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पुस्तक कक्ष: चचनामाह : अल्पज्ञात ऐतिहासिक ग्रंथ

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सिंध के इतिहास के रूप में अल्पज्ञात किताब है चचनामा। यह अविभाजित भारत के 7वीं-8वीं सदी के राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर रोशनी डालती है और उस काल की भारतीय मानसिकता को भी प्रकट करती है। खासकर इस अर्थ में कि उस काल में सीमा पर उन श्रमणों का वर्चस्व था जो युद्धकला के जानकार होकर भी आक्रांताओं के आगे हथियार डालने में समझदारी मानते थे और भारतीय उस ज्योतिष पर आंख मूंदकर यकीन करते थे जो भविष्य कथन के रूप में उभर चुका था। भविष्य वक्ता बारंबार अरबों की हिंद पर हुकूमत को कामयाब बताते जाते और आलम ये था कि जीत का हौसला रखने वाले योद्धा भी हार को शिरोधार्य करना समझदारी मानने लगे थे। दूसरी ओर, अरब में खलीफाओं के आह्वान पर मोहम्मद बिन कासिम जैसे योद्धा भारत को संपदा का देश मानकर लूट के लिए धावे मारने के इरादे बुलंद किए जा रहे थे।

इस पुस्तक में तत्कालीन पत्र व्यवहार के कई नमूने हैं जो युद्ध क्षेत्र से लिखे जाते थे। लगता है कि रचनाकार को पत्राचार की फाइल ही मिल गई थी। युद्ध के मैदान में जिस तरह के भाषण दिए जाते थे, उनके भी नमूने हैं। कासिम के लिए कहा गया है कि वह वाअज़ देकर सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं को उकसाता रहा और इसका खूब अच्छा फायदा लेता रहा। उसने करीब 15 सौ मन सोना, हीरे और जवाहरात केवल मुल्तान शहर से ख़लीफे को भेजे थे। ज्योतिष की भूमिका को भी जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी गई।

यह बात गौरतलब है कि युद्ध के लिए मुहूर्त, शकुन, कर्मकांड इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि राजागण तक उन पर ऐतबार करने लगे थे। याद रखना चाहिए कि छठवीं सदी में वराहमिहिर तक ने युद्ध यात्रा को लेकर तीन ग्रंथ लिखे थे- बृहद्यात्रा, योगयात्रा और लघु टिकणिका। चचनामा में राजा दाहरसेन, चच, जयसिंह आदि का जिक्र आया है। ज्योतिषीय विश्वास का एक नमूना ग्रंथ में दिया है – ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक देखकर कहा कि लगता है कि जीत इस्लामी लश्कर की होगी, कारण कि शुक्र ग्रह कासिम की पीठ पर है। राय दाहर यह जानकर क्रोधित हो गया। नजूमी ने कहा, हुजूर शुक्र ग्रह का एक पुतला सोने का बनवाकर उसे राय दाहर के हाथी की पालकी के पीछे बांधा गया और इस तरह शुक्र उसकी पीठ पर स्थापित हो गया तो उन्हें भी जीत की आशा बंध गई। (पृष्ठ 106)

चचनामा से यह भी विदित होता है कि अरब जब सिंध में स्वयं को स्थापित करने में लगे तो लोगों की महारत देख हैरान रह गए। भारतीयों पर प्रभाव डालने की बजाय खुद प्रभावित होने लगे। अरब के विद्वानों ने भी यहां आना प्रारंभ किया। ब्राह्मणों, बौद्धों आदि से दर्शन, ज्योतिष, गणित का ज्ञान, औषधि ज्ञान, रसायन विज्ञान जैसे विषयों का ज्ञान लेने लगे। (पृष्ठ 164) हालांकि इसमें कुछ तिलस्मी कहानियां भी कम नहीं हैं। एक जादूगरनी का जिक्र आया है जो 40 मिनट में धरती का चक्कर काट आई और श्रीलंका से जायफल के फूल लेकर आ गई…।
– डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’

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