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ब्रह्मविद्या: सर्वज्ञ, सर्वभूत और सर्वशक्तिमान

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अविनाशी तत्व है और दैहिक शक्तियों और कार्यों, ज्ञान और क्रिया की इंद्रियों, मन, अवचेतन, बुद्धि और अहंकार के दायरे से परे है । इन्द्रियां और अन्य क्रियाएं तभी आवश्यक होती हैं जब किसी वस्तु के ज्ञान की, उसके विषय में जानकारी की, या कोई भी कार्य करने की आवश्यकता होती है।

  • प्रो. हिमांशु राय, निदेशक, आईआईएम इंदौर

अन्य कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के साथ ही मुंडकोपनिषद एक मौलिक प्रश्न का उत्तर भी देता है: ‘वह क्या है जिसके ज्ञान से सब कुछ ज्ञात हो जाता है? एक वस्तु के ज्ञान से प्रत्येक वस्तु के ज्ञान की प्राप्ति का स्वत: यही अर्थ होगा कि सब कुछ उसी वस्तु से बना है, उसी से निर्मित है, उसी पर आधारित है। सामान्यतया, एक वस्तु के ज्ञान का अर्थ, दूसरी वस्तु का ज्ञान होना आवश्यक नहीं है,किन्तु ‘ब्रह्मविद्या सभी प्रकार के ज्ञान को अपने आप में रूपांतरित कर देती है। अर्थात यह ‘ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी के समान है, जिसमें अन्य सभी उत्तर,एक उत्तर में सम्पूर्ण रूप से समाहित हो सकते हैं।

इस विद्या को समझने के लिए सिर्फ बौद्धिक ज्ञान ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक ज्ञान की भी आवश्यकता होगी। आध्यात्मिक ज्ञान उस प्रत्यक्ष अनुभव को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब प्राप्त होता है जब ज्ञान के उद्देश्य का सार, ज्ञान के विषय के सार में सम्मिलित और समाहित हो जाता है। इस प्रकार, बौद्धिक ज्ञान के विपरीत, यह ज्ञान द्वैत से परे है , और अंतज्र्ञान और बोध से संबंधित है। आध्यात्मिक ज्ञान सभी कारणों और प्रभावों सहित, हर मौजूद वस्तु के ज्ञान का सार है। इसे प्रारंभिक तौर पर समझने के लिए चार वेदों: ऋग्यवेद, साम और अथर्व, और साथ ही ध्वन्यात्मकता, कर्मकांड, व्याकरण, व्युत्पत्ति, आदि का ज्ञान होना आवश्यक है। यह ज्ञान सही कार्यों की ओर ले जाता है, जब कि ब्रह्मविद्या की प्राप्ति से पहले सभी क्रियाएं भी समाप्त हो जाती हैं। ब्रह्मविद्या अनुभूति और जागरूकता से परे हंै और पूर्ण अनुभव प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।

एक बुद्धिमान और ज्ञानी व्यक्तिउसे देख सकता है जो शाश्वत, अगोचर, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सूक्ष्म, अविनाशी है और सभी प्राणियों का स्रोत है। यह अविनाशी तत्व है और दैहिक शक्तियों और कार्यों, ज्ञान और क्रिया की इंद्रियों, मन, अवचेतन, बुद्धि और अहंकार के दायरे से परे हंै। इन्द्रियां और अन्य क्रियाएं तभी आवश्यक होती हैं जब किसी वस्तु के ज्ञान की, उसके विषय में जानकारी की, या कोई भी कार्य करने की आवश्यकता होती है। ‘निरपेक्षता को कुछ ‘जानने या कुछ भी ‘करने की आवश्यकता नहीं है, और यह हृास या क्षय नहीं करता है क्योंकि इसमें न तो अंग हैं, न ही गुण, न ही ऐसी विशेषताएं जो परिवर्तन के अधीन हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक चेतना को प्राप्त कर चुके हैं, वे इस आत्मा को हर स्थान पर, बिना किसी भेदभाव के, अस्तित्व में अनुभव कर सकते हैं।

इसी अविनाशी शक्ति से ही यह ब्रह्माण्ड भी उत्पन्न होता है, उसी से यह अस्तित्व में है। यह अपनी विशुद्ध इच्छा से फैलता है, मौलिक द्रव्य और तत्वों का उत्पादन करता है। यह मौलिक तत्व तब प्राण, मन और सत्य को जन्म देते हैं। इसे ‘अन्न या भोजन कहा जाता है, क्योंकि यह आंतरिक रूप से और साथ ही बाहरी रूप से आत्मा द्वारा अनुभव की वस्तु है। इसी तत्व और आत्मा का सह-अस्तित्व ब्रह्मांडीय जीवन को संभव बनाता है, जिसे ‘हिरण्यगर्भ भी कहा जाता है। यह हिरण्यगर्भ सर्व-ज्ञान और सर्व-शक्ति का मेल है। वह सर्वज्ञानी है क्योंकि वह ‘निरपेक्ष पर आधारित है और वह सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह जगत के अस्तित्व का आधार है।

मन,जो कि विचार और संदेह का केंद्र है और बुद्धि,जो निर्णय लेने और भेदभाव करने की क्षमता है, इस मौलिक तत्व के प्रभाव से ही उत्पन्न होते हैं। मन क्रिया की ओर प्रवृत्त होता है, जिसके परिणाम स्वरूप क्रिया का प्रदर्शन होता है। चूंकि प्रत्येक क्रिया की अपनी प्रतिक्रिया होती है, कर्म के फल हमेशा उनकी उत्पत्ति से अविभाज्य रहते हैं। कर्म के फल को ‘अमृत या अविनाशी कहा जाता है, क्योंकि जब तक आत्म-ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती, तब तक इन कर्मों के फल कभी नष्ट नहीं हो सकते।


यह सर्वोच्च शक्ति सर्वज्ञ और सर्वभूत है। इसका सर्वभूत होना हर वस्तु के सामान्य सार के ज्ञान से संबंधित है, जबकि इसकी सर्वज्ञता विशेष रूप से हर वस्तु का ज्ञान है। जहां ज्ञान है, वहां शक्ति है क्योंकि शक्ति ज्ञान का ही एक रूप है। यदि किसी का ज्ञान अपूर्ण है तो सच्ची शक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। जितना अधिक ज्ञान, उतनी ही अधिक शक्ति और इसलिए, सर्वज्ञता भी सर्वशक्तिमान है। वास्तविक शक्ति प्रयास का प्रभाव नहीं है, बल्कि आत्म-पूर्णता का एक सहज अनुभव है, जो किसी बाह्य वस्तु पर निर्भर नहीं है। यह सर्वोच्च पूर्णता, जिसकी शक्ति ज्ञान है, ब्रह्मांडीय निर्माता के रूप में प्रकट होती है, जो ब्रह्मांड के रूपों और तत्वों के अस्तित्व का कारण बनती है।

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