Home लेख हरित आवरण की योजनाओं में नागरिक जिम्मेदारी: पूरी संवेदनशीलता से लगाएं पौधा

हरित आवरण की योजनाओं में नागरिक जिम्मेदारी: पूरी संवेदनशीलता से लगाएं पौधा

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भारत में वृक्षों को लेकर जनता और सरकार दोनों का चरित्र दोगला है। सरकार कागजों पर वनक्षेत्र बढ़ाती है और जनता वृक्षों को पूजने का नाटक करती है लेकिन उनके प्रति रत्ती भर संवेदनशील नहीं होती।

  • राकेश अचल

मानसून के आते ही भारत में हर तरफ वृक्षारोपण की बहार आ जाती है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर के अलावा निजी स्तर तक पर वृक्षारोपण समारोह आयोजित किये जाते हैं। भारत में वृक्षारोपण एक महती जरूरत भी है, क्योंकि तेजी से बढ़ रहे शहरीकरण की वजह से भारत का हरियाली का क्षेत्र तेजी से घट रहा है। वृक्षारोपण को हमारे यहां विशेषज्ञों का काम नहीं माना जाता।

हम मानसून के दिनों में या विश्व पर्यावरण दिवस के दिन पौधे रोपकर संतष्ट हो जाते हैं,लेकिन बाद में कभी मुड़कर लगाए गए पौधों की तरफ नहीं देखते। बिहार सरकार अपने राज्य में वनक्षेत्र 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 फीसदी करने के लिए इस साल पांच करोड़ पौधे लगाएगी। जाहिर है इसके लिए एक मोटा-तगड़ा बजट भी होगा। ऐसे ही बजट और योजनाएं हर प्रदेश सरकार की होती हैं। केंद्र सरकार की योजनाए अलग होती हैं। स्वयंसेवी संगठन सैकड़ों योजनाओं में लाखों लोगों को शामिल करने का दावा करते हैं,लेकिन भारत की धरती हरी-भरी नहीं हो पाती। उलटे हमारे पास जितने वनक्षेत्र हैं, वे भी साल-दर-साल कम होते जा रहे हैं।

देश में सबसे ज्यादा वनक्षेत्र वाला मध्यप्रदेश अपने यहां के बक्स्वाहा वन से हीरे-जवाहरत पाने के लिए तीन लाख पौधों की बलि सहर्ष देने को तैयार है।
भारत में वृक्षों को लेकर जनता और सरकार दोनों का चरित्र दोगला है। सरकार कागजों पर वनक्षेत्र बढ़ाती है और जनता वृक्षों को पूजने का नाटक करती है लेकिन उनके प्रति रत्ती भर संवेदनशील नहीं होती। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग वृक्ष पूजनीय माने जाते हैं। बरगद,पीपल,आंवला,बेरी,आम, केला हमारे पूजनीय वृक्ष हैं। पीपल तो हमारे पूर्वजों का दूसरी योनियों का वास माना जाता है लेकिन ये सभी प्रजातियों के वृक्ष आपको खोजने पर भी नहीं मिलेंगे।

इन दिनों मैं अमेरिका में वृक्षों के प्रति जांगरूकता देखता हूँ। यहां कोई किसी वृक्ष की पूजा नहीं करता लेकिन वृक्षों को काटने और उनके संरक्षण के प्रति नियमों से मजबूती के साथ बंधा है। किसी आवासीय बस्ती में कौन सा पौधा लगाया जाएगा इसके स्पष्ट नियम हैं।आप अपने घर की परिधि में जो चाहें सो पौधा लगा सकते हैं किन्तु सार्वजनिक स्थलों पर व ही पौधे लगाए जा सकते हैं जिनके लिए नियम अनुमति देते हैं। वृक्षारोपण से पहले पेड़ों की सिंचाई,उनके रासायनिक उपचार की पूरी और पुख्ता व्यवस्था करना बेहद जरूरी है।

भारत में बहुत कम नर्सरियां ऐसी हैं जो पौधा बेचते समय उसके रोपण और संरक्ष्ण के साफ-साफ निर्देश लिखित में खरीदार को देती हैं। पौधों के जीवन की गारंटी का तो सवाल ही नहीं उठता।जबकि अमेरिका में सभी आवश्यक सूचनाएँ और कम से कम एक साल की गारंटी उपलब्ध है। हमारे यहां तो स्थानीय निकायों द्वारा पौधों की खरीद में ही घोटाले होते रहते हैं। अमेरिका में बड़े वृक्षों के स्थानांतरण की भी प्रामणिक तकनीक रोजमर्रा इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है।


भारत के पास अमेरिका के मुकाबले आधी भी जमीन नहीं है। ऐसे में भारत में सरकार और सरकार से ज्यादा जनता का जागरूक होना आवश्यक है। मप्र सरकार ने हाल में ही भवन निर्माण के लिए कुछ वृक्ष लगाने की शर्त लगा दी है। इसके लिए पहले हमें अपने एफएआर के नियम बदलना होंगे, वृक्षारोपण के लिए विशेषज्ञों की सेवाएं मुहैया कराना होंगी। हमारे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजमार्गों और रेल लाइनों के आसपास सघन वृक्षारोपण की अपार संभावनाएं हैं।

आजादी से पहले उत्तरप्रदेश में नहरों और रजवाहों के किनारे बड़ी तादाद में सलीके से छायादार और फलदार वृक्ष हुआ करते थे। आज उनमें से ज्यादातर नहीं हैं। कुछ उम्रदराज होकर काल कवलित हो गए और कुछ पर कुल्हाड़ी चल गई। पुराने पेड़ बचाना या काटना हमारी मानसिकता से जुड़े विषय हैं। सरकारें भले ही वृक्षों के प्रति निर्मम हों लेकिन समाज को हमेशा संवेदनशील रहना चाहिए।

हमारा कोई कानून किसी वृक्ष के प्रति गंभीर और उदार नहीं है, जिम्मेदारी तो बहुत दूर की बात है। हमारे यहां वृक्षारोपण के नाम पर चोचले यानी कर्मकांड ज्यादा होता है। हम पितृ और मातृवन लगाकर सरकारी जमीनें हड़प लेते हैं लेकिन वृक्षों के प्रति वफादार नहीं होना चाहते। यदि आप कोई पौधा लगाएं तो ध्यान दें कि उसके लिए सही जगह चुनी जाए, उसकी सुरक्षा, खादपानी और दवा का भरपूर इंतजाम हो। यदि इनमें से एक की भी कमी हो तो कृपा कर वृक्षारोपण के किसी नाटक का हिस्सा न बनें।प्रकृति आपको कभी क्षमा नहीं करेगी।

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