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ग्रहण के पूर्व वेधकाल तो नहीं है केंद्र का नया सहकारिता मंत्रालय

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  • घोटाले पर कार्यवाही और नये सहकारिता मंत्रालय की स्थापना से सब कुछ ठीक होगा

घोटाले पर कार्यवाही और नये सहकारिता मंत्रालय की स्थापना से सब कुछ ठीक होगा यह मानना अति उत्साह होगा क्योकि अभी सहकारिता का विषय संविधान के अनुसार राज्यों के कार्यक्षेत्र में है, समवर्ती सूची में नही जिससे केंद्र सरकार दखल दे सके। मोदी सरकार इस सत्य से गाफिल नही है तभी तो जब इस सम्बन्ध में पब्लिक इन्फोर्मेशन ब्यूरो ने प्रेस रिलीज़ जारी की तो उसमे साफ़ कहा गया है कि यह मंत्रालय ‘देश के सहकारिता आन्दोलन को मजबूत बनाने के लिए एक प्रथक प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचा प्रदान करेगा।


प्रो. जी.एल. पुणताम्बेकर

आलेख का शीर्षक आपको अटपटा लग सकता है पर यह राष्ट्रवादी कांग्रेस के सिरमौर शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार के केंद्र सरकार द्वारा बनाये नए सहकारिता मंत्रालय के निर्णय के सन्दर्भ में मुफीद बैठता है। विगत दिनों सहकारिता क्षेत्र में महाराष्ट्र के कतिपय घटनाक्रम बताते हैं कि इस मंत्रालय की जिम्मेदारी गृह मंत्री अमित शाह को देकर प्रधानमंत्री मोदी ने शायद उस वेधकाल का आगाज कर दिया है जो ग्रहण के समय चन्द्र-सूर्य को ग्रसने के पूर्व के काल को कहते हैं।

अब यदि इस नए मंत्रालय की कमान अमित शाह को देने से किसान नेता माने जाने वाले शरद पवार और उनके शागिर्दों के राजनैतिक जीवन पर ग्रहण लगाने की संभावना हो, तो यही कहा जायेगा कि उस ग्रहण का वेधकाल आरम्भ हो गया है। इस समूचे प्रकरण को समझने के बाद आप स्वयं जान जायेंगे कि मामला कितना गंभीर है और मोदी व शाह की जोड़ी का विरोध दरअसल हो क्यों रहा है। क्या यह जोड़ी कोरी बयानबाजी के स्थान पर वह काम करती है जिससे विरोधियों की दुखती रग को छुआ जाए और इसी में राष्ट्र का व्यापक हित,, आर्थिक सुधार और गरीब, विशेषकर किसान का वास्तविक हित भी समाहित होता है?

इस पूरे प्रकरण के माध्यम से हमें सहकारिता जैसी लोकहित की अवधारणा को किसान हित के खोल में रहकर कैसे स्वहित के लिए दुरुपयोग किया जा सकता है, इसकी बानगी मिलेगी। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो देश में सहकारिता की नींव अंग्रेजी शासन काल में किसानों को साख सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 1879 में एक एक्ट बनाकार डाली गई। पर आजादी के बाद प्रथम पंचवर्षीय योजना से ही सहकारिता की अवधारणा को बढ़ावा देकर समावेशी विकास के जो प्रयास हुए, वह महत्वपूर्ण हैं।

इन प्रयासों से सहकारी बैंको का विस्तार हुआ और 1982 में नाबार्ड की स्थापना के साथ इसे और बल मिला। मूलत: साख क्षेत्र से आरंभ हुए सहकारिता क्षेत्र में ग्रामीण उत्पादों से सम्बंधित उद्योग और व्यवसाय की स्थापना भी होती गई और महाराष्ट्र में 1951 में एहमदनगर जिले में सहकारिता क्षेत्र का पहला शक्कर कारखाना लगा और इसके बाद यह क्षेत्र तेजी से फलने-फूलने लगा। आज भी महाराष्ट्र उत्तरप्रदेश के बाद देश का सबसे अधिक शक्कर उत्पादन (लगभग 20त्न) करने वाला राज्य है परन्तु इस अवधारणा का लाभ उठाकर स्वार्थी राजनेताओं ने इसे येंन-केन- प्रकारेण लूट का साधन बना लिया। यद्यपि ‘अमूल’ देश के सहकारी क्षेत्र का एक सफल ब्रांड है परन्तु यह सफलता लम्बे समय तक दूसरे उद्योगों को नसीब नही हुई।

आज जिस प्रकार महाराष्ट्र के शक्कर उद्योग और सहकारी क्षेत्र के बैंक आर्थिक संकट में हैं, वह इस क्षेत्र पर स्वार्थी लोगों की गिद्ध दृष्टि की मिसाल है। महाराष्ट्र में पंजाब-महाराष्ट्र सहकारी बैंक ( पीएमसी बैंक ) और ताजा जरंडेश्वर शुगर मिल के उजागर हुए घोटालों से यह सच प्रकट हो रहा है।। खास बात यह है कि यह कोई सामान्य व्यावसायिक असफलता नहीं है बल्कि यह ताकतवर और जिम्मेदारों द्वारा की गई एक सुनियोजित लूट का मामला है। इन घोटालों से देश के 1540 सहकारी बैंकों के लगभग 8.6 करोड़ जमाकर्ताओं की 5 लाख करोड़ की बचत और लाखों किसानों की जमापूंजी के निवेश वाले शक्कर कारखाने गंभीर वित्तीय खतरे में आ गए हंै। वास्तव में, इन प्रकरणों ने सहकारिता आन्दोलन की नींव ही हिला दी है और शायद इसीलिए केंद्र सरकार ने नया सहकारिता मंत्रालय बनाकर उसकी कमान गृह मंत्री अमित शाह को दी है। सवाल यह है कि क्या इससे स्थितियां सुधरेंगी ? उत्तर आसान नहीं है पर मंजिल के लिए यदि कदम भी बढ़ गया है तो यह शुभ संकेत है ।

क्या है जरंडेश्वर शुगर मिल घोटाला: यों यह मामला 10 वर्ष पुराना है पर हाल ही में जब प्रवर्तन निदेशालय (ई डी) ने अपनी 1.5 लाख पेज की रिपोर्ट में इसे मनी-लौन्डरिंग का बड़ा मामला बताकर सातारा के जरंडेश्वर शुगर मिल की नीलामी में हुए घोटाले में कारखाने को अपने कब्जे में ले लिया। यह प्रकरण केवल सहकारी शक्कर कारखानों का न होकर सहकारी बैंकों के दुरुपयोग का भी है और इसलिए गंभीर है।

प्रकरण के सूत्रधार महाराष्ट्र के उपमुख्य मंत्री अजित पवार और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार के संबंध में शिकायतकर्ताओं के दावे की वजह से और अब केद्र में बने नए सहकारी मंत्रालय से इसे राजनीतिक रंग भले ही दिया गया हो पर सच उजागर होना ज्यादा अहम् है। जरंडेश्वर शुगर मिल 40 वर्ष पहले 27000 किसानों की सदस्यता और 10 करोड़ रुपयों की पूंजी से स्थापित हुई। यह पहला उद्यम था जिसे राज्य सरकार के प्रस्ताव न देने से उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से स्थापित किया गया क्योंकि राज्य के तत्कालीन आकाओं को यह मंजूर नही था। शायद इसी नाराजी से इसे ऋण और अनुदान मिलने में रोड़े डाले गए और ऐन सीजन पर कामगारों की हड़ताल कराकर हानि पहुचाई गई और अन्तत: 2010 में विवादास्पद नीलामी पर अब ईडी की कार्यवाही हुई है।

जरंडेश्वर कारखाने के संघर्षकर्ता मालती ताई पाटिल और मणिक राव जाधव से मिली जानकारी के अनुसार पिछले 20 वर्षों में किसानों की मिलकियत के 55 शक्कर कारखाने महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के साथ मिलकर निजी हाथों में चले गए और 45 कारखाने इस बैंक ने जप्त किए, जिनकी भी जरंडेश्वर कारखाने की तरह नीलामी का षड्यंत्र है।। शिकायतकर्ता इसमे महाराष्ट्र राज्य और जिला सहकारी बैंक के द्वारा 25000 करोड़ के घोटाले का दावा करते हैं। इसके लिए ईडी ने जाँच आरम्भ की है। जरंडेश्वर कारखाने सहित जगदम्बा, अम्बालिका, पुष्पदंतेश्वर और दोंड जिले के शक्कर कारखाने शरद पवार और अजित पवार ने नीलामी नही,ं नियम कायदों की धज्जियाँ उड़ाकर निजी कारखानों में तब्दील किये है और इसलिए इसे डाका तक कहा गया।


जरंडेश्वर कारखाने के घपले को उजागर करने वाले जिन दस्तावेजों को मानिक राव ईडी के सामने लाए, उसके अनुसार 27 सितम्बर, 2010 को जरंडेश्वर कारखाना सहकारी बैंक द्वारा की गई तीसरी नीलामी में उस कंपनी को 65. 75 करोड़ में दे दिया, जिसका वार्षिक टर्नओवर 4 लाख था और जिसने नीलामी का टेंडर ही नही भरा था।

यही नहीं, इस करार के बाद कंपनी ने पैसे नही भरे और उसे एक नई कंपनी को चलाने के लिए 18 .90 करोड़ रुपयों में दे दिया, जिसे अजित पवार और उनकी पत्नी की मिल्कियत वाली निजी कंपनी ने तत्काल 20 करोड़ रुपयों की पूंजी दी। इस पूरे मामले में शरद पवार की भूमिका क्या है यह पूछने पर शिकायतकर्ता कन्नड़ सहकारी शक्कर कारखाने को शरद पवार और उनके परिवार की मिल्कियत वाली बारामती एग्रो कंपनी (मुख्यालय सिंगापुर) ने 2010 में इसी प्रकार अनधिकृत रूप से जप्त करने के दस्तावेज 26 अगस्त 2019 को दाखिल एफआईआर के साथ दाखिल किये जिसकी जाँच अब ईडी कर रही है। शिकायतकर्ता यह दावे के साथ कह रहे हैं कि शरद पवार और उनके चहेतों के वर्षों से चल रहे लूट के खेल की ईडी ने यदि सही जाँच की तो किसानों की मिल्कियत के ये कारखाने उन्हें मिलेंगे और उन्हें आत्महत्या करने की परिस्थितियां नहीं होंगी ।

संवैधानिक पेंच : घोटाले पर कार्यवाही और नये सहकारिता मंत्रालय की स्थापना से सब कुछ ठीक होगा, यह मानना अति उत्साह होगा क्योकि अभी सहकारिता का विषय संविधान के अनुसार राज्यों के कार्यक्षेत्र में है, समवर्ती सूची में नहीं जिससे केंद्र सरकार दखल दे सके। मोदी सरकार इस सत्य से गाफिल नही है तभी तो जब इस सम्बन्ध में पब्लिक इन्फोर्मेशन ब्यूरो ने प्रेस रिलीज जारी की तो उसमे साफ़ कहा गया है कि यह मंत्रालय ‘देश के सहकारिता आन्दोलन को मजबूत बनाने के लिए एक पृथक प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचा प्रदान करेगा। यह मंत्रालय सहकारिता में लगे उद्यमों ने व्यवसाय को सहज बनाने में मदद करेगा और बहुराज्यीय सहकारिता इकाइयों के विकास को सुनिश्चित करेगा।

इस प्रेस रिलीज ने फिलहाल केंद्र-राज्य में उनकी कार्यसूची का टकराव तो नही होगा, पर यह भविष्य ही बताएगा कि यह मंत्रालय अपने हाथ मजबूत करने और सहकारिता में मची लूट को रोकने के लिए आगे क्या करता है। नये मंत्रालय ने यदि अपने घोषित लक्ष्य के अंतर्गत ही इन घोटालों का सही-सही डाटाबेस बना लिया तो ईडी के पास भले ही प्रकरण में अब तक 70 राजनेताओं की सूची हो, पर ऐसा माना जा सकता है कि यह राजनैतिक ग्रहण खग्रास होगा। महाराष्ट्र की राजनीति में सचिन वाजे प्रकरण के साथ ही इसका वेधकाल भी अब आरंभ हो चुका है।
(लेखक प्राध्यापक व आर्थिक मामलों के विश्लेषक हैं। )

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