मौसम में बदलाव अब विपदा की वजह

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  • पूरी दुनिया का वातावरण असंतुलन का शिकार

डॉ. कृपाशंकर तिवारी

प्रकृति में कुछ भी, अकारण नहीं। तिनके तिनके का तर्क है/अर्थ है। प्रत्येक घटक के पीछे औचित्य है। समूची प्राकृतिक प्रणालियाँ वांछनीय, उपादेय और सामायिक हैं। सभी कुछ तार्किक, अनिवार्य और एक अदृश्य संतुलन की डोर से बंधा है। प्रकृति की व्यवस्थाओं में स्वस्फूर्त, स्वचालित समयानूकूल लचीलापन भी है, लेकिन नि:सदेह इस संतुलन की सीमाएं भी हैं। इन सीमाओं को लक्ष्मण रेखा मान लें। जो भी वॉछित-अवांछित बदलाव होगें तो टिकाऊ संतुलन के लिये सभी प्रणालियों में अदभुद रूप से अनुकूलन भी होता है। यहाँ अनुकूलन की भी एक सीमा है। इन सीमाओं से परे खतरे, असंतुलन, विनाश, आपदायें और विलुप्तीकरण भी है। अब भारत सहित समूची दुनिया में ये असंतुलन लगातार बढ़ रहा है।

भारत में जम्मू राजस्थान के कुछ हिस्सों में जानलेवा लू और असहनीय गरमी हैं तो मुंबई, लखनऊ में वर्षा और बाढ़ के हालात है। दूर पहाड़ों पर बर्फबारी भी है। भारत भूखंड में एक ही समय में अलग अलग अप्रत्याशित मौसम बदलाव देखा जा रहा है। मौसम बदलाव की तीव्रता और आर्वतता भी बढ़ी है। ये बदलाव कैसे, क्यों होते हैं, कब होते हैैं, पूर्वानुमान भी कठिन है।

यह तय है कि मौसम के बदलाव इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि धरती गरम हो रही हैं, और यह कदम होने की गति अब तेज है। धरती का औसत तामक्रम बढ़ रहा है। संभवत: अब यह 17 डिग्री सेल्सियस के आसपास है। केवल एक डिग्री का बदलाव भी समूची धरती पर भारी उथल-पुथल के लिये काफी है,पर तापक्रम में लगातार वृद्धि धरती के समूचे इकोसिस्टम के लिये बड़े खतरे का संकेत है। समुद्री जीवन, समुद्री जल स्तर, धरती पर पानी जैव विविधता,खाद्य श्रंखला,खेती,जंगल वनस्पति सब पर घातक परिवर्तन के खतरे बढ़ रहे है।

तापक्रम बढऩे का अर्थ मौसम का बेतुका बदलाव, हवा के दबाव के क्षेत्रों में अदल बदल, बादल बनने का पैटर्न, वर्षा पैटर्न, वितरण, अप्रत्याषित अल्प वर्षा,अति वर्षा, हवाओं की गति,दिशा, तथा नमी की मात्रा सब कुछ बदलती है। एक ही समय में भारी गरमी, लू, वर्षा और बर्फबारी इसका प्रमाण है। गर्मी सूखे जैसे हालात, बीमारियाँ का अचानक विस्फोट, बाढ़, मिट्टी का क्षरण समुद्री किनारे के क्षेत्रों में जल स्तर का बढऩा, कोरल रीव्स का नष्ट होना, नदियों के डेल्टा का जलमग्न होना, बारंबार तूफान, चक्रवात और जंगलों में आग लगने की घटनायें सब एक साथ होता है।

इन सबके साझा असर से जनजीवन अस्त व्यस्त होता है। आजीविका के संकट, आपदा प्रबंधन बड़ी आबादी का विस्थापन के साथ सुरक्षा, जैसी मुश्किलें बढती हैं। अब मौसम बदलाव के ये असर किसी देश, या महाद्वीप तक सीमित नहीं रहे। पूरे वर्ष ये दौर चलता रहता है और सरकारें, प्रशासन और आपदा नियंत्रण टीमें जूझती रहती हैं। पिछले दिनों ताऊ ते और याश चक्रवात का कहर भारत ने देखा है। ये चक्रवात अब एक नियमित फीचर जैसे बन गये है। समूची धरती पर कभी अल नीनो तो कभी ला नीना के प्रभाव दिखने लगे हैं।

अल नीनो प्रशांत महासागर क्षेत्र के पश्चिमी तट के कुछ इलाकों में समुद्री के सतही जल को गरम करने से होता है, जिनका व्यापक असर वर्षा-मानसून चक्र पर पड़ता है। कम दबाव के क्षेत्र और हवाओं की गति और दिशा वर्षा तय करती है। इसके विपरीत ला नीना का प्रभाव वर्षा में बढ़ोतरी करता है। समूची धरती पर इनके प्रभावों का आकलन करें तो ज्ञात होता ये सब अप्रत्याशित है। भारत के क्षेत्रों में इस परिवर्तन और नियमित मानसून परिवर्तन के कारण यही सब है। कुल मिलाकर धरती पर बढ़ता उत्सर्जन बढ़ती गरमी और उस स्थान की लैटीटूयूट स्थिति (भूमध्य रेखा से दूरी) भी निर्णायक होती है। समुद्री हवाओं की दिशा, गति, वायु का दबाव और एलीवेशन भी महत्वपूर्ण कारक है।

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