Home » मुस्लिमों में समाप्त हो रहा है कांग्रेस का वर्चस्व

मुस्लिमों में समाप्त हो रहा है कांग्रेस का वर्चस्व

  • फिरोज बख्त अहमद
    एक दौर था कि कांग्रेस के नेता कहते थे कि बिना मुसलमानों के वोटों के कोई भी सरकार नहीं बन सकती, जो शायद कुछ हद तक ठीक समझा था क्योंकि उस दौर में अर्थात जब कांग्रेस ने 55-60 साल देश में सत्ता चलाई और जब मुस्लिम संप्रदाय भी कांग्रेस को इसी प्रकार से वोट देता था कि मानो या तो अल्लाह मियां ने कह रखा था कि ऐ मुसलमानों, कांग्रेस को वोट दो, या फिर जैसे कुरान में यह कहा गया है। जो भी है, जब-जब मुस्लिमों ने एक-जुट किसी भी पार्टी को मताधिकार दिया तो उसी की सरकार बनी, चाहे वह कांग्रेस हो या 1977 में जनता पार्टी बनी हो। आज यह सब मिथ बन कर रह गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि कांग्रेस ने अपने पूर्ण राज में मुसलमान को मात्र वोट बैंक जानकर प्रयुक्त किया और काम होने पर टिशु पेपर की भांति फेंक दिया जिसे अंग्रेजी भाषा में “यूज़ एंड थ्रो” कहा जाता है। आजका मुस्लिम तबका कांग्रेस द्वारा अपने को ठगा महसूस कर रहा है कि कभी उर्दू के नाम में, कभी आरक्षण के नाम से तो कभी किसी और नाम से मुस्लिमों को इस्तेमाल किया जाता रहा है।
    इसके अतिरिक्त अपने 6-7 दशकों के राज में कांग्रेस ने मुस्लिम तबके के हाथ में भीख का पहला प्याला आरक्षण का डाला जिसमें पार्टी ने कभी उर्दू की इकन्नी, आरक्षण की दुअन्नी तो कभी सच्चर कमेटी व श्रीकृष्ण कमीशन की चवन्नी दिखा कर मात्र ज़बानी जमा-खर्च या उसका तिरस्कार ही किया। मुस्लिम नामक कशकोल में एक पैसा तक नहीं डाला। कांग्रेस ने इन सभी वर्षों में मुस्लिम बस्तियों में बजाए स्कूल, कॉलेज, क्रीड़ांगन, हस्पताल, डिस्पेंसरियां, थिएटर आदि खोलने के बजाए ठाणे थाने खोले हैं। यही कारण है कि आज कांग्रेस से मुस्लिम की आस्था समाप्त हो गई और आज उसका वोट सभी पार्टियों को जाता है।
    हाल में एक बड़ी घटना ऐसी हुई कि जिससे एक बार फिर मुस्लिम संप्रदाय कांग्रेस से रुष्ट हो गया है। जब रायपुर में कांग्रेस में अपना 87वां अधिवेशन किया तो उसके विज्ञापन में सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं और स्वतन्त्रता सेनानियों की फोटो लगी हुई थी सिवाय भारतरत्न, स्वतन्त्रता सेनानी व आज़ाद भारत के प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के, जिस पर मुस्लिम संप्रदाय ने बड़ी नाराजगी ज़ाहिर की और सोशल मीडिया पर भी आजतक इसका चर्चा चल रहिया है कि कांग्रेस ने केवल एक ही परिवार को याद रखा है और चाहे वह मौलाना आज़ाद हों, सरदार पटेल हों, या कोई और बड़ा नेता हो, उसकी कोई पूछ नहीं।
    इससे अधिक तो प्रधानमंत्री ने मौलाना आज़ाद का मान-सम्मान कर दिया था। बात दरअसल यह हुई कि 2013 में जब नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो जब आज़ाद की 11 नवंबर 2013 को 125वीं जन्म वर्षगांठ थी, क्योंकि उनका जन्म 1888 में मक्का में हुआ था। उस समय उनके जामा मस्जिद के निकट बने मज़ार पर कोई भी उन्हें श्रद्धांजलि देने नहीं गया। दिन में लगभग 12 बजे के समय, अपनी मित्र और सांसद, मीनाक्षी लेखी से लेखक ने कहा तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वह इस बात को गुजरात मुख्यमंत्री मोदीजी के बताएंगी और जो उन्होंने किया। उसी दिन मोदी जी ने गुजरात के किसी कॉलेज से भाषण में कहा कि “आज 11 नवंबर, 2013 को भारत रत्न मौलाना आज़ाद की 125वीं वर्षगांठ के अवसर पर कांग्रेस से किसी ने उन्हें नहीं याद किया जो कि बड़े खेद का विषय है और सिवाय वंशवाद और परिवारवाद से जुड़े सदस्यों के इस पार्टी में न तो भारतरत्न मौलाना आज़ाद की कोई पूछ है और न ही सरदार पटेल जैसे दिग्गज स्वतन्त्रता सेनानियों की!” यही कारण है कि काफी संख्या में मुस्लिम प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा से जुड़ रहे हैं। इससे अगले वर्ष जब 14 नवंबर 2014 पंडित जवाहरलाल नेहरू की 125वीं वर्षगांठ थी तो उसके उपलक्ष्य में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का समारोह हुआ था।
    वैसे ही मौलाना आज़ाद को कोई पूछने वाला नहीं है क्योंकि पिछले 40 वर्ष से लेखक पूर्व मंत्री व राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला के साथ उनकी मज़ार पर उनकी जन्मतिथि (14 नवंबर) व पुण्य तिथि (22 फरवरी) को जाता रहा है, जहां राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, बड़े मंत्री, संासदों को तो छोड़िए, लोकल कारपोरेटर तक जाने का कष्ट नहीं करते सिवाय भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस) के अफसरों के, जिनके कारण उनकी मज़ार की 65 साल से देख-रेख होती चली आई है। एक और गुनाह कांग्रेस का मौलाना आज़ाद के साथ यह रहा कि जब 1993 में उनके गुजरने के 35 वर्ष बाद उन्हें भारतरत्न दिया तो उनके निकटतम संबंधी उनके भतीजे नूरुद्दीन अहमद (लेखक के पिता) को बज़रिया सदा डाक कोलकाता भिजवा दिया। चूंकि वह बीमार थे और राष्ट्रपति भवन नहीं आ सकते थे तो इस सम्मान की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उन्हें कोलकाता के राज भवन में देना चाहिए था। मुस्लिम जनता ने जब यह देखा कि उनके शीर्ष नेताओं और देश की आज़ादी पर निछावर होने वाले मुस्लिम राष्ट्रनायकों के प्रति उनका यह रवैय्ाा है तो उन्होंने उनसे दूरी अख़्तियार कर ली।
    मौलाना आज़ाद के अतिरिक्त अन्य हिन्दू-बड़े मुस्लिम चेहरों को भी कांग्रेस ने भुला दिया है, जिनमें मुख्य नाम हैं पूर्व राष्ट्रपति डॉo ज़ाकिर हुसैन, राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, लाला लाजपत राय, हकीम अजमल ख़ान, अली बिरादरान यानी मौलाना मुहम्मद अली व शौकत अली, बाबू जगजीवन राम, रफी अहमद किदवई, सैफुद्दीन किचलु आदि। ये सभी कांग्रेस के अपने दिनों के बहुत बड़े नाम थे और देश के प्रति इनकी बहुत कुर्बानियां भी हैं, मगर समस्या यह है कि मात्र गांधी व नेहरू परिवार के किसी और को कांग्रेस ने टिकने नहीं दिया है। आज भी कांग्रेस की रस्सी जल गई है, मगर बल नहीं गया है।

Swadesh Bhopal group of newspapers has its editions from Bhopal, Raipur, Bilaspur, Jabalpur and Sagar in madhya pradesh (India). Swadesh.in is news portal and web TV.

@2023 – All Right Reserved. Designed and Developed by Sortd