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बाबा साहब ने पत्रकारिता को बताया सामाजिक न्याय का माध्यम

  • लोकेन्द्र सिंह
    बाबा साहबडॉ. भीमराव राम अम्बेडकर ने वंचितों, शोषितों एवं महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के आंदोलनों एवं वंचित वर्ग की आवाज को बृहद् समाज तक पहुँचाने के लिए पत्रकारिता को साधन के रूप में अपनाया। उनके ध्येय निष्ठ, वैचारिक और आदर्श पत्रकार-संपादक व्यक्तित्व की जानकारी अपेक्षाकृत बहुत कम लोगों को है। बाबा साहब ने पत्रकारिता के सामने कुछ लक्ष्य एवं ध्येय प्रस्तुत किए। बाबा साहब ने वर्षों से ‘मूक’ समाज को अपने समाचारपत्रों के माध्यम से आवाज देकर ‘मूकनायक’ होने का गौरव अर्जित किया है।
    बाबा साहब भली प्रकार समझते थे कि दीर्घकाल तक चलने वाली सामाजिक क्रांति की सफलता के लिए एक प्रभावी समाचार-पत्र का होना आवश्यक है। पत्रकारिता की आवश्यकता और प्रभाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा भी था- “जैसे पंख के बिना पक्षी होता है, वैसे ही समाचार-पत्र के बिना आंदोलन होते हैं।”। मानवतावादी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने पत्रकारिता को अपना साधन बनाने का निश्चय किया और 1920 में ‘मूकनायक’ के प्रकाशन के साथ बाबा साहब ने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया। मूकनायक से शुरू हुई यह पत्रकारिता ‘बहिष्कृत भारत’, ‘जनता’ और ‘प्रबुद्ध भारत’ तक जाती है। उन्होंने मूकनायक के पहले ही अंक में लिखा- “हमारे इन बहिष्कृत लोगों पर हो रहे तथा भविष्य में होने वाले अन्याय पर उपाय सुझाने हेतु तथा भविष्य में इनकी होने वाली उन्नति के लिए जरूरी मार्गों पर चर्चा हो इसके लिए पत्रिका के अलावा और कोई दूसरी जमीन नहीं है।” इसी तरह पत्रकारिता के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए डॉ. अंबेडकर ने लिखा है- “सारी जातियों का कल्याण हो सके, ऐसी सर्वसमावेशक भूमिका समाचार-पत्रों को लेनी चाहिए। यदि वे यह भूमिका नहीं लेते हैं, तो सबका अहित होगा।”
    बाबा साहब की पत्रकारिता का प्राथमिक उद्देश्य अवश्य ही अस्पृश्य समाज की समस्याओं को उठाना और उन्हें समानता का अधिकार दिलाना था लेकिन यदि हम बाबा साहब की समूची पत्रकारिता से होकर गुजरते हैं, तो हमें ध्यान आता है कि उनकी पत्रकारिता संपूर्ण समाज और मानवता के प्रति समर्पित थी। उनकी पत्रकारिता में मानवीय संवेदनाओं के साथ राष्ट्रीय स्वर भी है। उनकी पत्रकारिता में प्रत्येक स्थान पर ‘भारत’ उपस्थित रहा। उनके समाचारपत्रों के नाम से ही इस बात को समझा जा सकता है। जब बाबा साहब ने छापेखाने की स्थापना की, तब उसका नाम भी ‘भारत भूषण’ रखा। उनकी पत्रकारिता को ‘दलित पत्रकारिता’ तक सीमित करके नहीं रखा जा सकता। यदि हम ऐसा करते हैं, तब उनके साथ और उनकी पत्रकारिता के साथ न्याय नहीं कर रहे होते हैं। बाबा साहब की पत्रकारिता को संपूर्ण समाज का सहयोग भी प्राप्त हुआ।
    बाबा साहब अपने समाचारपत्रों के माध्यम से समस्त हिन्दू समाज का प्रबोधन कर रहे थे। समतापूर्ण समाज का निर्माण करने के लिए अस्पृश्य वर्ग में आत्मविश्वास जगाना आवश्यक था और सवर्ण समाज को आईना दिखाकर उनको यह समझाना कि मनुष्य के साथ भेद करने का कोई तर्क नहीं, सब बराबर हैं। पत्रकारिता को माध्यम बना कर उन्होंने यह कार्य कुशलता एवं प्रभावी तरीके से किया। बाबा साहब का लेखन आज भी प्रासंगिक है। उनके द्वारा उठाए गए सामाजिक प्रश्न हों, आर्थिक विषय हों या फिर सांप्रदायिक एवं देश-बाह्य विचारधारों के खतरे, सब पर उन्होंने उस समय जो मार्गदर्शन किया, वह आज की परिस्थितियों में भी पाथेय है। आज की पत्रकारिता को भी बाबा साहब जैसे संकल्पित पत्रकार-संपादक चाहिए, जो पत्रकारिता के सामाजिक महत्व को जानकर पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और आजन्म समाजोत्थान के लिए ही पत्रकारिता का उपयोग करते हैं। नि:संदेह बाबा साहब ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए कई प्रतिमान स्थापित किए। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर और सामाजिक क्रान्ति की यात्रा’ में लिखा है – “भारतीय समाचार-पत्र जगत की उज्ज्वल परंपरा है। परंतु आज चिंता की बात यह है कि संपूर्ण समाज का सर्वांगीण विचार करनेवाला, सामाजिक उत्तरदायित्व को माननेवाला, लोकशिक्षण का माध्यम मानकर तथा एक व्रत के रूप में समाचार-पत्र का उपयोग करनेवाला डॉ. अम्बेडकर जैसा पत्रकार दुर्लभ हो रहा है।”

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