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आजाद हिंद फौज : सशस्त्र संघर्ष से राष्ट्र वंदना तक

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  • 21 अक्टूबर -स्थापना दिवस
  • रंजना चितले, कथाकार व स्तंभकार


आज के दिन 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज की स्थापना हुई थी। आजाद हिंद फौज यानि सशस्त्र संघर्ष से स्वतंत्रता का एक अध्याय। वस्तुत: भारत को आजाद कराने में सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम के तीन चरण प्रमुख है। पहला 1857 का मुक्ति संग्राम, दूसरा 1925 से 1931 तक चला क्रांतिकारी आंदोलन और तीसरा आजाद हिंद फौज का मोर्चा। तीनों ही आंदोलनों में एक बात समान थी। भारत के बाहर जाकर भी आंदोलन खड़ा किया जाना अथवा वैचारिक संकल्पना का आय़ाम जुडऩा।

इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में देश से पलायन कर पडोसी के सहयोग-सामंजस्य से सुनियोजित योजना बनाकर घर में आये संकट को दूर करना था। यह सामाजिक संरचना की सहज प्रवृत्ति है। जो स्वाधीनता संघर्ष में भी दिखाई दी। 1857 के प्रथम मुक्ति संग्राम व क्रांतिकारी आंदोलन में सशस्त्र क्रांति का वैचारिक पक्ष था। इसी वैचारिक पक्ष का विस्तार था आजाद हिंद फौज को विदेश में स्थापित करना। यह योजना नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने 1940 में कारवास के दौरान बनाई। जब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि सशस्त्र संघर्ष के बिना आजादी मिलना संभव नहीं है और उस समय भारत में सशस्त्र क्रांति करना असंभव था। तब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पटल पर जाने का फैसला किया।

तमाम व्यवधानों, कठिनाईयों और शारीरिक यंत्रणाओं को झेलने हुए वे बर्लिन पहुंचे। उन्होंने बर्लिन में आजाद हिंद फौज की स्थापना की। नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रांतिदृष्टा बन गये। उनकी आवाज पर लाखों हाथ साथ खड़े थे। रास बिहारी बोस को पूर्व एशिया में चलाये जा रहे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्वकर्ता मिल गया। उन्होंने 4 जुलाई 1943 को कैथे सिनेमा हाल में इस आंदोलन की कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को थमा दी।

5 अप्रैल 1943 को सिंगापुर के टाऊन हाल में आजाद हिंद फौज के सैनिकों की सलामी के बाद नेताजी ने संबोधित किया, प्रत्येक भारतवासी को गर्व होना चाहिए कि यह सेना एक भारतीय नेतृत्व में बनी है। अवसर आने पर हम युद्ध के मैदान में उतरेंगे। युद्ध का नारा होगा चलो दिल्ली, चलो दिल्ली। नेताजी ने इंडियन नेशनल आर्मी और पूर्व एशिया के भारतीयों को उनके कर्तव्य की याद दिलाते हुए अनेक बार कहा कि यदि तुम सब तीस लाख भारतीय अपना सर्वस्व यहां तक कि अपना जीवन भी अड़तीस करोड़ देशवासियों की मुक्ति के लिए दे दो तो वह भी कम है। तुम्हारे जीवन में यह स्वर्णिम अवसर है। इसे न जाने दो।

लगातार संपर्क और सैनिक संगठऩ की शक्ति ने आकार लिया इंडियन नेशनल आर्मी ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में भारत की अस्थाई सरकार बनायी। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के लिये झांसी की रानी रेजीमेंट की कमांडेंट डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन को महिला विभाग का अध्यक्ष बनाया।आजाद हिंद फौद ने 1944 में अराकन मौर्चा लिया। नेताजी ने 18 मार्च को भारत सीमा में प्रवेश कर अंग्रेजों पर हमले की घोषणा की। लेकिन इम्फाल से मात्र 18 मील दूरी पर प्राकृतिक आपदा ने मोर्चे को धवस्त कर दिया। नेताजी ने रेडियो से लोगों को आश्वस्त किया और अंग्रेजों से कोई भी समझौता न करने की अपील की।

विनाश ने तब एक और अध्याय लिखा जब 9 अगस्त 1945 को सोवियत संघ ने जापान के विरुद्ध युद्ध छेड़ा। अमेरिका ने नागासाकी और हिरोशिमा पर एटम बम गिराया। जापान के पास संपूर्ण समर्पण के सिवा कोई विकल्प न था। नेताजी ने बर्मा के पतन के बाद सोवियत क्षेत्र से युद्ध संचालित करने की योजना बनाई। 15 अगस्त 1945 को मंत्रिमंडल ने फैसला लिया और नेताजी हबीबुर्रहमान, एस.ए.अय्यर, आबादि हसन, देवनाथ दास के साथ टोक्यो गये।

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