गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिन : जात न पूछो साहित्यकार की..

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13 नवम्बर को गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिन है। मुक्तिबोध ने हिंदी साहित्य को नये तेवर दिये। नई भाषा, नई दृष्टि दी। पिछले दिनों जब प्रगतिशीलता के नाम पर कुंठित विचारधारा वाले किसी ‘भ्रष्टपंथी ने मुक्तिबोध के ब्राम्हण होने की चर्चा की, तो मैं सोचने लगा, इन सब की बुद्धि कितनी भ्रष्ट हो चुकी है। कोई भी सच्चा लेखक जाति-धर्म से परे होकर सृजन करता है।

  • गिरीश पंकज

13 नवम्बर को गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिन है। मुक्तिबोध ने हिंदी साहित्य को नये तेवर दिये। नई भाषा, नई दृष्टि दी। पिछले दिनों जब प्रगतिशीलता के नाम पर कुंठित विचारधारा वाले किसी ‘भ्रष्टपंथीÓ ने मुक्तिबोध के ब्राम्हण होने की चर्चा की, तो मैं सोचने लगा, इन सब की बुद्धि कितनी भ्रष्ट हो चुकी है। कोई भी सच्चा लेखक जाति-धर्म से परे होकर सृजन करता है। अगर एक लेखक जातिवाद के इर्द-गिर्द अपने चिंतन को सीमित रखता है, तो वह किसी भी कोण से लेखक नहीं है। अगर लेखक है,तो बेहद संकुचित दृष्टिकोण वाला। ऐसे लोग समाज में सिर्फ घृणा फैलाने का काम करते हैं।

एक मूर्ख बंडल लेखक सोशल मीडिया में साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध को भी ब्राह्मणवाद के चश्मे से देख रहा था। मुंशी प्रेमचंद को कायस्थ के रूप में देखने वाले बीबी कम नहीं हैं। कोई भी साहित्यकार किसी भी जाति-धर्म विशेष में पैदा हो सकता है क्योंकि पैदा होना उसके बस में नहीं था। लेकिन किसी खास जाति या धर्म विशेष में पैदा होकर वह सिर्फ उसी जाति या धर्म के इर्द-गिर्द मंडराए, तब हम कह सकते हैं कि वह जातिवाद से ग्रस्त है । अगर उस लेखक के समग्र चिंतन में जाति या धर्मवाद का कोई अंश ही नहीं दिखाई देता तो, फिर भी हम सिर्फ इस कारण उससे नफरत करने लगे कि वह फलानी जाति का है या वह ब्राह्मण है, तो इससे अधिक भयावह शर्मनाक सोच दूसरी नहीं हो सकती।

आज जातिवाद और ब्राह्मणवाद की बात करते-करते हालत यह हो गई कि बहुत से लोग अपने आपको ब्राह्मण दिखाने के लिए अपने सरनेम को बदल कर ब्राह्मणों के विभिन्न सरनेमों को लिखने लगे हैं । यह कौन-सी मानसिकता है ? यह दर्शाती है कि कहीं-न-कहीं कुछ लोग अपनी पहचान छुपा कर खुद को ब्राह्मण बताने की छद्म कोशिश कर रहे हैं। अगर ब्राह्मण होना इतनी ही बुरी बात है तो आप अपने नाम के साथ ब्राह्मण वाले सरनेम क्यों लगा रहे हैं?

भारतीय समाज में शुरू से वर्ण व्यवस्था कायम रही है। वर्ण व्यवस्था में कर्मानुसार जाति व्यवस्था बनी। प्रारंभिक काल में इन तमाम जातियों में आपसी समरसता थी, लेकिन धीरे-धीरे मानसिकता में संकुचन आने के कारण ऊँची जाति और नीची जाति की मानसिकता घर करने लगी, और समाज में अलगाव का माहौल बनने लगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आज जो उच्च जाति में पैदा हुआ है, वह भी उसी मानसिकता से ग्रस्त है। मैं भी ब्राह्मण जाति में पैदा हुआ लेकिन मेरे मन में कोई ब्राह्मणवाद नहीं है।

मैंने कभी किसी अन्य जातियों को छोटा नहीं समझा। उनके साथ बैठकर खाता-पीता रहा हूं । उन्हें बढ़कर गले भी लगाया, क्योंकि मेरा संस्कार यही कहता है। मेरे पिता ने मुझे यही सिखाया। हरिजन सेवक संघ से भी जुड़ा हुआ हूं। मैं कबीर के चिंतन का अनुगामी होकर उन्हीं की बाद दोहराता हूं,’जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान’। यहां में साधु की जगह व्यक्ति रखकर कहता हूं । जात न पूछो व्यक्ति की पूछ लीजिए ज्ञान । और फिर बाद में जोड़ता हूँ,
जात न पूछो लेखक की, पूछ लीजिए ज्ञान।
वह सच्चा इन्सान नहीं, जामे जात-अभिमान।


अनेक प्रगतिशील सोच वाले ब्राह्मण न तो ब्राह्मणवाद से ग्रस्त हैं,और न इसे पसंद ही करते हैं। वे उदारवादी मनुष्य होकर वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं । तुलसीदासजी के शब्दों में कहें तो ‘सियाराम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोर जुग पानीÓ की सोच के साथ लेखन कार्य भी करते हैं । लेकिन कुछ लोग बेहद कुंठित होकर ब्राह्मणों को गाली देते हैं। दूसरे सवर्णों के बारे में गलत-सलत बातें करते हैं और समाज में नफरत की जहरीली हवा फैलाते रहते हैं । ठीक है कि एक वर्ण व्यवस्था के तहत सदियों से पूरा सिस्टम चल रहा है लेकिन यह सोचना चाहिए कि इसी सिस्टम ने एसटी, एससी और ओबीसी की व्यवस्था करके सब के उन्नयन का मार्ग प्रशस्त किया है।

आरक्षण इसी भावना की देन है, जिसके कारण तमाम पिछड़े हुए लोग मुख्यधारा में आकर आज कंधे-से-कंधा मिलाकर चल रहे हैं। जैसे-जैसे मनुष्य विवेकवान होता जा रहा है, वह जातिवाद, धर्मवाद से ऊपर उठ रहा है। लेकिन कुछ लोग आज भी इसी मुद्दे को जबरन और रह-रहकर अनावश्यक रूप से हवा देते रहते हैं। हद तो तब हो जाती है कि वे किसी महान लेखक के सृजन को न देख कर उसकी जाति पर आ कर टिक जाते हैं। जैसे कौवे की नजऱ गंदगी पर रहती है, उसी तरह आज तथाकथित रूप से शिक्षित कुछ लेखकों की नजर जातिवाद पर ही टिकी रहती है। साहित्य की दुनिया में ऐसे अनेक फर्जी लेखक सक्रिय हैं। फर्जी इसलिए कि कोई भी सच्चा लेखक जातिवाद का जहर फैलाएगा ही नहीं । कोई ब्राह्मण है तो है। कोई ठाकुर है तो है। कोई वैश्य है तो है! इसमें उसकी क्या गलती? हां, उसके व्यवहार में अगर कोई अलगाव नजर आये, उसकी मानसिकता संकुचित लगे, तब आप उसकी निंदा कर सकते हैं। लेकिन जब वह विशुद्ध रूप से मानवीय नजरिये के साथ सृजनरत है, तो आपको उसकी तारीफ करनी चाहिए न कि उसकी जाति पर सवाल उठाना चाहिए।

पिछले दिनों एक सज्जन मुझसे कहने लगे कि आप तो ब्राह्मण हैं। मैंने उत्तर दिया, जी हां, हैं। इसमें मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं है। लेकिन मैं गर्व से ढिंढोरा पीटते हुए भी नहीं घूमता कि ब्राह्मण हूं । अलबत्ता अपने ब्राह्मण होने को छुपाने के लिए मैंने अपना उपनाम ‘पंकजÓ रखा है । दुर्भाग्य से आपको इस बात पर भी आपत्ति है, तो क्या मैं अपना जीवन ही समाप्त कर दूं ?’ सज्जन कुछ बोले नहीं, बस बड़बड़ करते रहे। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि कायदे से देखें तो अब समाज में केवल दो ही जातियां हैं। एक अमीर जाति, दूसरी गरीब जाति। अमीरों में सवर्ण और दलित भी शामिल है। गरीबों में स्वर्ण शामिल भी शामिल हैं और दलित भी हैं। यह साफ साफ देखा जा सकता है कि जिसे जब मौका मिला, वह किसी कमजोर का शोषण करने से बाज नहीं आया। तो जाति व्यवस्था को भूल जाइए। सिर्फ अमीरी और गरीबी पर चर्चा कीजिए।

गनीमत है, सज्जन मेरी इस बात से सहमत नजऱ आए। तो ऐसे अनेक बुद्धिहीन लोग हैं जो अनावश्यक रूप से गाँठ बांधे हुए हैं कि फलाना ब्राह्मण है, या ठाकुर है। अगर कोई कवि ब्राह्मण है तो इस कारण वह कवि नहीं है वरन उसके अंदर कविता के संस्कार हैं इसलिए वह कवि है। किसी कवि से इसलिए नफरत करना कि वह ब्राह्मण,कायस्थ, ठाकुर या अग्रवाल है, यह छोटी मानसिकता है। अगर कोई खास जाति के लोग इतने ही बुरे हैं तो उनके सरनेम को उठाकर अपने साथ चस्पा करने की ललक ही क्यों ? आप जो हैं, अपनी उसी पहचान के साथ जीने की कोशिश करें। जैसे बहुत सारे लोग कर रहे हैं और अपनी प्रतिभा से साहित्य और समाज में अपनी जगह भी बना रहे हैं।

ओमप्रकाश वाल्मीकि, शरणकुमार लिंबाले, सूर्यनारायण रणसुभे, नामदेव धसाल आदि अनेक नाम है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बलबूते साहित्य में जगह बनाई और समाज में उनकी जाति के साथ होने वाले शोषण और अन्याय के विरुद्ध लिखकर लोगों को सोचने के लिए मजबूर भी किया । सचमुच दलितों के साथ एक दौर में काफी अत्याचार हुआ। आज भी कहीं-न-कहीं यह मानसिकता जारी है, तो उस मानसिकता के खिलाफ लड़ाई ज़रूरी है। मैंने देखा है इस मानसिकता के विरुद्ध लडऩे वालों में अनेक ब्राम्हण भी शामिल हैं, और ठाकुर आदि भी । ऐसा नहीं है कि समाज में उच्च जाति के लोग शोषण ही कर रहे हैं । वे शोषण के खिलाफ अपनी आवाज़ भी बुलंद कर रहे हैं। कोई भी समझदार व्यक्ति, व्यापक सोचवाला इन्सान संकुचित नहीं हो सकता। वह न जातिवादी होगा, न ब्राह्मणवादी होगा। वह पूँजीवादी भी नहीं होगा। वह हमेशा मानवतावादी, सर्वोदयी और समाजवादी सोच वाला ही होगा। जो बेहद कुंठित हैं, वही उच्च जाति को देखकर उन पर संदेह करते हैं। हमारा सदियों पुराना नीति वाक्य रहा है ‘उदरचरितानामतु वसुधैव कुटुंबकमÓ। इसी उद्घोष के साथ हमें आगे बढऩा है और जातिवादी मानसिकता से ऊपर उठकर सृजन करना है।

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