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वंदनीय हो गये कोरोना योद्धा

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लाखों अनाम चेहरों के काम को समाज सदैव याद करेगा

कोरोना के इस भीषण दौर में अनेकों समूचे परिवार लील लिये। चार व्यक्तियों के परिवार में चारों की मौत, कहीं माता-पिता दोनों की मौत, और बच गये अबोध बच्चे तो कहीं परिवार के तीन कमाऊ सदस्य और तीनों की मौत, और बच गये उनके निराश्रित बेसहारा परिवार। कोरोना ने समूची दुनिया ने ये भयभीत करने वाले दारूण दु:ख दिये हैं।

कृपाशंकर तिवारी

वे सब आम इंसानों जैसे ही थे, पर वे बहुत खास हो गये। उनकी करूणा,प्रेम, त्याग, धैर्य, जुझारूपन समर्पण और उनकी मानवीय संवेदना ने उन्हें वंदनीय बना दिया। समूची दुनिया जब कोरोना वायरस से जूझ रही थी, वे अडिग नि:स्वार्थ सेवा-सहायता के लिये खड़े थे। सदैव तत्पर। प्राणों को जोखिम में डालकर पीडि़तों की सुरक्षा में। वे हमारे डॉक्टर, नर्सेस, पैरामेडिकल, सेवा प्रदाता, स्वास्थ्यकर्मी, एंबुलैंस चालक, शव वाहन चालक, सुरक्षाकर्मी, सफाईकर्मी से लेकर हजारों लाखों सेवा कर्मी, मददगार, और लाखों अनाम लोग, मानवता के सर्वश्रेष्ठ उजले चेहरे हैं। इसी समाज और व्यवस्था में जहाँ एक ओर हिंसक, वहसी, हैवान कालाबाजारी, जमाखोर, मुनाफाखोर, शोषक और लाशों के अंतिम संस्कार पर भी सौदा करने वाले दरिदें थे, वहीं ये देवता भी थे।

कोरोना त्रासदी, हमें बहुत बड़े सबक दे रही है, और भविष्य में संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं में ओर छोर से बदलाव के लिये तैयारी का संकेत दे रही है। रिश्ते नये सिरे से गढ़े, लिखे, ओर रचे जायेंगे। जहाँ अनेक जगहों पर रिश्ते बिखरे, टूटे, तार-तार हुये, वहीं इसी समाज में ऐसे चेहरे भी उभरे, जिनसे मानवीय गरिमा चमत्कृत हुई। कौन भूल सकता है उस लाचार पत्नी को, जो दसों घंटों की भयावह मुश्किल, संकट और जद्दोजहद से जूझती रही अपने पति की जीवन रक्षा के लिये दम तोड़ते पति को ऑटोरिक्शा में लेकर अस्पताल दर अस्पताल सिर पटकती रही, भीख मांगती रही, गिड़गिड़ाती ओर भटकती रही।

जीवन की अंतिम सांसो में कुछ और सांसे जोडऩे का उसका संघर्ष, कितनों ने देखा, समझा और बहुत गहरे तक उसकी वेदना को महसूस किया होगा। अंत में पति के जीवन की टूटती डोर को संभालने का उसका जतन जिसने भी देखा होगा, सिर से पैर तक काँप गया होगा। ईश्वरीय विधान भले न बदलें, पर जीवन मृत्यु का नियंता भी हिल गया होगा, जब उस पत्नी ने अपनी संपूर्ण शक्ति और भक्ति को दावं पर लगाते हुए अपने मुँह से संक्रमित पति के मुँह में सांसो को फूँककर सांसो की निरन्तरता के यत्न किये। जहाँ संक्रमित दम तोड़ते, पति की मृत्यु निश्चित थी, ऐसे में भी उसके संघर्ष को क्या नाम दिया जाये। पत्नी का यह प्रयास सौ प्रतिशत जानलेवा था, पर कुछ रिश्ते, भावनायें और समर्पण का स्तर जोखिम की सभी सीमायें पार कर रिश्तों का एक ऐसी ऊॅंचाई देता है, जिसे छूना भी संभव नहीं होता।

कोरोना के इस भीषण दौर में अनेकों समूचे परिवार लील लिये। चार व्यक्तियों के परिवार में चारों की मौत, कहीं माता-पिता दोनों की मौत, और बच गये अबोध बच्चे तो कहीं परिवार के तीन कमाऊ सदस्य और तीनों की मौत, और बच गये उनके निराश्रित बेसहारा परिवार। कोरोना ने समूची दुनिया ने ये भयभीत करने वाले दारूण दु:ख दिये हैं। परिवारों और समाज के चमकते सितारे अस्त हो गये। जीवन अभी शुरू भी नहीं हुआ था कि लौ बुझ गई। जीवन के उत्कर्ष और सर्वश्रेष्ठ समय में हजारों युवा बिदा हो गये ।

ये संकेत और एक बहुत कड़ा संदेश भी है। संपूर्ण मानवता को समाज को व्यवस्था को परिवारों को, पारिवारिक ढांचे को भी कि उन्हें फिर से नया गढऩा होगा। रिश्तों के बेहद नाजुक धागों को मजबूत करें , सुलझायें नये सिरे से परिभाषित करें। एकजुटता, त्याग, समर्पण और संबंधों की आई ठंडक को गरमाहट दें। भारत जैसा विशाल आबादी वाला देश इस विकट संकट में भयानक दंश के बाद भी संयत है। तीन करोड़ से अधिक संक्रमण और लाखों मौते, मानवता के इतिहास में एक बड़ी त्रासदी है, पर इस त्रासदपूर्ण दौर में भी देश ने जो जज़्वा, हौसला, जूनून जीवट और संघर्ष दिखाया है, वही हमारी शक्ति और वास्तविक पहचान है।

इस पहचान को कायम रखने में हमारे हजारों योद्धाओं अपने प्राण त्यागे हैं, ओर मरते दम तक अपना हौंसला कायम रखा। कैसे भूल सकते हैं, उस महान डॉक्टर के अंतिम शब्द… मै रहूं न रहॅूं पर शो मस्ट गो ऑन । देश ने सैकड़ो बहुमूल्य डॉक्टर खो दिये। वे सब निडर, कर्तव्यबोध में डूबे, सेवा की शपथ को अंतिम क्षण तक अंजाम देते रहे। पी.पी.ई.किट जो एक सामान्य व्यक्ति शायद दस मिनिट भी न पहन सके, वह उनकी दिनचर्या बन गई, वे सब डॉक्टर से इतर इंसान भी थे, लिहाजा थोड़ी सी चूक भी भारी पड़ी ओर संक्रमित हो गये।

लाख सुरक्षा, सावधानी, के बाद भी संक्रमित हुये। उन्हेंने उस हाल में अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा, पर जब वे संक्रमण के बाद बिगड़ी अवस्था में चरम पर थे, प्राण निकल रहे थे तब भी उनका संदेश वही था। हमं पीडि़तों को बचाना है। वे भले न बचे हों पर हजारों, लाखों करोड़ों को जीवनदान देकर विदा हो गये। वंदनीय हो गये। पूज्य हो गये। चैबीसों घंटे जोखिम भरे कोरोना वार्डों में तैनात नर्सेस की सेवायें और मौत से भी जूझने का उनका जज़्बा कौन भूल सकता है?

वे संक्रमितों को दौड़ते एंबुलैंस के ड्राइवर, वे शववाहन के ड्राइवर, वे सैंपलों को लेने वाले, जांच करने वाले, श्मशान और कब्रिस्तान में लाशों को अंतिम विदाई देने वाले भी हैं जिन्होंने खतरे मोल लिये और अपनी जाने गवां दी। धन्य है वे परिवार, परिवार के सदस्य जिन्होंने परिवार में संक्रमित व्यक्ति को प्रत्येक मुश्किल उठाकर सहारा दिया, भरोसा बढ़ाया। ये सहारा और भरोसा ही था जिसने लाखों जाने बचाई है। संक्रमित व्यक्ति का मनोबल टूट जाता है ओर टूटे मनोबल से जीवित रहना संभव ही है?

यह प्रमाणित सत्य है। संक्रमण के बाद भी बचने वाले अधिकांश ऐसे ही लोग जो मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत और उनके परिवार मित्र-संबंधी उनको सहारा दे रहे थे। इस भीषण विपत्ति काल में भी आवश्यक सेवाओं को लगातार संचालित करने वालों की भूमिका नि:संदेह वंदनीय है। केवल अस्पताल,डाक्टर, सेवायें और दवायें पर्याप्त नहीं होती जब तक कि दीगर सहायता सेवायें उपलब्ध न हों। सुरक्षाकर्मी और सफाईकर्मी वंदनीय है जो हमें हमारे परिवारों को, देश को जीवन की मशाल थमाकर चले गये।

वे लाखों अनाम चेहरे भी धन्य है, जिनकी पहचान पी.पी.ई. किटों में ही समा गई। वे मीडिया पर्सन्स, वे, सामाजिक कार्यकर्ता, वे शोध करने वाले वे टीका बनाने, वाले ट्रायल करने लगाने के युद्ध में शामिल, वे प्रशासक, अधिकारी, नीति निर्माता, कार्यकर्ता, के फील्ड वकर्स और नि:संदेह समग्र रूप से समाज के वे सब चेहरे वंदनीय है जिन्होंने इस विकट दौर में भी संघर्ष करते हुये देश को संकट से उबारा है। संक्रमण का भविष्य अभी भी अनिश्चित है। संक्रमण की लहरें कब, कैसे, कहाँ, आयेगी पर हमारे प्रयास, सुरक्षा और तैयारी हमारा बड़ा संबल बने, यही उम्मीद है।

(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। )

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