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पुस्तक कक्ष : कांग्रेस के पतन की कई भीतरी कहानियां

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पुस्तक : द ग्रेट अनरेवलिंग : इंडिया अनरेवलिंग
लेखक : संजय झा
प्रकाशक : ऑननेक्स्ट


हाल में कांग्रेस के निष्कासित प्रवक्ता और पार्टी की ओर से टेलीविजन पर तार्किक बहस करने वाले बौद्धिक चेहरे संजय झा की चर्चित पुस्तक द ग्रेट अनरेवलिंग : इंडिया आफ्टर 2014 (एक बड़ा खुलासा : भारत 2014 के बाद)) प्रकाशित हुई है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन ने इसकी भूमिका लिखी है। पुस्तक कांग्रेस के पतन की कई भीतरी कहानियां कहती है। इसके अंश-

फरवरी 2014 के आखिरी सप्ताह में एक सुबह मुझे राहुल गांधी के निजी सचिव कनिष्क सिंह का फोन आया। वह राहुल गांधी को उनकी राजनीतिक सोच के लिए महत्वपूर्ण जानकारियां देते हैं और अमेठी विधानसभा क्षेत्र की देखरेख करते हैं। कनिष्क ने कहा कि अर्णब गोस्वामी के बारे में उन्हें सब कुछ बताएं। उनके कैरियर, परिवार, दोस्त, राजनीतिक विचारधारा बगैरा। मैंने कुछ बड़ा होने की बात को भांपते हुए पूछा -क्यों? मुझे एहसास था कि राहुल गांधी उस व्यक्ति को खास साक्षात्कार देने जा रहे हैं जो स्थापना विरोधी पत्रकारिता का ‘पोस्टर बॉयÓ बन चुका है। और जो कांग्रेस और उसकी प्रथम परिवार पर मीठी-मीठी मार मारता है। ज्यादातर कांग्रेसी नेता, उन्हें प्लेग समझ कर दूरी बनाए रखते थे लेकिन मैं उनके चर्चित कार्यक्रम न्यूज अॅवर का नियमित भागीदार था।

मनीष तिवारी ने एक बार मुझे कहा था आप किसी पत्रकार के सच्चे दोस्त कभी नहीं हो सकते। शायद यह सच था। मैंने कहा कि मेरे व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार अर्णब एक निर्मम प्रश्नकर्ता हैं जो अपना गृहकार्य बहुत अच्छा करते हैं और अपनी राजनीतिक अभिरुचि के मुद्दों व व्यक्तियों पर काम करते हैं। जब भी किसी व्यक्ति या मुद्दे के पीछे जाते हैं तो उसे पूरी तरह निचोड़ते हैं। मैंने कहा कि यदि हम उनके साथ कुछ करने जा रहे हैं तो मेरे दो सुझाव हैं। बहुत तैयारी के साथ जाएं और उनकी दिखावटी शिष्टता के झांसे में ना आएं। फिर मैंने पूछा कि बहरहाल उनसे कौन बात करने जा रहा है? हालांकि मुझे स्पष्ट था कि राहुल गांधी अर्णब को साक्षात्कार देने जा रहे हैं। यह बड़ा अवसर था लेकिन मैं इसे लेकर चिंतित था

राहुल ने इसके पहले किसी टेलीविजन को औपचारिक साक्षात्कार नहीं दिया था। उनसे इस दौरान भारी अपेक्षाएं की जा रही थीं और मोदी के नेतृत्व में बढ़ती हुई भाजपा को रोकने की कांग्रेस को जरूरत थी। ‘टाइम्स नाउÓ ने गोस्वामी के साथ राहुल के साक्षात्कार को पहले से ही प्रचारित करना शुरू किया। अल्पभाषी और अनिच्छुक राहुल गांधी जिन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था, का यह भारत के उस विशिष्ट टीवी एंकर के साथ इंटरव्यू होने जा रहा था, जो किसी को नहीं बख्शता। इसलिए लोगों ने मुझसे पूछा कि राहुल गांधी ने दूसरे एंकरों की बजाय अर्णव गोस्वामी को क्यों चुना। मैं इस फैसले से स्तंभित था। हालांकि मुझे उम्मीद थी कि राहुल में साक्षात्कार सफलतापूर्वक देने की योग्यता है और भारत जवाहरलाल नेहरू के पोते को दुनिया की 16त्न आबादी के भविष्य के बारे में बात करते हुए देखेगा। लेकिन आधा इंटरव्यू होते-होते दो बातें स्पष्ट हो गईं कि राहुल की इस सबसे बड़े अवसर के लिए कोई तैयारी नहीं थी और अर्णब गोस्वामी इंटरव्यू को अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य- राहुल गांधी का करिअर खत्म करने की तरफ ले जा रहे थे।

जब मैंने गोस्वामी को अद्भुत विनम्र देखा, तभी मैं तत्काल सावधान हो गया, राहुल संकट में थे। उनके सलाहकार सरासर विफल हो चुके थे। वे यह नहीं जानते थे कि इसकी विफलता का दोनों, राहुल गांधी और कांग्रेस पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा। इंटरव्यू के बाद के विश्लेषण यही उभरकर आया कि राहुल गांधी बातों को दोहरा रहे थे, विचलित दिख रहे थे, तैयारी का अभाव था और एंकर से आंख नहीं मिला रहे थे। भाजपा ने राहुल को ‘पप्पूÓ कहना शुरू किया। यह ऐसा तमगा था जिसने राहुल की व्यक्तिगत छवि का नाश तो किया ही, कांग्रेस पर बुरा असर भी डाला।

यह कहा जाने लगा कि कांग्रेस अपनी ही शत्रु है। आपसी झगड़े उसके डीएनए में हैं और इनसे कांग्रेस थक चुकी है। कई दशकों तक सत्ता में रहने के कारण केंद्र और विभिन्न राज्यों में इसका विशालकाय ढांचा सुस्ती और आलस का शिकार हो चुका है। इसके नेता न केवल अहंकारी हो गए बल्कि राजनीतिक अंधता में शिकार हो चुके हैं। गांधी परिवार ने कई नेताओं को खड़ा किया लेकिन उन्होंने कांग्रेस की चुनाव में जीत के लिए प्रचार नहीं किया। केवल प्रथम परिवार के प्रति राज भक्ति का प्रदर्शन करते रहे। जो कांग्रेस अभी कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क का बढिय़ा तंत्र रखती थी और जनता का फीडबैक लेती थी, जिला स्तर तक के पदाधिकारियों को शक्ति का विकेंद्रीकरण किया गया था और सामाजिक न्याय के लिए लड़ती थी, वह अब बदले हुए समय और सामाजिक वातावरण से कट चुकी थी। शीर्ष नेतृत्व सब ठीक-ठाक बताता रहा। 2014 के चुनाव ने पार्टी पर एक बड़ा आघात किया।

2017 तक वह कई अवसर खो चुकी थी। 2013 में राडिया टेप्स ने उसकी छवि को मलिन कर दिया था। यह विडंबना थी की उम्रदराज नेता नरेंद्र मोदी, जो संघ के पूर्व प्रचारक हैं और धार्मिक श्रेष्ठता में भरोसा करते हैं, कम वैज्ञानिक समझ रखते हैं, राहुल गांधी से ज्यादा युवा माने गए। यह कैसे संभव हुआ? राहुल गांधी युवा माने जाते थे, तकनीक प्रेमी थे, जींस और टीशर्ट पहनते, समुद्र में गोताखोरी के लिए प्रशिक्षित हैं और बाइक चलाने के शौकीन हैं, ब्लैकबेल्ट धारी है, समलैंगिकों से बात करते हैं, पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं, मानवाधिकारों की बात करते हैं लेकिन युवाओं के बीच में मोदी नायक के रूप में सामने आए। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की दुर्गति के बाद तत्कालीन उपाध्यक्ष और पार्टी के सितारा प्रचारक राहुल गांधी भीषण आलोचना के घेरे में आ गए।

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