

महामारी के इस मुश्किल वक्त में इस परियोजना से श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है। भ्रामक मीडिया रिपोर्टों के विपरीत, निर्माण स्थल पर श्रमिकों को कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए अच्छे तरीके से रखा गया है। दिल्ली के रईस क्लबों के लॉन में खड़े होकर प्रदर्शन करने वाले लोगों को असल में आर्थिक मंदी के इस दौर में समाज के वंचित वर्गों के लिए महत्वपूर्ण रोजगार पैदा करने के ठोस तरीकों के बारे में सोचना चाहिए। कम से कम सेंट्रल विस्टा परियोजना श्रमिकों को रोजगार तो प्रदान कर रही है।

इस झूठ का पहले ही पर्दाफाश हो चुका है कि सेंट्रल विस्टा परियोजना पर पैसा स्वास्थ्य बजट से कटौती करके किया जा रहा है। 35000 करोड़ रुपए पहले ही वैक्सीन के लिए आवंटित किए जा चुके हैं और साथ ही स्वास्थ्य बजट को भी बढ़ाया गया है। अनीश कपूर की झुंझलाहट ने एक नई गिरावट को तब छुआ जब उन्होंने मनगढ़ंत तरीके से यह कहा कि संसद भवन और नॉर्थ, साउथ ब्लॉक को इसलिए गिराया जा रहा है क्योंकि भारत सरकार को कुछ भी इस्लामिक पसंद नहीं। उन्होंने इस प्रक्रिया को ‘डी-इस्लामाइजेशन’ की प्रकिया बताया और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपशब्द कहे। उनका यह डी-इस्लामाइजेशन का आरोप सीधे तौर पर उनका मतिभ्रम है, और इससे ज्यादा कुछ नहीं।

अगर भारत सरकार को इस्लामिक पुरातत्व और वास्तुशिल्प से इतनी दिक्कत होती तो वह आज तक हुमायूं का मकबरा, जामा मस्जिद, कुतुब मीनार, सफदरजंग का मकबरा, लोधी गार्डन, पुराना किला, लाल किला और दिल्ली के आसपास की सभी ऐतिहासिक और खूबसूरत इमारतों को गिरा चुकी होती। जबकि सरकार दिल्ली के लाखों निवासियों और पर्यटकों के आनंद और सौंदर्य अनुभव को बरकरार रखने के लिए इन इमारतों के रखरखाव पर खास ध्यान देती है।

कपूर यहीं नहीं रुके। वह तो एक भ्रामक बात से दूसरी पर छलांग लगाते रहे। उसके अनुमानों से साफ लगता है कि वे तथ्यों से परे चीजों को गलत पढ़ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि संसद भवन और नॉर्थ और साउथ ब्लॉक इस्लामी वास्तुशिल्प मॉडल पर बने हैं, जो कि एकदम गलत है। सभी धर्मों और शैलियों से वास्तुकला के तत्वों को इन इमारतों के शिल्प में शामिल किया गया है, और निश्चित रूप से यह एंड्रिया पल्लाडियों का एक उल्लेखनीय प्रभाव है।


लेकिन एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने चौसठ योगिनी के शानदार हिंदू मंदिरों से भी प्रेरणा ली होगी, जो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 9वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व के हैं (मेरा मानना है कि उन्होंने इन मंदिरों से प्रेरणा ली है क्योंकि उनसे काफी समानता दिखती है)। कपूर इस स्पष्ट मॉडल और प्रेरणा को खोजने में विफल रहे हैं- एक मूर्तिकार के रूप में, आपको लगता है कि वह सबसे पहले नोटिस करने वालों में से एक होंगे। अंत में, उनका भोला-भाला लेकिन दुर्भावनापूर्ण दावा कि ये एक हिंदू तालिबान की साजिश है, पूरी तरह से विफल हो गया है। हिंदू तालिबान वाक्यांश एक विरोधाभास है : हिंदू तालिबान कभी नहीं हो सकता। इसकी आत्मा में सनातन धर्म है जिसका हिंदू पालन करते हैं और इसमें वह सब कुछ है, मगर तालिबान नहीं है।
(लेखक दुनिया भर के नेताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंधों, संचार और सार्वजनिक नीति के सलाहकार हैं।
यहां लिखे सभी विचार व्यक्तिगत हैं।)

Previous articleअब आवागमन एवं व्यवसायिक गतिविधियां होंगी व्यवस्थित
Next articleराष्ट्रीय चिकित्सक दिवस (1 जुलाई): देवदूत बनकर जान बचाते चिकित्सक

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here