धर्मांतरण राष्ट्रीय अस्मिता के लिए धीमा जहर

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  • डॉ. राघवेंद्र शर्मा
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन समय-समय पर धर्मांतरण का मुद्दा उठाते रहे हैं‌। यह भी सच है कि जब जब इस सच्चाई को मीडिया अथवा अन्य माध्यमों से उजागर किया गया, तब तब तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने इसे धर्म और संप्रदाय आधारित एजेंडा करार देकर इस बेहद गंभीर मामले की अपनी ओर से इतिश्री कर दी। साथ में यह आरोप भी लगाए जाते रहे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अनुषांगिक संगठन जाति व धर्म आधारित एजेंडा सैट करने हेतु इस तरह का अनर्गल प्रलाप करते रहते हैं। लेकिन अब यही बात सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वय एम आर शाह और हिमा कोहली ने पूरी दावेदारी के साथ कही है। उन्होंने कहा है कि देश में जबरन धर्म परिवर्तन चिंता का विषय है। यह एक गंभीर मुद्दा भी है। इससे राष्ट्र की सुरक्षा और धर्म आधारित स्वतंत्रता प्रभावित होती है। इस बाबत तत्काल कड़े कदम उठाने के लिए सरकार को निर्देश दिए गए हैं‌। साथ में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा गया है कि वे प्रलोभन के जरिए किए जा रहे धर्म परिवर्तनों के मामलों को रोकने के ठोस उपाय अदालत में प्रस्तुत करें।
    इससे एक बार पुनः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि देश में धर्मांतरण के षड्यंत्र अभी भी पूरी तरह से थमे नहीं हैं। इन पर पूरी ताकत के साथ निर्णायक प्रहार करने की महती आवश्यकता है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आजादी से पहले और बाद, जिन लोगों के हाथ में देश का लोकतांत्रिक नेतृत्व रहा, उन्होंने कभी भी इस समस्या को लेकर गंभीर रुख अपनाया ही नहीं। बल्कि ऐसे लोगों को संत, मदर और फादर जैसे सम्मानजनक शब्दों से महिमामंडित किया जाता रहा, जो अपने सफेद चोले की आड़ में धर्मांतरण जैसे काले कारनामों को अंजाम देते रहे। यही नहीं, ऐसे तथाकथित समाजसेवियों और उनकी नापाक मंसूबों वाली संस्थाओं को सरकारों का खुला संरक्षण मिलता रहा। जिसके चलते इस बुराई के खिलाफ चाह कर भी नौकरशाही कोई निर्णायक कार्रवाई करने से सदैव ही बचती रही। ऐसे बेहद अनुकूल वातावरण का लाभ उठाकर ईसाई मिशनरीज जैसी संस्थाएं शिक्षा और स्वास्थ्य आदि सेवाओं की आड़ लेकर भारी पैमाने पर धर्मांतरण कराती रहीं। इन राष्ट्र विरोधी करतूतों का खुलासा इसलिए भी नहीं हो पाया, क्योंकि एक तो इन्हें तत्कालीन सरकारों का संरक्षण मिला हुआ था, दूसरे इनके कार्यक्षेत्र अधिकतर जनजातीय इलाके ही बने रहे। कारण स्पष्ट है – शहरों और गांवों का जनजीवन आजादी के बाद से ही निरंतर शिक्षित होता जा रहा है। फल स्वरूप वहां का नागरिक जागरूक हुआ है और वह ईसाई मिशनरियों द्वारा की जाने वाली तथाकथित सेवाओं के पीछे छुपे एजेंडे को भलीभांति पहचानने लगा है। यही वजह रही कि इन संस्थाओं ने शहरी क्षेत्रों को अधिकांशतः अपनी कारगुज़ारियों के लिए चुना ही नहीं। यही कारण है कि जंगलों में रहने वाले हमारे जनजातीय, आदिवासी भाइयों बहनों को भारी पैमाने पर ईसाई बनाया गया। कभी उनके बीमार होने पर दवा दारू उपलब्ध कराए जाने उपरांत यह साबित किया गया कि उनका भला ईसा मसीह की कृपा से हुआ है। कभी यह प्रलोभन दिए गए कि ईसाई लड़की से शादी करने पर अथवा ईसाई बन जाने पर उनकी माली हालत सुधर सकती है। कई बार तो विपत्तियों से घिर जाने पर उन्हें ताकीद किया गया कि उनकी मुसीबतें टल सकती हैं। बशर्ते सभी लोग धर्म परिवर्तन स्वीकार कर लें। वह तो भला हो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और वनवासी कल्याण परिषद जैसे राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत संगठनों का, जिन्होंने समय रहते इन पाप पूर्ण कृत्यों को पहचाना और लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया। जिसके अच्छे परिणाम भी देखने को मिले। लाखों जनजातीय, आदिवासी भाइयों, बहनों, बुजुर्गों और बच्चों को वापस उनके धर्म मैं ससम्मान लौटने हेतु राजी किया गया। भविष्य में पुनः ऐसी स्थितियां ना बनें। इसके लिए जितना संभव हो सके, उनके रिहायशी क्षेत्रों के पास स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार संबंधी प्रकल्प स्थापित किए गए। संघ के इन प्रयासों को देश और विभिन्न प्रदेशों की राजधानी क्षेत्रों से लेकर छोटे-छोटे गांवों, मजरों और टोलों के साथ जंगली इलाकों तक देखा जा सकता है। किंतु अभी भी इस बारे में युद्ध स्तरीय प्रयासों की आवश्यकता है। क्योंकि देश के अनेक राज्यों में आज भी ऐसी विचारधाराएं सत्ता पर काबिज हैं, जिन्हें धर्मांतरण जैसे कुकृत्य दिखाई नहीं देते। यही वजह है कि देश के अनेक राज्यों में अभी भी धर्मांतरण की साजिशें रची जा रही हैं तथा उन्हें मूर्त रूप दिया जा रहा है। यह बात अपनी जगह सही है कि केंद्र और विभिन्न राज्यों की सरकारों को धर्मांतरण जैसी बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहिए। वरना यह कृत्य धीमे जहर की भांति देश की एकता और अखंडता को मृत्यु की ओर धकेलता जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि इन साजिशों को पूरी ताकत से रोका जाए और इन्हें प्रश्रय देने वाली विचारधाराओं का लोकतांत्रिक तरीके से समूल नाश किया जाए।

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