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राष्ट्र-विरोधियों की नकेल कसने की जरूरत

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तीन दशक से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी संगठन ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की असलियत सबके सामने आ गयी है। लम्बे समय से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पाकिस्तान के इशारे पर भारत-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त है। यह आतंकवादी संगठनों का वित्तपोषण करता रहा है।

प्रो. रसाल सिंह, जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय में अधिष्ठाता, छात्र कल्याण
aloakmata7@gmail.com

पिछले लगभग तीन दशक से जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी संगठन ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की असलियत सबके सामने आ गयी है। लम्बे समय से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पाकिस्तान के इशारे पर भारत-विरोधी गतिविधियों में संलिप्त है। यह आतंकवादी संगठनों का वित्तपोषण करता रहा है। पाकिस्तान आदि भारत विरोधी देशों से प्राप्त हवाला फंडिंग इसका बड़ा आर्थिक स्रोत रही है। इसके अलावा एक और बड़े स्रोत की पुष्टि पिछले दिनों हुई है। पाकिस्तान के विभिन्न शिक्षा संस्थानों और मेडिकल-इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्सों में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का कोटा निर्धारित था। हुर्रियत के नेताओं की ‘संस्तुति’ पर कश्मीर के छात्र-छात्राओं को पाकिस्तान स्थित इन संस्थानों और पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता था।

हुर्रियत के नेता अपने लिए निर्धारित इन सीटों को 15-20 लाख रुपये प्रति सीट के हिसाब से बेचकर मोटी रकम इकी कर लेते थे। वे इस रकम और हवाला फंडिंग आदि से प्राप्त धन का प्रयोग जम्मू-कश्मीर में सक्रिय–लश्कर-ए-तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और दुख्तरान-ए-मिल्लत जैसे आतंकवादी संगठनों के वित्तपोषण के लिए करते थे। आतंकियों को धन मुहैय्या कराने के अलावा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ये नेता स्थानीय लोगों को भी सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने, सरकारी स्कूल जलाने, सरकारी संपत्ति को नष्ट करने, आतंकियों के लिए मुखबिरी करने आदि कामों के एवज में खूब धन देते थे। इस प्रकार के कामों के बाकायदा रेट तय थे।

इस सीट रैकेट का भंडाफोड़ स्तब्धकारी है। जिस थाली में खा रहे हैं, उसी में छेद करने की इससे नायाब मिसाल दूसरी नहीं हो सकती…। इस भंडाफोड़ से जम्मू-कश्मीर में होने वाली आतंकी वारदातों और अशांति में पाकिस्तान की संलिप्तता एक बार फिर साबित हो गयी है। खाते-पीते परिवारों के लिए 15-20 लाख रुपये कोई बड़ी रकम नहीं थी। वे एम बी बी एस जैसे पाठ्यक्रम के लिए खुशी-खुशी इतने रुपये दे देते थे थे। रकम इकी करने के अलावा हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं की मंशा यह भी थी कि धीरे-धीरे पाकिस्तान में पढ़े-लिखे और पाकिस्तान के हिमायती पेशेवर और उच्चपदस्थ लोगों की बड़ी जमात जम्मू-कश्मीर में खड़ी कर दी जाये।

पाकिस्तान में सस्ती शिक्षा के सब्जबाग दिखाकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी अपने बच्चों को पाकिस्तान में पढ़ाने के लिए प्रलोभित किया। दरअसल, पाकिस्तान में पढऩे वाले इन नौजवानों के साफ-सुथरे मस्तिष्क में मजहबी और भारत-विरोधी जहर भरने की कार्य योजना चल रही थी। यह जम्मू-कश्मीर को लगातार अशांत रखने और हिंसा और आतंक का वातावरण बनाये रखने की व्यापक साजिश थी। इस प्रकार की वारदातों के उदाहरण देकर ही पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर में हो रहे खून-खराबे, जुल्मोसितम और मानवाधिकारों के हनन का रोना रोता था। जबकि वास्तविकता यह है कि इनमें से अधिकांश घटनाएं पाकिस्तान-प्रायोजित होती हैं।

पिछले दो दशक के आंकड़ों से साफ पता चलता है कि एम बी बी एस जैसे प्रोफेशनल कोर्सों की सालाना 30 से 50 सीटों पर प्रवेश हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की संस्तुति पर किया जाता था। यह संस्तुति लेन-देन के आधार पर ही होती थी। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष लगभग 300 अन्य छात्रों को भी सस्ती शिक्षा के नाम पर पाकिस्तान पढऩे भेजा जाता था। इसके अलावा कुछ नौजवानों और उनके परिजनों को बड़ी रकम देकर और सब्जबाग दिखाकर छात्र वीजा पर पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर (गुलाम कश्मीर) में संचालित आतंकी कैम्पों में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता था। वे वहां प्रशिक्षित होकर आते थे और कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों के लिए काम करते थे।


जांच में यह तथ्य भी उभरकर सामने आया है कि जुलाई, 2016 में भारतीय सुरक्षा बलों के हाथों दुर्दांत आतंकी वुरहान वानी के मारे जाने के बाद कश्मीर घाटी में लम्बे समय तक जो बड़ा बबाल हुआ था, वह भी प्रायोजित था। उसके लिए उपरोक्त स्रोतों से अर्जित 5 करोड़ से अधिक रुपया खर्च किया गया था। पी डी पी की अध्यक्षा और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का सबसे चहेता युवा नेता वाहिद-उर-रहमान इन उपद्रवों का सरगना था। सुरक्षा बलों पर होने वाली पत्थरबाजी,आगजनी,तोडफ़ोड़, बंद-प्रदर्शन आदि की फंडिंग में उसकी केन्द्रीय भूमिका थी।

आतंकवादियों और आतंकी संगठनों के साथ उसके अन्तरंग संबंधों की भी पुष्टि हो चुकी है और वह लम्बे समय से जेल में बंद है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि महबूबा मुफ्ती ने उसे अपनी पार्टी से निकालना तो दूर निलंबित तक नहीं किया है। बल्कि वे अभी भी उसकी वकालत कर रही हैं। इस पृष्ठभूमि में एक बात की ओर इशारा करना आवश्यक है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं की तर्ज पर कुछ मुख्यधारा की राजनीति करने वाले कुछ नेताओं के तार भी आतंकियों से जुड़े हो सकते हैं।

सन् 1993 में गठित ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जमात-ए-इस्लामी, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फं्रट, दुख्तरान-ए-मिल्लत, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, अवामी एक्शन कमेटी, जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी, इत्तिहाद-उल-मुसलमीन, इस्लामिक स्टडी सर्किल, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस, जमीयत उलेमाए-इस्लाम, स्टूडेंट्स इस्लामिक लीग, अन्जमन-ए-तबलीग-उल-इस्लाम आदि 26 धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का समूह है। इसके नाम और इसमें शामिल संगठनों से यह भी स्पष्ट है कि यह मजहब विशेष के लोगों का संकीर्ण सांप्रदायिक सोच वाला संगठन है। गौरतलब है कि अरबी भाषा के शब्द हुर्रियत का अर्थ ‘आजादी या गुलामी से मुक्ति’ होता है। इस नामकरण से ही इस अलगाववादी गिरोह के वास्तविक मंसूबों का अंदाजा लग जाता है। इसे भारत की गुलामी से मुक्ति चाहिए।

हुर्रियत में शामिल कुछ संगठन कश्मीर का पाकिस्तान में विलय चाहते हैं तो कुछ अन्य समूह स्वतंत्र कश्मीर के पक्षधर हैं। भारत की खिलाफत उनकी आधारभूत नीति और कश्मीर में अशांति,उपद्रव और आतंक उनकी रणनीति है। भारत सरकार के खिलाफ हड़ताल, प्रदर्शन और तोडफ़ोड़ उनकी दिनचर्या रही है। वे भारतीय सैन्य बलों को सरकारी आतंकवादी कहते हैं। इनका उद्देश्य कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन, अशांति और हिंसा आदि की आड़ में कश्मीर समस्या का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना है।

यह आतंकवादियों का राजनीतिक मुखौटा है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी हिंसक गतिविधियों को मान्यता नहीं देती। ये आतंकवादियों के पनाहगार और पैरोकार हैं। सन् 2003 में स्वार्थों के टकराव और अवैध धन की बंदरबांट के चलते यह संगठन दो फाड़ हो गया था। भारत के प्रति अति आक्रामक और उग्र धड़े, जिसे कि तहरीक-ए-हुर्रियत कहा जाता है, का अध्यक्ष सैय्यद अहमद शाह गिलानी बना और अपेक्षाकृत नरम धड़े का अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारुक बना।

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