Home लेख इतिहास में काले को सफेद बताने की साजिश

इतिहास में काले को सफेद बताने की साजिश

47
0

मोपला नरसंहार की शताब्दी: स्वतंत्रता संग्राम के नाम पर रचे गए झूठ का खुलासा

20 अगस्त 2021 को मोपला नरसंहार के सौ साल हुए, पर क्या आज अफगानिस्तान के ‘विद्यार्थियों के तौर तरीकों में मोपला क्रूरकर्माओं के रंग-ढंग की अनुकृति नजर नहीं आती, उस समय भारत से 18000 बंदों ने अफगानिस्तान को रुख किया था, यह सोचकर कि यह हिंदुस्तान तो काफिरों की जमीन है। आज उसकी शताब्दी पर जब उसी अफगानिस्तान से लोग हिंदुस्तान आ रहे हैं, घड़ी का कांटा पूरा घूम गया लगता है।

मनोज श्रीवास्तव, पूर्व अपर सचिव, मध्यप्रदेश

उनके इतिहास बनाने की रसोई होती थी या कारखाना वे दंगों को विद्रोह कह लेते थे और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को पहली बार ऐसा कहने वाले को वे लगातार सांप्रदायिक भी उसी सांस में कहते चलते थे। इस वंदे को वे क्या इसलिए माफ न कर सके कि इसने म्यूटिनी के नाम से चस्पा कर दी गई चीज को पहली बार आजादी की लड़ाई के रूप में देखा और दिखाया, जबकि आज तो आपके गुर्गे छोटी- छोटी चीजों पर आजादी एंथम गाते फिरते हैं।

यानी आपकी सोच तो यह है कि जहां हिंदू- मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर एक विदेशी ताकत से लड़े, वह हुई म्युटिनी। वह स्वतंत्रता संग्राम न हुआ। और जहां मोपलाओं ने उसी राष्ट्र के दूसरे समुदाय को एक ऐसी चीज के लिए तमाम किस्म के सबसे बीभत्स जुल्मों का शिकार बनाया, जिसका उससे दूर-दूर तक संबंध न था तो वह हुई विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम।

ऐसी बुद्धि कहां से पाते हो, प्रभु। पा भी लेते तो ठीक था, तुम तो उसका आधिकारिक वितरण करते चले आए। इसी बुद्धि के चलते अब तब के सबसे बड़े दंगाई को एक मलयाली फिल्म में नायक के रूप में प्रोजेक्ट करने वाली फिल्म बनाने की अभी घोषणा हुई है। ये वो व्यक्ति है जिसे 24 दिसंबर 1921 के टाइम्स ऑफ इंडिया के पृष्ठ 18 पर मंझेरी की एक मोपला-सभा में यह आव्हान करते हुए बताया है कि सभी सरकारी कर्मचारियों को मार डालो और सभी हिंदुओं को कन्वर्ट करवाओ। यहां से जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन की नींव पड़ी थी। यदि जिन्ना बिन लादेन के पूर्वज थे तो यह हाजी, जिसके पिता को कई सांप्रदायिक दंगे भड़काने की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सरकार द्वारा देश निकाला दे दिया गया था, जिन्ना का पूर्वज था। उसने स्थापित किया था हिंदुओं पर जजिया वाला ‘अल-दौला, लेकिन उसे फिल्म में ‘मलयालानाडु के संस्थापक की तरह बताये जाने की तैयारी हो रही है।

20 अगस्त 2021 को मोपला नरसंहार के सौ साल हुए, पर क्या आज अफगानिस्तान के ‘विद्यार्थियों के तौर तरीकों में मोपला क्रूरकर्माओं के रंग-ढंग की अनुकृति नजर नहीं आती, उस समय भारत से 18000 बंदों ने अफगानिस्तान को रुख किया था, यह सोचकर कि यह हिंदुस्तान तो काफिरों की जमीन है। आज उसकी शताब्दी पर जब उसी अफगानिस्तान से लोग हिंदुस्तान आ रहे हैं, घड़ी का कांटा पूरा घूम गया लगता है। पर यह भी दिलचस्प है कि एक चौरी चोरा थाने की घटना अपनी तथाकथित हिंसा के आधार पर असहयोग आंदोलन रोकने का आधार बनी, लेकिन मालाबार के इस नरसंहार को उसे रोकने का आधार क्यों न बनाया गया?

चौरी चौरा की घटना को हमारी पाठ्य पुस्तक ऐसे पढ़ाती हैं मानो वह एकदम शांतिपूर्ण तरह से चले आये असहयोग आन्दोलन में विचलन (aberration) की प्रथम और एकमात्र घटना थी। न वह पहली थी और न अकेली। वह एक दिन की घटना थी, यह जेनोसाइड एक साल चला था। वह एक थाने की घटना थी, यह एक प्रांत की। उसमें 22 पुलिस वाले मारे गये थे, इसमें 10,000 से ज्यादा लोग। वह 4 फरवरी 1922 को हुई थी और यह नरसंहार 20 अगस्त 1921 से शुरू हो गया था। असहयोग आंदोलन 4 सितंबर 1920 से शुरू हुआ था।


माने ब्रिटिश प्रशासन के विरुद्ध हुई हिंसा हिंसा थी और अपने ही देशवासियों के विरुद्ध कत्लोगारत से लेकर बलात्कार और गर्भवती स्त्रियों के पेट चीर देना हिंसा न थी? दंगे हिंसा नहीं होते थे क्या? यदि खलिाफत के बाहरी मुद्दे का आयात कर यहां असहयोग आंदोलन में उसका मिश्रण कर दिया गया था, तब खलिाफत के उसी मुद्दे को लेकर यहां स्थानीय भारतीय जनता के विरुद्ध यह Holocaust क्या असहयोग आंदोलन पर पुनर्विचार का सबब न बनाता था? चौरी चौरा को तो तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने सिर्फ सुना और पढ़ा था, मालाबार को तो विजिट किया था। यहां एक थाने की बात थी, वहां तो कई थाने, कोर्ट्स, ट्रेजरीज, सरकारी कार्यालयों में जमकर हिंसा हुई थी। तब तो नेतृत्व ने यह कहा था कि ‘मुस्लिम अहिंसक असहयोग आंदोलन की विफलता की स्थिति में वे सब तौर तरीके इस्तेमाल करने के अधिकार रखते हैं जो इस्लामी शास्त्रों में बताये गये हैं। यह सवाल ही रहेगा कि ये अधिकार तब भगतसिंह आदि के लिये क्यों वर्जित मान लिये गये थे?


जब खलिाफत के सवाल को असहयोग आंदोलन में मिलाने का समझौता अली ब्रदर्स से हुआ तो सौदेबाजी गोसंरक्षण की करने में क्या बुराई थी? लेकिन एक तरफा सांप्रदायिक मुद्दा असहयोग की प्रेरणा बन बैठा। बहुसंख्यकों को राष्ट्रीय मुद्दा जिस तरह से पर्याप्त था, वह अन्यों को उसी तरह से क्यों पर्याप्त न था? साधन की पवित्रता की बात तो तब बहुत की जाती थी। तब राष्ट्रीय प्रतिरोध को सांप्रदायिकता के कलुष से क्यों लिप्त किया जा रहा था? राष्ट्रीय मुद्दे पर किसी और तरह की बार्गेनिंग क्यों जरूरी होनी चाहिए ?

कुछ लोगों ने तब हैदराबाद के निजाम को खलीफा घोषित करने और हैदराबाद को वैश्विक इस्लाम का मुख्यालय बनाने की बात कही थी जिसे तब के नेतृत्व ने यह कहा था कि ‘यदि हैदराबाद का निजाम भारत का बादशाह हो जाता है तब भी यह सौ फीसदी स्वराज होगा। तब सवाल यह है कि भारत का स्वतंत्रता संघर्ष एक लोकतांत्रिक भारत के लिए था या 1857 से 1920 तक भारतीय चेतना ने कोई प्रगति न की थी? आज कुछ लोग जो सुभाष के नाम पर यह कहकर डराते हैं कि उनके सफल होने से देश में एक सैन्य शासन हो जाता, इस बादशाह के प्रस्ताव का जिक्र तक नहीं करते। मैं एक उदाहरण देता हूं।

गया में 12 अगस्त 1921 को 9.30 बजे रात एक सार्वजनिक सभा का जिसमें 20,000 व्यक्ति उपस्थित थे और नेतृत्व के साथ मंच पर मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना आजाद सुभानी भी थे और उनसे पहले भाषण दे चुके थे। मौलाना मोहम्मद अली वो शख्स थे जिन्होंने मद्रास में एक सार्वजनिक सभा में खुलेआम यह कहा था कि ‘अगर अफगानिस्तान के अमीर ने उन लोगों के विरूद्ध संग्राम करने के लिये जिन्होंने इस्लाम को पौरुषहीन बना डाला है और जो इस्लाम के पवित्र स्थानों पर कब्जा किये बैठे हैं, भारत की ओर कदम बढ़ाया तो मैं उनकी सहायता करूंगा। (यह अफगानिस्तान कनेक्शन भी दिलचस्प है)

उस रात नेतृत्व ने कहा कि ‘आपको गाय की कुर्बानी से होने वाले दु:ख को सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। मुसलमानों के हाथों से गाय को छीन लेना हिन्दुत्व के अनुकूल नहीं है। हिन्दुओं को खिलाफत की रक्षा करनी चाहिए। यानी गौरक्षा न करो, खिलाफत रक्षा करो। तब भी आज लोग Dismantling Hindutva के अलीबाबा चालीस चोर जैसे 40 विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम चलाते हैं। उस समय सुनने वाली भीड़ संभ्रम में थी कि ये तो हैं अहिंसा के विख्यात प्रवक्ता पर मूक पशु पर हिंसा को सहन करने की कह रहे। उस मामले पर प्रार्थना करने की कह रहे, तब खिलाफत के मामले में भी साथी वक्ताओं को प्रार्थना की सलाह क्यों नहीं दी जा रही।

यह तब था जब मध्यप्रदेश में रतौना में सेंट्रल प्रविन्सेज टेनिंग एंड ट्रेनिंग कंपनी लिमिटेड को 843 एकड़ भूमि नाममात्र के शुल्क पर दे दी गई थी और 71350 मन चमड़ा कमाने के मसाला लायक जंगल भी ठेके पर दे दिया गया था। आज का समय होता तो हम इसे लैंड स्कैम कहते या फारेस्टगेट कहते, लेकिन तब भारत को सभ्यता सिखाने के एक और प्रोजेक्ट से ज्यादा यह क्या होता। एक साल में इससे दो लाख गाय-बैल कंपनी के हिसाब से कटने थे।

सो माखनलाल चतुर्वेदी जी ने ‘ गोवध की सरकारी तैयारी के नाम से कर्मवीर में 17 जुलाई 1920 को एक धुंआधार संपादकीय लिखा था। और मध्यप्रदेश में एक बड़ा आंदोलन गोवध के विरुद्ध शुरू हो चुका था और सागर के अब्दुल गनी और एडवोकेट ताजुद्दीन अहमद उस गोवध विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। सो उस दिन गया में भीड़ यह सोचकर संभ्रमित थी कि उनका महान नेतृत्व इन अब्दुल गनी और ‘ताजÓ के उन संपादक को साथ लेकर क्यों न आया और इन्हें लेकर क्यों आया और क्या सिखा रहा है। यदि उन्हें खिलाफत की रक्षा करने को कहा जा रहा है तो इन्हें गौरक्षा करने को क्यों नहीं कहा जा रहा?

याद रखें कि तब तक मोपला दंगे शुरू हो चुके थे। विक्टिम ब्लेमिंग का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण तब था जब तत्कालीन नेतृत्व ने लिखा: They knew the Moplah and sinfully neglected to make him a better neighbour. मैंने सप्रे संग्रहालय के पुस्तकालय में बैठकर उस समय के अखबार देखें तो 24 दिसंबर 1921 के टाइम्स ऑफ इंडिया में संपादक के नाम पत्र में वी. गोविंदमेनन का एक विस्तृत जवाब इस बात पर देखा। उन्होंने इस वक्तव्य को perversion कहा।

उन्होंने बताया कि कैसे पुर्तगाली समय में कालीकट के जमोरिन राजा ने हर हिंदू मछुआरे के घर से एक बच्चे को मुस्लिम बनाना अनिवार्य कर दिया था तभी वह जमोरिन की नेवी में नौकरी पा सकता था। उसकी आवश्यकता खत्म हो जाने के शताब्दियों बाद भी मछुआरे परिवारों में यह प्रथा चलती रही। अब इससे ज्यादा और क्या सहिष्णुता होती? इस पत्रलेखक ने तब यह पूछा था कि जब मोपला अपने मजहब पर इतना कट्टर है कि जरा सा कुछ हो जाने पर मरने मारने पर उतारू हो जाता है तो वह दूसरे से क्यों उम्मीद करता है कि वह अपने धर्म के प्रति कट्टर न हो और धर्मांतरण कर ले। हर मोपला न्यूनतम एक काफिर को तो मुसलमान बनाता ही है।

यदि कोई धर्मांतरण के अनुभव से निराश होकर वापस अपने पुराने धर्म में लौटना चाहता है तो दंगा हो जाता है। मोपलाओं को मस्जिदों के लिए ज्यादातर जमीनें हिंदू जमींदारों ने ही उपलब्ध कराईं हैं लेकिन उन्हें और ज्यादा नये धर्मांतरिती व नयी मस्जिदों की जमीनें चाहिए ही चाहिए। कालीकट के कलेक्टरेट परिसर तक में उनकी मस्जिद बन गयी है। हिंदू व्यापारियों व जमींदारों ने हमेशा मोपलाओं को नौकरियां दीं। जबकि लोकसेवाओं में दूसरे समुदायों की अर्हताओं में कोई शिथिलता नहीं दी जाती, मोपलाओं को अनपढ़ होने या निर्योग्य होने के बाद भी राजस्व, पुलिस, शिक्षा, न्यायालयों, पंजीयन आदि विभागों में नियुक्तियां दी जाती रही हैं जबकि उनके लिये स्पेशल स्कूल और विशेष शैक्षिक रियायतें भी दी जाती हैं।

इस पत्रलेखक ने तब ही लिख दिया था कि: Such causes as oppression by petty officials and agrarian discontent are convenient camouflage, nothing else. लेकिन एक साधारण नागरिक के पत्र की क्या कीमत। विक्टिम ब्लेमिंग का क्यू नेतृत्व से मिल ही गया था। मध्यकाल और आधुनिक काल का क्रूर इतिहास इसी विक्टिम ब्लेमिंग के जरिये उचित ठहराने की परंपरा चल ही पड़ी थी। इस कला में निष्णात लोग किसी जमींदार के अन्याय के इक्का दुक्का इंडीवीजुअल उदाहरण बताकर क्रूरतम सामूहिक अत्याचार को समर्थन देते हैं। इस रणनीति में कभी वे बैकलैश का सिद्धांत लाते हैं कभी provocation का। ध्यान दें कि आतंकवाद के तौर तरीके भी एकदम यही हैं। ये कहने को माक्र्सवादी हैं पर इनका उस दैविक थियरी में जबर्दस्त विश्वास है कि people deserve what happens to them.

इतिहास जब यों लिखकर काले को सफेद करेगा कि वह सांप्रदायिक जनसंहार सामंतों और जमींदारों के विरुद्ध पापुलर अपराइजिंग थी या अंग्रेजों ने वहां हाई-कास्ट हिंदू अथारिटीज को नियुक्त किया था, इस कारण यह प्रतिक्रिया हुई -तब वह इतिहास की कालाबाजारी है, और कुछ नहीं। क्या चौरीचौरा में मारा गया एक भी आदमी अंग्रेज था? कुछ इतिहासकार तो मालाबार की उन घृणित घटनाओं को किसान विद्रोह कहने तक की कलाबाजियां दिखाते रहे हैं। क्या ये किसानों के प्रति उनके किसी आदर का द्योतक हो सकता है? घाव पर नमक ये कि 1971 में उन रैबिड फिरकापरस्त हत्यारों और बलात्कारियों को स्वाधीनता संग्राम सेनानी का दर्जा दिया गया था।

आश्चर्य नहीं कि आज अफगानिस्तान में भी यही सब कर गुजरने वाले ‘विदेशी आधिपत्य’ के खालिफ लड़ाई करने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बताये जा रहे हैं। क्या हमारे देश के किसी भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने किसी का बलात्कार किया? या देश के आम नागरिकों का कत्लेआम किया? यह भारत के उच्चतम आदर्शों से प्रेरित भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, खान अब्दुल गफ्फार खान के पासंग भी बैठने वाले लोग थे? इनके साफ पर उन्हें रखकर क्या इन बलिदानियों का अपमान नहीं किया जा रहा था, एक ओर ‘नवजीवन में 4.9.1921 को एक लेख में हमारा नेतृत्व यह कह रहा था कि ‘ मोपला जाति अपढ़ किन्तु बहादुर है। मौत का तो उन्हें डर ही नहीं है। जब लड़ाई पर निकलते हैं तब पीछे पांव न हटाने की कसम खाकर ही निकलते हैं।

दूसरी ओर कनपनिकर जैसे माक्र्सवादी इतिहासकारों तक को यह नोट करना पड़ा कि इसके बाद ‘आजादी की किसी लड़ाई में किसी भी स्तर पर ये शरीक नहीं हुए। किसी भी तरह की राजनीति से इनका कोई सरोकार नहीं रहा। बाद के वर्षों में केरल में वामपंथी नेतृत्व में किसान आंदोलन ने जोर पकड़ा, पर इसमें मोपला शामिल नहीं हुए। इतना उस बहादुरी और उस किसान चिंता की थियरीज के लिए। बाहर के गम ज्यादा हिंसक बना देते हैं। तब से इस प्रवृत्ति की नींव पड़ी कि माओ चीन में छींकते थे और जुकाम यहां कुछ सज्जनों को हो जाता था। कि बात डेनमार्क की हो या फ्रांस की, वहां का कोरोना यहां पर जुलूस ही नहीं निकलवाता, सार्वजनिक संपत्तियों की भी क्षति करवा देता है।

और यदि ऐसा अंतर्राष्ट्रीयकरण जायज है तब हम ऐसे समूहों की कुरीतियों को मानवाधिकारों का वैश्विक मुद्दा बनाकर उसमें विश्व समुदाय का सहयोग क्यों नहीं लेते? माने यदि बाल श्रम के आधार पर हमारी देसी कारपेट इंडस्ट्री की बलि अमेरिकन, ब्रिटिश, जर्मन मैन्युफैक्चरर्स के हितों की पूर्ति कर सकती है, तो कई ऐसी सामाजिक कुरीतियां वैश्विक सैंक्शन क्यों नहीं आमंत्रित करतीं? क्या वे विश्व मानवाधिकार के मुद्दे नहीं हैं? उन पर कोई अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता नहीं उभरती? क्या अंतर्राष्ट्रीयकरण कोई वन-वे ट्रैफिक है?

Previous articleहमारे खिलाफ नहीं हो अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल
Next articleअमेरिकी सैनिकों की वापसी वामपंथी साजिश तो नहीं?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here