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मंच से सिनेमा तक उपस्थिति दर्ज कराते भोपाली शायर और कव्वाल..

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राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक


आज बात, मंच से लेकर सिनेमा के पर्दे तक छाये भोपाल की कव्वाल और शायरों की….

उन्नीस सौ अठासी में एक खास मकसद से बम्बई में लिए गए धुआंधार इंटरव्यूज की बेहद लम्बी फेहरिस्त में देश विदेश में मशहूर कव्वाल शकीला बानो भोपाली के अलावा भोपाल में… कैफ भोपाली साहब से यादगार मुलाकात भी शुमार हैं..
बम्बई के बांद्रा में….मस्जिद वाले चौराहे को पाश्र्ववगायक मोहम्मद रफी चौक नाम दिया गया है… यहां से पाली हिल की तरफ जाते हुए सीधे हाथ की एक तंग गली के मुहाने पर दोमंजिला मकान में… मैं अपने एक पत्रकार साथी रवि भाई के साथ मिलने पहुंचा था… शकीला बानो भोपाली से…सीढिय़ां चढ़कर ऊपर चढ़ते ही पहला कमरा… एक पलंग पर आराम फरमाती मिलीं साठ से ऊपर की शकीला जी… जी हां, वही खासी लोकप्रिय कव्वाल…. जिनके जलवे किसी जमाने में सात समंदर पार तक हुआ करते थे… यूसुफ साहब यानी दिलीप कुमार भी जिनके अंदाज पर फिदा हुए….


‘अब ये छोड़ दिया है, तुझपे चाहे जहर दे या जाम दे….सरीखी दिलकश कव्वाली के जरिये संगीत प्रेमियों की जुबां पर छा गईं शकीला जी की तंगहाली और खराब सेहत देखना वाकई दुखद था हमारे लिए… भोपाल गैस कांड के दौरान वहां रहने पर उन्हें उसका असर हुआ.. आवाज पर सबसे ज्यादा… उन्होंने बताया…


बम्बई में शुरुआत के बारे में बताते हुए उनकी आँखों में आंसू थे… ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘जागीर में शकीला जी नायिका रहीं… शैख मुख्तार जैसे हीरो के साथ… रॉकेट टार्जन, बादशाह… के बाद…. संजीव कुमार रेहाना सुल्तान की ‘दस्तक…. रणधीर कपूर बबीता की ‘हमराही… दारासिंह जी की ‘रुस्तम ए बगदाद आदि कई फिल्मों में वो सहनायिका या चरित्र भूमिका में रहीं… फिल्मों में उनकी कव्वाली भी ली गईं… बातचीत करते हुए खांसी का दौरा सा आया और…..उनसे बोला ना गया… इंटरव्यू अधूरा रह गया…हम लोग कुछ देर उनके पास बैठे, फिर बाद में मिलने का बोल कर इजाजत ले ली…..खराब सेहत के चलते .. 2002 में उनका इन्तेकाल हो गया।


कैफ भोपाली साहब से मुलाकात उनके पुराने भोपाल के निवास पर हुईं..ढेर सारी बातें हुईं उनसे….तमाम किस्से सुनाये उन्होंने…मेरे एक कार्यक्रम में वो रविंद्र भवन पधारे।

राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा जी की माताजी श्रीमती सम्पतबाई शर्मा जी ने उन्हें और फिल्म लेखक निर्देशक रूमी जाफरी सहित आठ हस्तियों को मेरी माताजी की स्मृति में सम्मान प्रदान किया। ‘पाकीजा के गीत ‘चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो..Ó ने कैफ साहब को बम्बई में रातों रात मशहूर कर दिया था…उनकी बेटी परवीन कैफ भी शायरी करती हैं… और खासी एक्टिव हैं।

एक और बेहद मकबूल शायर जनाब असदुल्लाह खान उर्फ असद भोपाली साहब के दीदार भी… भोपाल में बुधवारे से जहांगीराबाद की और जाते हुए…काली माता मंदिर से पहले स्थित उनके मकान पर बेहद बीमार हाल में हुए। बम्बई में रहते हुए उन्हें 1990 में लकवे का अटेक आया और परिवार वाले उन्हें भोपाल लेकर आ गए थे… दो शादियों से… उनके नौ बेटे बेटियां हैं… पहली बीवी आयशा जी से बेटे ताज और ताबिश… उनकी छह बहने… दूसरी बीवी से बेटे गालिब असद भोपाली… जो जाने माने स्क्रीनराइटर हैं।

बेटे ताबश जी ने मुलकात के दौरान बताया कि उनके अब्बाजान को लोग…’मैंने प्यार किया के गीत ‘दिल दीवाना, बिन सजना के माने ना.Ó….के गीतकार बतौर जानते हैं। जिसमें उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड मिला। जबकि उन्होंने हिंदी फिल्मों में पांच सौ से ज्यादा गाने लिखे हैं। चार सौ गाने तो सिर्फ संगीतकार ऊषा खन्ना जी ने ही कम्पोज किये…लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी की पहली ही सुपरहिट फिल्म ‘पारसमणिÓ का मशहूर गीत… ‘वो जब याद आये, बहुत याद आये… असद साहब की कलम का कमाल है। उन्होंने बताया कि सन् 1949 से 1990 तक यानी आखिरी दम तक उनके वालिद साहब की कलम बराबर चलती रही। असद साहब के बड़े बेटे गालिब असद भोपाली ने टीवी शो ‘चंद्रकांता के टाइटल गीत के अलावा… कई फिल्मों की पटकथा संवाद निकले हैं। ‘सी आई डीÓ सरीखे लोकप्रिय शो की तमाम स्टोरीज उन्होंने लिखी हैं….आज भी खूब सक्रिय हैं गालिब भाई… उनके वालिद जनाब असद साहब 1992 में इन्तेकाल फरमा गए।

लखनऊ के पास के कस्बे खैराबाद से भोपाल आकर बसे जां निसार अख्तर साहब के बेटे जावेद साहब का नाम भी भोपाली शायरों में इसलिए लिया जाता है कि उनकी पढ़ाई सैफिया कॉलेज में हुईं और भोपाल के अदबी मुशायरों से ही उनकी शायरी का आगाज भी हुआ। मंजर भोपाली इन सबमें सबसे युवा नाम है पर उनकी ख्याति देश से ज्यादा परदेस में है। मुशायरों के मंच लूट लेने में मंजर साहब को खासी महारत हासिल है। उनके भाई साजिद रिजवी साहब भी शायर और लेखक हैं। दूरदर्शन भोपाल में उम्दा पोस्ट पर काम कर रहे हैं। बुधवारा चौक के पास उनके दौलतखाने पर जाने का मेरा सौभाग्य रहा है।


मंजर भाई के अलावा.. ताज भोपाली, शेरी भोपाली…. अख्तर सईद साहब जैसे बड़े नामों की लम्बी फेहरिस्त है, जिन्होंने फिल्मों से इतर…खुद को मुशायरे के मंचों तक दायरे में रखा।

बशीर बद्र साहब मेरठ को अलविदा कहकर भोपाल आ बसे तो यहां की तहज़ीब, मेहमाननवाजिश और अपनेपन की तमाम ख़ुसूसियतों ने उन्हें मेरठ के हादसे को भुलाने में कसर ना छोड़ी… उर्दू अकादमी में सदर रहते हुए बशीर साहब और बेग़म साहिबा से मुलाक़ात का योग बना… उनका एक शेर आज के हालात पर मौजूं है…

‘दुश्मनी का कदम एक कदम.. दो कदम
हम भी थक जायेंगे, तुम भी थक जाओगे..
अपनी तरह के अनूठे, भोपाल के ही शायर दुष्यंत कुमार के जिक्र बिना ये कॉलम अधूरा होगा…उनका ये एक शेर ही भोपालियों की…. बेशुमार कामयाबी को समर्पित माना जा सकता है।

‘कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं होता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों..

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