पुस्तक कक्ष: कथित प्रगतिवादी इतिहास के लेखन पर क्यों मचाते हैं शोर

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आजकल कथित प्रगतिशील लोगक्षकेंद्र सरकार के इतिहास पुनर्लेखन सहित अतीत की त्रुटियों को सुधारने और संशोधन के प्रयासों का पुरजोर विरोध करते हैऔ। बड़े पदों पर बैठे लोग या अतीत में सरकार के पुरस्कारों और सम्मान से नवाजे गए बुद्धिजीवी पुरस्कार लौटाने की मुहिम चलाते हैं । वर्ष 1998 में भी उन्होंने ऐसा ही शोर मचाया था । उस समय देश के जाने-माने पत्रकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने एक पुस्तक लिखकर इन बुद्धिजीवियों के इरादों का खुलासा किया था। इस पुस्तक की प्रस्तावना से ही अरुण शौरी के कार्य का अंदाज लगा सकते हैं-


जून-जुलाई 1998 में प्रगतिवादियों ने अच्छा खासा गुलगपाड़ा खड़ा कर दिया। उन्होंने शोर मचाना शुरू किया कि सरकार ने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में राम मंदिर समर्थक इतिहासकार भर दिए हैं। साथ ही उन्होंने यह भी इल्जाम लगाया कि सरकार ने चोरी-छिपे परिषद के उद्देश्यों और लक्ष्यों को भी बदल डाला है। जैसा कि उनकी आदत है, उन्होंने एक कपट जाल फैलाकर हलचल पैदा कर दी।


अपनी एक और आदत के अनुसार उन्होंने दूसरे लोगों पर भविष्य में किसी भी समय वह कुछ करने की योजना बनाने का आरोप लगाया, जो कुछ वे स्वयं दशकों से वस्तुत: करते चले आए थे अर्थात किसी उद्देश्य को लेकर इतिहास लेखन का कार्य। इस हलचल ने मुझे उनकी कारगुजारियों की जांच पड़ताल करने और यह देखने के लिए मजबूर कर दिया कि उन्होंने भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद जैसी संस्था का क्या हाल कर डाला है। इसके लिए मैंने उनके द्वारा लिखी गई पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन किया।


छोटे-छोटे घोटाले भी सामने आए। करोड़ों रुपए की घपलेबाजियों के हम इतने आदी हो चुके हैं कि इस वृत्तांत में उल्लिखित राशियां जेबकतरों द्वारा खसोटी गई राशियों से भी कम प्रतीत होंगी। कुछ हद तक ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे आदर्शों में काफी ढीलापन आ चुका है और कुछ इसलिए कि इन प्रतिष्ठित व्यक्तियों का असली अपराध उनके द्वारा पहुंचाए गए धन संबंधी नुकसान से नहीं जुड़ा है। उनके अपराध का संबंध उस दशा से है जिस दशा में उन्होंने संस्थाओं को पहुंचा दिया है। उनका अपराध उनकी लापरवाही में है जिसके कारण भी सब काम मंद पड़ गए जो कि हमारे देश के लिए कितने महत्वपूर्ण थे।

जिस तरह से वे इन संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसके लिए तो वे और ज्यादा अपराधी हैं। निस्संदेह उन्होंने इन संस्थाओं का इस्तेमाल अपने सुख और आराम के लिए किया है। और इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने एक दूसरे की प्रतिष्ठा का विज्ञापन करने के लिए इन संस्थाओं का इस्तेमाल किया। लेकिन इस सबसे बुरी बात यह हुई है कि उन्होंने इन संस्थाओं पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल सार्वजनिक चर्चा को रोकने और लोक नीति को अस्त-व्यस्त करने के लिए किया है। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की है कि भारत की धरती शून्य पड़ी थी और उसकी शून्यता को भरा एक के बाद एक आने वाले हमलावरों ने।

उन्होंने आज के भारत और उससे भी ज्यादा हिंदू धर्म को एक चिडिय़ाघर के रूप में पेश किया जिसमें भांति-भांति के एक दूसरे से बिल्कुल अलग किस्म के प्राणी बसते हैं। उनका यह कहना है कि भारत जैसी कोई चीज नहीं थी, यह तो मात्र एक भौगोलिक अभिव्यक्ति थी, इसका निर्माण तो आकर अंग्रेजों ने किया। इसके अलावा हिंदू धर्म जैसी भी कोई चीज नहीं थी। यह तो मात्र वह शब्द है जिसका इस्तेमाल अरबियों ने उन भारतीय भारतीय लोगों के लिए किया जिनसे उनका सामना हुआ था। हिंदू धर्म की कल्पना तो संप्रदायवादियों द्वारा एकरूपता आरोपित करने के लिए की गई है।

इसके लिए उन्होंने हमारे इतिहास में हिंदू काल पर तो कालिख पोत दी है और जैसा कि हम देखेंगे, इस्लामी काल पर उन्होंने पूरी मेहनत से कलाई चढ़ा दी है। उन्होंने भारत की प्राचीन सामाजिक प्रणाली को उत्पीडऩ कह कर उसकी घोर निंदा की है और सर्व सत्तात्मक विचारधाराओं को समतावादी और न्याय संगत साबित किया है। उन्होंने हमारी प्राचीन संस्कृति का महत्व घटाकर जो समन्वयवादी तत्व जीवित रह पाए थे उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है। उन्हीं को हमारी पूरी संस्कृति सिद्ध किया है जिसे वे मिली-जुली संस्कृति कहते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो कौन सी संस्कृति मिली-जुली नहीं होती।

हमेशा ही उन्होंने हमारे लोगों के जीवन में इन समान तत्वों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने की कोशिश की है; और वे तथ्य यह है कि लगभग 1000 वर्ष तक इस्लामी शासकों और उलमा द्वारा इन समान तत्वों को मिटा देने की जबरदस्त कोशिशों के बावजूद वे बचे रह पाए। इतना ही नहीं पिछले 150 वर्षों के दौरान अंग्रेज शासकों और मिशनरियों की लगातार इस कोशिश के बावजूद कि हम इन तत्वों को भुलाकर इनका त्याग कर दें, हमारे लोग इन तत्वों को अपने में सुरक्षित रख पाए, बल्कि उन्होंने हमारे समाज के हर वर्ग को कुछ खास उपादानों में अपनी पहचान और मूल प्रवृत्ति खोजने के लिए भड़काया और कहा कि यदि अपने जीवन का हिस्सा बना लें तो वह अपना एक अलग अस्तित्व कायम रख पाएंगे।

इे बावजूद हमारी संस्कृति के समान तत्व बरकरार रहे। सबसे बड़ी बात यह है कि आज के समय में इन बुद्धिजीवियों और इनके जैसे अन्य कई लोगों ने तबलीगी जमात और चर्च जैसे संगठनों के कार्यकलापों से लोगों का ध्यान हटा दिया है। यह संगठन अपनी तरफ से भरपूर कोशिश कर रहे हैं और इस उद्देश्य के लिए अनगिनत साधन लगा रहे हैं कि उनके अनुयायी उन तमाम प्रथा और विश्वासों को त्याग दें जो उनके और उनके पड़ोसी हिंदुओं के बीच समान है।


भी ऐसा इसलिए कर पाए हैं क्योंकि जो कुछ भी प्रस्तुत कर रहे थे, उदाहरण के लिए माक्र्सवादी ‘स्थापना जिसकी वे पाठ्य पुस्तकों में रट लगाए जा रहे थे, समय के मिजाज के मुताबिक थी। इसलिए कि उनके वर्ग के लोग पत्रकारिता जैसे व्यवसायों और विश्वविद्यालयों में महत्वपूर्ण पदों पर थे और इसलिए भी कि शासकों ने यह पहचान लिया था कि वोट इकट्ठे करने के लिए प्रगतिशीलता की कलगियां लगाना नीति सम्मत होगा।

-भूमि

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