बासु चटर्जी… उनकी फिल्मों में दर्शक खुद को तलाशते हुए

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बासु चटर्जी, एक ऐसे अनूठे फिल्मकार रहे हैं, जिन्होंने परिवार के मनोविज्ञान को बेहद बारीकी से जांचा और अपनी तमाम फिल्मों में मध्यवर्गीय या उच्च मध्यवर्गीय घरों की रोजमर्रा की बातों के ताने बाने से ऐसी पटकथाएं बुनीं जो दर्शक को तकरीबन खुद के आसपास की सी लगती रहीं।

  • राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक

उठें..सबके कदम, देखो रम पम पम / कोई ऐसा गीत गाया करो../ कभी ख़ुशी कभी ग़म.. ता रा रम पम पम.. /हंसो और हंसो और हंसाया करो..

बासु चटर्जी, एक ऐसे अनूठे फिल्मकार रहे हैं, जिन्होंने परिवार के मनोविज्ञान को बेहद बारीकी से जांचा और अपनी तमाम फिल्मों में मध्यवर्गीय या उच्च मध्यवर्गीय घरों की रोजमर्रा की बातों के ताने बाने से ऐसी पटकथाएं बुनीं जो दर्शक को तकरीबन खुद के आसपास की सी लगती रहीं। ऊपर वाला गीत उनकी ऐसी ही एक फिल्म ‘बातों बातों में से है। ‘खट्टा मीठा का वो दृश्य याद कीजिये, जब बम्बई में एक परिवार को बेघर कर दिया जाता है और सारे सदस्य नये घरोंदे की व्यवस्था होने की आशाओं में सामान सहित सड़क के किनारे बैठे हैं और पार्श्व में गीत बज रहा है-थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है/जिन्दगी फिर भी खूबसूरत है।

अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी को लेकर बनाई गई ‘मंजिल में एक दृश्य याद आता है। मौसमी चटर्जी सड़क पर पैदल जा रही हैं। उन्हें महसूस होता है कि कोई उनका पीछा कर रहा है। एक आम महिला के माथे पर अजनबी आदमी को लगातार अपने पीछे आते देख कर होने वाली स्वाभाविक घबराहट का चित्रण इस खूबी से बासु दा ही कर सकते थे। ‘कमला की मौत, ‘चमेली की शादी जैसी कई सारी अलग कथावस्तु वाली छोटे बजट की फि़ल्में उनकी उपलब्धियों के खाते में शामिल हैं।

बिमल रॉय साहब के दामाद बासु भट्टाचार्य के सहयोगी बतौर अपना कॅरियर शुरू करने वाले बासु चटर्जी साहब ने अपनी लगभग हर फिल्म में आम जिन्दगी की आम परेशानियों के हल अपने ही आसपास खोजने और हर हाल में खुश रहने का फ़लसफ़ा पेश किया। ‘रजनीगंधा, ‘छोटी सी बात, ‘चितचोर, ‘पिया का घर, ‘प्रियतमा, ‘लाखों की बात, ‘खट्टा मीठा, ‘बातों बातों में, ‘मनपसंद.. एक बहुत लम्बी फेहरिस्त है बासु दा की फिल्मों की, जिन्हें दर्शकों के हरेक तबके ने खूब पसंद किया।

रंगमंच के धुरंधरों को लेकर ‘एक रुका हुआ फैसला

बासु दा की प्रायोगिक फिल्म है जिसमें एसएम जहीर, एमके रैना, केके रैना, पंकज कपूर और अन्नू कपूर सरीखे दिग्गज कलाकार किसी मामले की तह तक पहुँचने की कोशिश में हैं। एक ही छोटे से हॉल में गोल मेज के इर्द गिर्द बैठकर बहस को इन काबिल अभिनेताओं ने अपनी बॉडी लेंग्वेज के जरिये बोरिंग नहीं होने दिया। बासु दा इस कन्टेट को दिलचस्प बनाने में कामयाब रहे। बेहद सामन्य ढंग से रहते हुए तड़क भड़क से दूर चुपचाप अपने काम को अंजाम देने वाले बासु दा से, 1988 में मुझे मिलवाया उनके अजीज कलाकार देवेंद्र खंडेलवाल जी ने।

तब अँधेरी -बांद्रा हाइवे पर मौजूद सेठ स्टूडियो में गुरुदत्त साहब के भाई आत्माराम जी के ऑफिस के ही एक हिस्से में हुआ करता था बासु चटर्जी साहब का छोटा-सा मगर सोबर किस्म का ऑफिस। खुद की कुर्सी टेबल के सामने चार पांच कुर्सियां आगंतुकों के लिए, पीछे खुली आलमारी और रैक्स में उनकी मशहूर फिल्मों को मिली ट्रॉफीज की बड़ी सी कतार लगी हुई थी।

साइड की दीवारों पर ‘खट्टा मीठा ‘मंजिल आदि फिल्मों के बड़े बड़े पोस्टर्स फ्रेम में फिट कर लगे हुए थे। देवेंद्र जी ने मप्र के अपने भाई, फि़ल्म पत्रकार, समीक्षक के नाते परिचय देते हुए मुलाक़ात करवाई.. बेहद आत्मीयता से मिले। अपने टिफिन का खाना हम लोगों से शेयर करने के बाद बासु चटर्जी साहब ने, बिमल दा से बासु भट्टाचार्य तक अपनी शुरुआत से वर्तमान तक की कहानी विस्तार से सुनाई।

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