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बाजी जात बुंदेल की राखो लाज

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बुंदेलखंड को मुगलों से मुक्त कर छत्रसाल ने देसी राज्य की स्थापना की। मात्र उन्नीस साल की आयु में उन्होंने मुगलों के लिए काम करने वाली टुकड़ी में शामिल होकर जो देखा, उसका उनके मन पर गहरा असर हुआ और उन्तीस साल की आयु में वह शिवाजी के पास चले गए। वहां से नए संकल्प के साथ लौटे। बाजारीव प्रथम को मदद के लिए बुलाया और दत्तक पुत्र माना। बुंदेलखंड अथवा मध्यभारत की मुगल मुक्ति कथा के तीन अदम्य नायक हैं-छत्रसाल, मुहम्मद शाह बंगश (जिसे आप खलनायक भी कह सकते हैं। ) और बाजीराव प्रथम। इनकी कहानी बहुत रोमांचक है और सिनेमाई पर्दे से कुछ अलग है। प्रस्तुत लेख में नायक और खलनायक की कहानी जिसने स्वतंत्रता के विचार को मजबूत किया।

  • समीर पाठक

छत्रसाल अपने सभी किले एक-एक करके हार चुके थे। इस बुंदेला महानायक के लिए जैतपुर आखिरी गढ़ बचा था। दतिया और चंदेरी के बुंदेला राजाओं ने मदद करने से मना कर दिया था। हताशा में इस वयोवृद्ध योद्धा ने पेशवा बाजीराव प्रथम को एक पत्र लिखा, इन पंक्तियों के साथ, जो अब लोकोक्तियों का हिस्सा है : जो गति ग्राह गजेन्द्र की सो गति भई है आज। बाजी जात बुन्देल की बाजी राखो लाज।। आठ दशकों के जीवन में इतिहास के कई पड़ाव देख चुके छत्रसाल को शायद खुद भी अंदाजा नहीं होगा कि उनके इस पत्र के बाद इतिहास कितनी बड़ी करवट लेने वाला है। बाजीराव आए और मुगलों के छक्के छुड़ाए।


छत्रसाल ने बाजीराव को अपना दत्तक पुत्र माना और अपने राज्य का लगभग एक तिहाई हिस्सा देने का वचन दिया। दिसंबर 1731 में छत्रसाल की मृत्यु हुई लेकिन उनका एक सपना पूरा हो गया। 1728 और 1729 के बीच एक साल के अंतराल में, पूरा मध्यभारत मुगल नियंत्रण से बाहर हो गया था, जो फिर वापस नहीं लौटा।


इस करतबगार कवि-योद्धा ने अपने लंबे जीवन में बुंदेलखंड को एक अभूतपूर्व मुकाम पर पहुंचाया। कई मायनों में उनकी जीवनयात्रा उनके आदर्श शिवाजी के जैसी ही रही। शिवाजी की सलाह ने उनके जीवन की राह बदल दी थी। बुंदेलखंड के परिदृश्य और बुंदेली लोकोक्तियों में छत्रसाल के विशाल पदचिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं। यथार्थ में घटी यह कहानी सिनेमा में दिखाई गई कहानी से बहुत अलग और रोमांचक है।


यह कहानी है 79 साल के एक अथक बुंदेले की, उसके मुकाबले में खड़े एक अदम्य पठान की, बुंदेलखंड के गढिय़ों, किलों, जंगलों और बीहड़ों में दो साल तक चले एक घमासान युद्ध की, उस युद्ध में हुए अनगिनत बलिदानों की, और यह कहानी है 28 साल के एक उदीयमान योद्धा के रणनीतिक और राजनैतिक कौशल की। उत्तरप्रदेश में झांसी से लगभग 150 किलोमीटर पूर्व में जैतपुर कस्बा है। जैतपुर में, 1728-29 की सर्दियों में 79 साल के महाराजा छत्रसाल बुंदेला मुहम्मद शाह बंगश की घेराबंदी में फंसे हुए थे। पिछले दो सालों में उन्हें पराजय ही झेलनी पड़ रही थीं।

मोहम्मद खान बंगश था भाड़े का योद्धा

18वीं शताब्दी में प्रसिद्धि के एक पश्तून (पठान) योद्धा था। मुहम्मद खान को मुगल दरबार में बड़ा पद मिला था। अपने शुरुआती दिनों में मुहम्मद खान बंगश, यासीन खान बंगश की सेना में काम करता था। हर साल, मानसून के बाद, यासीन खान 4-5 हजार की सेना के साथ यमुना पार करता था और अलग-अलग राजाओं को अपनी सेवाएं देता था। बुंदेला रियासतें आपसी युद्धों में इन पठान योद्धाओं को भाड़े पर रखा करती थीं।

ऐसे ही एक अभियान में यासीन खान की युद्ध के मैदान में मृत्यु हो गई, जिसके बाद मोहम्मद खान बंगश ने अपनी खुद की सेना खड़ी की और इसी काम में लग गया। 48 साल की उम्र में उसकी किस्मत पलटी जब उसने दिल्ली के सिंहासन के लिए फर्रुखसियार की सफल मुहिम का साथ दिया। मुहम्मद शाह (रंगीला) के शासनकाल के दौरान, उसे इलाहाबाद का राज्यपाल बनाया गया। मुहम्मद शाह के दरबार में राजनीतिक सरगर्मी चलती थीं जिनमें बंगश ज्यादा माहिर नहीं था। कई दरबारी उसके पुराने चलन के कपड़ों को लेकर मजाक भी उड़ाते थे। लेकिन वह युद्ध लडऩा जानता था और इस कारण उसे प्रतिष्ठा मिलती रही।

संघर्ष के बादल

फर्रुखसियर ने बुंदेलखंड में सहंद और मौदा की जागीरें मुहम्मद शाह बंगश को सौपी थीं। बाद में कालपी और इरिच के क्षेत्र भी बंगश को सौंप दिए गए थे। उसी वर्ष के दौरान खबरें आई कि बुंदेलों ने कालपी और कुछ कस्बों को लूट लिया और एक प्रशासक को मार डाला। दुश्मन को दंडित करने के लिए दिलेर खान को एक बड़ी ताकत के साथ भेजा गया किंतु दिलेर खान और पांच सौ सैनिक मारे गए।

लगभग उसी समय बंगश को इलाहाबाद प्रांत का सूबेदार नियुक्त किया गया। इस सूबे में बुंदेलखंड का पूर्वी भाग शामिल था, जो छत्रसाल के कब्जे में था। बंगश को 1723 में छत्रसाल के खिलाफ कार्रवाई करने का बादशाह से आदेश मिला। 15, 000 की सेना लेकर बंगश ने चढ़ाई की लेकिन थोड़ी बहुत सफलता मिलने के बाद मुहिम को रोक दिया गया। 1727 में, छत्रसाल और उनके पुत्रों के खिलाफ कूच करने के लिए बादशाह का फिर से आदेश मिला?

लंबा युद्ध
1726 के अंत से छत्रसाल के पत्रों से, बंगश के होने वाले आक्रमण से निपटने की तैयारियों का विवरण मिलता है। 3 जनवरी 1727 को छत्रसाल ने अपने पुत्र जगतराज को लिखा: ‘तुम्हारे पत्र से ज्ञात हुआ कि बंगश आ गया है। वह नादपुरवा में डेरा डाल रहा है और उसने तुम्हें एक संदेश भेजकर पूछा है कि युद्ध कब करना चाहते हो। क्योंकि वह हमसे पहले से बताकर साथ लडऩा चाहता है और तुम्हें अनजाने में नहीं पकडऩा चाहता। उसने तुम्हें युद्ध की जगह चुनने को भी कहा है। उसके पास 73, 000 की फौज और 89 तोपें हैं और तुम चाहते हो कि मैं जल्द से जल्द आ जाऊं। यहाँ से हमारे निकलने का शुभ दिन मह बड़ी 9 है, इसलिए मैं यहाँ से उसी के अनुसार कूच करूँगा। मैंने 35 रॉकेट और 29 तोपें भेजी हैं जो (समय पर) पहुंच जाएंगी। मह बड़ी 7, संवत 1783, मऊ स्थान।

बंगश बुंदेलों के दरवाजे पर खड़ा था और युद्ध के लिए ललकार रहा था। बुंदेलों और पठानों के बीच लंबे संघर्ष की शुरुआत हुई। शुरू से बंगश का पलड़ा भारी रहा। युवावस्था में बंगश ने इस क्षेत्र को अच्छी तरह देख रखा था। बंगश की सेना ने लुक, चौखंडी, गढ़ काकरेली, कल्याणपुर और रामनगर के किलों पर कब्जा कर लिया। इचौली (12 मई 1728) में हुए घमासान संघर्ष में बंगश के लगभग 5, 000 और बुंदेलों के 13, 000 सैनिक मारे गए। हर युद्ध के बाद, बुंदेला सैनिक, अगले किले में चले जाते या जंगलों और घाटियों में शरण लेते। बंगश की सेना उनका पीछा करती रही।

बुंदेलों की हार, रानी भी मैदान में

जुलाई 1728 तक लड़ाई का यह सिलसिला जारी रहा, जब छत्रसाल अझनार में घिर गए। । बुंदेलों को ऐसे समय मानसून ने राहत दी। बंगश को धन की कमी भी हो रही थी और शाही दरबार से बहुत समर्थन नहीं मिल रहा था। लेकिन इसके बावजूद बंगश की मुहिम जारी रही। 1 नवंबर 1728 को बुंदेले अझनार हार गए। छत्रसाल जैतपुर के किले में चले गए। बुंदेलों के हाथ से ताराहवन का किला भी 12 दिसंबर 1728 को चला गया। ताराहवन की रक्षा में 2, 000 से अधिक बुंदेलों ने अपने प्राण दिये। अब इस युद्ध का केंद्र जैतपुर बन गया, जो लंबे समय से चले आ रहे इस संघर्ष का अंतिम पड़ाव था।

दोनों पक्षों के लिए दो साल बड़ी मुश्किलों और नुकसान में गुजरे थे। इस युद्ध के दौरान लगभग 80 वर्षीय छत्रसाल और उनके पुत्रों को चोटें आई थीं। एक समय ऐसा भी आया जब छत्रसाल की रानी जैत कुंवर ने युद्ध में मोर्चा संभाला था। दोनों तरफ के सैनिक बड़ी संख्या में मारे गए थे।

छत्रसाल के आत्मसमर्पण का फैसला

कोई उपाय न देखते हुए, छत्रसाल ने आत्मसमर्पण करने का फैसला किया। बातचीत शुरू हुई और बंगश ने मुगल सम्राट को एक संदेश भेजा जिसमें समझौते की शर्तो के लिए अनुमति मांगी गई। बंगश की अपने कैदियों को व्यक्तिगत रूप से शाही दरबार में लाने की आकांक्षा थी। छत्रसाल और उनका परिवार किले के बाहर पहाडिय़ों में डेरा डाले हुए अपनी परिणति की प्रतीक्षा कर रहा था।

दिसंबर 1728 में खबर आई कि मालवा के मुगल सूबेदार गिरिधर बहादुर को बाजीराव पेशवा के भाई चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठों ने मार दिया। बंगश के लिए मराठों की मालवा में उपस्थिति चिंता का विषय थी किंतु बंगश की अपनी जीत के प्रति आश्वस्तता इतनी अधिक थी कि पठान सेना के अनेक सैनिकों को छुट्टी पर जाने की अनुमति दे दी गई। 15 मार्च 1729 को होली आ रही थी।

छत्रसाल के पुत्रों ने अनुरोध किया कि परिवार को सूरजमऊ जाने की अनुमति दी जाए। बंगश ने अपनी मजबूत स्थिति के बारे में आश्वस्त होकर और छत्रसाल की वृद्धावस्था को देखकर अनुमति दे दी। होली से 3 दिन पहले 12 मार्च को बंगश को वह खबर मिली जिसने बंगश के नीचे की जमीन हिला दी। बाजीराव के नेतृत्व में मराठों की बड़ी सेना जैतपुर से सिर्फ 11 कोस दूर पहुंच गई थी।

शिवाजी की सीख को जीवन में उतारा छत्रसाल ने

छत्रसाल पन्ना राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने अपने माता-पिता चंपत राय और लाल कुंवर को कम उम्र में खो दिया, जब उन्होंने औरंगज़ेब की सेना के हाथों पडऩे से बचने के लिये अपने प्राण दे दिये। छत्रसाल बाद में मुगलों के सेनापति मिर्जा राजा जय सिंह के अधीन काम करने लगे। छत्रसाल ने जयसिंह के साथ 1665 में छत्रपति शिवाजी की सेना के खिलाफ पुरंदर की घेराबंदी में भाग लिया। इस युद्ध में मुरारबाजी देशपांडे के नेतृत्व में सैकड़ों मराठे सेनानी अभयदान के प्रस्तावों को ठुकराते हुए, किले के बाहर निकलकर लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 19 साल के छत्रसाल ने यह सब प्रत्यक्ष देखा होगा।

अपनी सेवाओं के फलस्वरूप छत्रसाल को जयसिंह की सिफारिश पर मुगलों से एक मनसब मिली। बाद में उन्हें बीजापुर और देवगढ़ के खिलाफ मुहिम पर भेजा गया। छत्रसाल मुगल प्रशासन के अंदर असहज महसूस करते रहे। एक दिन वह शिकार के बहाने मुगल खेमे से निकले और शिवाजी से मिलने के लिए सह्याद्रि के पहाड़ों की ओर चल दिए। पुरंदर में जो देखा था उसने युवा बुंदेला के मन पर गहरी छाप छोड़ी थी। उन्होंने शिवाजी से मिलने के लिए कठिन इलाके से एक लंबी यात्रा की और 1670-71 की सर्दियों में शिवाजी के शिविर में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया।

छत्रसाल कुछ महीने शिवाजी के साथ रहे। छत्रसाल ने बुढ़ापे में लिखे एक पत्र में शिवाजी की सेना के साथ तीरंदाजी सीखने के अपने अनुभव का गर्व से उल्लेख किया है। छत्रसाल ने शिवाजी के साथ काम करने की इच्छा जताई, लेकिन शिवाजी ने उन्हें बुंदेलखंड में मुगलों के विरुद्ध एक अलग मुहिम शुरू करने की सलाह दी ताकि मुगल सेना को दो मोर्चों पर उलझाया जा सके। छत्रसाल ने शिवाजी की सलाह मानी। कुल 25 सैनिकों और कुछ घुड़सवारों के एक छोटे से दस्ते के साथ अपने सफर की शुरुआत की। जबकि उन्हें शुरू में अन्य बुंदेला कुलों का समर्थन नहीं मिला। लेकिन औरंगजेब की धार्मिक नीति, विशेष रूप से मंदिरों को तोडऩे के अभियान ने बुंदेलों को एकजुट कर दिया। कुछ ही समय में छत्रसाल के साथ एक बड़ी सेना खड़ी हो गई। बुंदेलखंड के एक बड़े भूभाग में छत्रसाल नेअपना राज्य स्थापित करने में सफल हुए जो बंगश के आक्रमण तक बरकरार था।

(लेखक मुंबई स्थित इतिहास के अध्येता हैं।)

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