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स्वतंत्रता संघर्ष में कांग्रेस ने संघ को मान लिया प्रतिद्वंद्वी

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  • स्वतंत्रता आंदोलन व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-4

कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन की स्वागत समिति एवं विषय समिति के सदस्य के नाते डॉ. हेडगेवार ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव तैयार कर गाँधीजी के सामने रखा परंतु गाँधीजी ने यह कहते हुए कि ‘स्वराज में ही पूर्ण स्वतंत्रता का भाव समाहित है टाल दिया। उन्हें क्रांतिकारियों की तनिक भी आलोचना सहन नहीं होती थी। सीमित राजनैतिक दृष्टि के चलते कांग्रेस सहित संघ के आलोचक संघ की स्वतंत्रता की इस दूरगामी एवं सर्वांग दृष्टि की उपेक्षा करते हैं।यही कारण है कि उस समय के कांग्रेस नेताओं ने संघ कार्य को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा।

नरेन्द्र जैन, प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मध्यक्षेत्र
narendra21021957@gmail.com


30 जनवरी 1927 को नागपुर शहर कांग्रेस ने अंग्रेज सरकार द्वारा भारतीय फौज को चीन भेजने के विरोध में एक सभा का आयोजन किया था। इस सभा में जो प्रस्ताव रखा गया, वह डॉक्टर साहब ने तैयार किया था। सभा में प्रस्ताव रखने वाले संघ कार्य में प्रमुख सहयोगी ल वा परांजपे थे । जब मार्च 1929 में सायमन कमीशन मध्यप्रांत और बरार आया, तब डॉक्टर साहब को कमीशन विरोधी आंदोलन के प्रचार और जन जागरण का दायित्व सौंपा गया। डॉक्टर साहब ने सभी स्वयंसेवकों को कांग्रेस के साथ मिलकर कार्य करने को कहा। सविनय अवज्ञा आंदोलन की घोषणा के बाद विदर्भ में चले जंगल आंदोलन में डॉक्टर साहब ने स्वयं भाग लिया था। उनके साथ सत्याग्रह में भाग लेने वालों की बड़ी संख्या थी जिनमें संघ कार्य में अनन्यतम साथी अप्पाजी जोशी, दादा राव परमार्थ प्रमुख थे।

डॉक्टर साहब के 9 माह के कठोर कारावास के बाद स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह कर स्वतंत्रता की अलख जगा दी। इनके अतिरिक्त संघ के सरकार्यवाह हुड्डा, सरसेनापति (वर्तमान पद शारीरिक प्रमुख ), मार्तंडराव जोग, नागपुर संघचालक अप्पा साहेब हल्दे, सिरपुर के संघचालक बाबूराव वैद्य, सीताराम रामेकर व वि_ल गाडगे ने जंगल सत्याग्रह में भाग लिया। इन सभी को 4-4 माह की सजा हुई। चूँकि संघ की स्थापना सर्वांग स्वतंत्रता की प्राप्त के लिये नित्य कार्य के लिये हुई थी कि बाधित नहीं होना चाहिए, इसलिये स्वयं डॉक्टर साहब ने सरसंघचालक दायित्व डॉक्टर परांजपे को सौंपकर व्यक्तिगत रूप से सत्याग्रह का नेतृत्व किया। स्वयंसेवकों को कहा गया था कि कांग्रेस के कार्यकर्ता के नाते ही आन्दोलन में सहभागी होना है। इसलिये कितने स्वयंसेवकों ने आंदोलन में हिस्सा लिया, ठीक आँकड़ा नहीं मिल सकता।

उस समय की प्रशासनिक रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती हैं कि इसके बाद पहले से भी अधिक सरकारी शिंकंजा संघ पर कसना प्रारम्भ हुआ । मध्यभारत एवं बरार की प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार अलग दृष्टिकोण के बावजूद हिंदू नेताओं (संघ) ने कमीशन के साथ काम से इंकार कर दिया; जबकि मुस्लिम नेताओं ने कमीशन का स्वागत किया। गुप्तचर रिपोर्ट में नागपुर और वर्धा शाखा का उल्लेख मिलता है। 1931 में मुंबई सरकार सैन्य आधार पर जाँच में पाया कि संघ सशस्त्र संघर्ष करने वाले क्रांतिकारी बनाने की क्षमता रखता है। 15 दिसम्बर 1932 में अंग्रेज़ी सरकार ने खुला प्रहार किया। उसने एक परिपत्र द्वारा शासकीय सेवकों से संघ से दूरी बनाए रखने के निर्देश दिये। 1934 में यह परिपत्र स्थानीय निकाय के कर्मचारियों पर भी लागू कर दिया गया । इसके पूर्व दिसम्बर में शिक्षकों को संघ में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

डॉक्टर साहब ने जिस कुशलता से सरकार की कुत्सित चालों को विफल किया, यह संघ कार्य की सर्वग्राह्यता को प्रगट करता है। सरकार को तब यह अनुमान नहीं था कि विधान परिषद को बजट में कठिनाई का सामना कर सकता है। डॉक्टर साहब के प्रयत्न ने सरकार के भरोसे को एवं गृह मंत्री डॉ. राघवेंद्र राव के घमंड को चूर कर दिया। 1934 के बजट सत्र में जिस प्रकार ब्राह्मण-इतर,हिंदी-मराठी,तिलकवादी-गाँधीवादी और मुस्लिम जैसे संकीर्ण आधारों पर गुटों में बँटी कांग्रेस संघ के प्रश्न पर सभी मतभेद एक किनारे रखकर एकसाथ खड़ी हुई। यह सरकार के पैर फूलने के लिये काफी था। सर्कुलर में संघ पर साम्प्रदायिक और मुस्लिम विरोधी होने का आरोप लगाया गया था।

सरकार के इस आरोप को मुस्लिम नेता एम एस रहमान ने ध्वस्त कर दिया। उन्होंने संघ के राष्ट्रवादी एवं सकारात्मक हिंदुत्व की प्रशंसा की। पहले तो उन्होंने सरकार से ही पूछ लिया कि क्या किसी मुस्लिम संगठन ने संघ के विरुद्ध प्रतिवेदन देकर संघ पर प्रतिबंध लगाने की माँग की है । सरकार की ओर से नकारात्मक उत्तर के आने के बाद सरकार द्वारा संघ कार्य को साम्प्रदायिक घोषित करने को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या आप एंग्लो-इंडियन या मुस्लिमों के संगठन को साम्प्रदायिक मानते हैं? इस आधार पर तो मुस्लिमों द्वारा या मारवाडिय़ों द्वारा अपने समुदाय हितों के सँवर्धन के लिये चल रही संस्थायें साम्प्रदायिक मान ली जायेंगी। संघ के समर्थन में 14 गैर सदस्यों ने भाषण किये। कोलते ने परिपत्र के विरुद्ध 1 रुपये का कटौती प्रस्ताव रखते हुए संघ के विरुद्ध जारी सर्कुलर पर बहस की माँग रखी थी। अंतत: सरकार ने हार की शर्मिंदगी से बचने के लिये दोनों सर्कुलर वापिस लेने में ही भलाई समझी।

डॉक्टर हेडगेवार द्वारा संघ की स्थापना, देश की स्वतंत्रता की राजनैतिक स्वतंत्रता से आगे उनकी दृष्टि की द्योतक है। संघ की स्थापना डॉक्टर साहब की इतिहास को विशेष दृष्टि से देखने का परिणाम थी । जिसका निष्कर्ष था कि हमने अपनी स्वतंत्रता को अनेक बार प्राप्त करने के बाद क्यों खोया ? बार-बार पराधीन होने के लिए बाहरी ताकतें जिम्मेदार थीं या हमारी अंतर्निहित कमजोरियाँ। कांग्रेस में सक्रिय भागीदारी के बावजूद वे अनुभव कर रहे थे कि आंदोलनों की चेतना उन प्रश्नों तक ही मर्यादित रहती है। वह देशभक्ति के स्थायी भावना का निर्माण करने में असमर्थ रहती है। देशभक्ति के भाव स्थिर करने के वैसे संस्कार मन पर करना आवश्यक होता है। डॉक्टर हेडगेवार संघ को स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिये तैयार कर रहे थे।

परन्तु उनका लक्ष्य भारत को मजबूत,परम वैभवशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करना था। और यह काम स्वतंत्रता प्राप्ति के बिना सम्भव नहीं हो सकता। इसी प्रकार का निष्कर्ष क्रान्ति आंदोलन के बारे भी डॉक्टर साहब का था। वे कहते हैं ‘ बिजली के क्षण मात्र के लिये आँखे चोंधिया देने के प्रकाश में अभिव्यक्ति की भावना होती है लेकिन उसमें दीपक के समान तिल-तिल जलकर जगत में प्रकाश फैलाने की भावना और विचार नहीं होता। क्रांतिकारी आंदोलन के बारे डॉक्टर साहब का यह विचार दीर्घ काल तक उसमें सक्रिय रहने के बाद बना था। नागपुर अधिवेशन की स्वागत समिति एवं विषय समिति के सदस्य के नाते उन्होंने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव तैयार कर गाँधीजी के सामने रखा परंतु गाँधीजी ने यह कहते हुए कि ‘स्वराज में ही पूर्ण स्वतंत्रता का भाव समाहित हैÓ टाल दिया। उन्हें क्रांतिकारियों की तनिक भी आलोचना सहन नहीं होती थी। सीमित राजनैतिक दृष्टि के चलते कांग्रेस सहित संघ के आलोचक संघ की स्वतंत्रता की इस दूरगामी एवं सर्वांग दृष्टि की उपेक्षा करते हैं। यही कारण है कि उस समय के कांग्रेस नेताओं ने संघ कार्य को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा। (क्रमश:)

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