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भारत विरोधी एजेन्डा : सावधानी की जरूरत – 2 : नए-नए आवरण पहनकर आती हैं भारत विरोधी ताकतेंं

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भारत विरोधी एजेन्डा की गति इसी दौरान तेज हो गई। इसके पहले तक सोचा जा रहा था कि केन्द्र में गठबंधन सरकारों का बने रहना भारत को स्वयं ही अस्थिर कर देगा। लेकिन एन.डी.ए. के कार्यकाल में अटलजी की सूझबूझ ने इस धारणा को खंडित कर दिया और भाजपा को एक शक्तिशाली दल के रूप में उभार दिया। इससे विदेशी साजिशकर्ता चौंके। देश में कार्यरत उनकी एजेन्सियों ने नई योजना पर काम शुरू कर दिया।


कैलाशचन्द्र पन्त

भारत की राजनीतिक सामाजिक परिस्थितियों में हो रहे बदलावों के साथ ही भारत विरोधी ताकतें नए-नए आवरण पहिन कर सामने आती रही हैं। आज वह भयानक रूप से प्रकट हो रहा है। उस तस्वीर को स्पष्ट करने के लिए पुरानी घटनाओं की पृष्ठभूमि में पिछले दो दशकों की घटनाओं को याद करें। इसी क्रम में 1998 के बाद के घटनाक्रम का विश्लेषण जरूरी है। 1998 से लेकर 2004 तक देश में केन्द्र की सत्ता पर एन.डी.ए. आसीन था।

प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी थे, क्योंकि एन.डी.ए. में शामिल दलों में भारतीय जनता पार्टी के सदस्य सबसे ज्यादा संख्या में थे। इस राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एन डी ए) में अनेक दल शामिल थे, भाजपा, जदयू, अन्नाद्रमुक, अकाली दल, शिवसेना, तेलगुदेशम तथा लगभग चौबीस अन्य छोटे मोटे दल। अटलजी को इस बात का श्रेय दिया जायगा कि एक लचर गठबंधन की सरकार को सफलतापूर्वक चलाते रहे। उनके कार्यकाल में सड़क निर्माण की चतुर्भुज योजना सराही गई और कारगिल युद्ध तथा परमाणु परीक्षण महत्वपूर्ण उपलब्धि रहे।

विश्व को भारत की सामरिक शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता की जानकारी मिली। अटलजी के शासन काल में केन्द्र सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। अटलजी के पूर्व की सरकारों ने देश की आर्थिक स्थिति को किस दयनीय स्थिति में पहुंँचा दिया था इसका उल्लेख करते हुए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बी.बी. रेड्डी ने अपनी पुस्तक ‘एडवाइस एण्ड डिसेंटÓ में लिखा है- ”राजीव गांँधी के शासनकाल में भारत की ‘तिजोरी खाली’ थी। बाद में चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो 1990 में लन्दन की बैंक में 47 टन सोना गिरवी रखकर 40-50 करोड़ रूपये उधार लेने पड़े थे।”

आगे वह लिखते हैं कि मुझे दु:ख और क्रोध आता है जब देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने वाले लोग मोदी पर अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने का आरोप लगाते हैं। वह लिखते हैं कि देश के 70 वर्षों के इतिहास में पहली बार 2015-16, 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में भारत ने विश्व बैंक से कर्ज नहीं लिया। भारत विरोधी एजेन्डा की गति इसी दौरान तेज हो गई।

इसके पहले तक सोचा जा रहा था कि केन्द्र में गठबंधन सरकारों का बने रहना भारत को स्वयं ही अस्थिर कर देगा। लेकिन एन.डी.ए. के कार्यकाल में अटलजी की सूझबूझ ने इस धारणा को खंडित कर दिया और भाजपा को एक शक्तिशाली दल के रूप में उभार दिया। इससे विदेशी साजिशकर्ता चौंके। देश में कार्यरत उनकी एजेन्सियों ने नई योजना पर काम शुरू कर दिया।

वे तो भाजपा को मिलिटेण्ट हिन्दू संगठन मानते रहे थे। उसकी शक्ति में वृद्धि कैसे सहन कर पाते? 2004 के लोकसभा चुनावों के ठीक पहले बहुत से क्षेत्रीय दलों ने एन डी ए से नाता तोड़ा। चुनाव नतीजों से सभी लोग चकित थे। पर सच्चाई यही थी कि एन.डी.ए. बहुमत प्राप्त नहीं कर सका। तब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में यू.पी.ए. के गठबंधन को अवसर मिला।

मनमोहनसिंह प्रधानमंत्री बने। इस गठबंधन की सरकार दस वर्ष तक चलती रही। सभी शामिल छोटे मोटे दल दबाव की राजनीति चलाते रहे। भ्रष्टाचार और घोटालों के किस्से आम जुबान पर आ गए। भारत विरोधी एजेन्डा चलाने वालों के लिये यह स्थिति अनुकूल थी। प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जरूर थे, पर सत्ता का केन्द्र कहीं और था। विदेशी साजिशकर्ता भारत को आंतरिक रूप से कमजोर करने के लिए केन्द्र में एक दुर्बल और कमजोर सरकार ही देखना चाहते थे।

इस दौर में आतंकवादी घटनाओं में तेजी आई। सैनिक आवश्यकताओं की उपेक्षा कर दी गई। इसी बीच एक अनजान नाम अन्ना हजारे सुर्खियाँ बटोरता सामने आया। देश भर में भ्रष्टाचार विरोधी लहर उठती है। दिल्ली में प्रदर्शन होता है। इस आन्दोलन के दौरान योगेन्द्र यादव, प्रशान्त भूषण, किरण बेदी, अरविन्द केजरीवाल जैसे नाम उभरते हैं। कहाँ चले गए अन्ना हजारे? योगेन्द्र यादव? प्रशान्त भूषण? आज तक भी राजनीतिक विश्लेषक यह नहीं समझ पाए कि अरविन्द केजरीवाल एन.जी.ओ. नेटवर्क की कमान से ही अपने सारे प्रतिस्पद्धिर्यों को किनारे लगाते रहे।

यहाँ यह संकेत भर करना उचित होगा कि मोदी सरकार ने हजारों एन.जी.ओज पर पाबन्दी लगा दी है और उन्हें मिलने वाली विदेशी मदद पर प्रतिबंध लग चुका है। अनेक संगठनों की जाँच चल रही है। एन.डी.ए. के शासन के विपरीत जब यू.पी.ए. के कार्यकाल में मंत्रियों पर भारी घोटालों के आरोप लगे तो जनता का विश्वास राजनीतिक व्यवस्था पर से टूट रहा था। 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एन.डी.ए. ने पुन: सत्ता में वापसी की। यद्यपि भाजपा को अकेले ही स्पष्ट बहुमत मिल चुका था लेकिन उसने गठबंधन में शामिल दलों को साथ लेकर सरकार बनाई। इस कारण मोदी सरकार पूर्ववर्ती गठबंधन सरकारों से अलग रही। प्रधानमंत्री मोदी ठोस फैसले ले सके और उन्हें दृढ़तापूर्वक क्रियान्वित भी कर सके।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यक्षमता, प्रशासनिक कुशलता कठोर फैसले लेने के उनके स्वभाव का परिचय गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मिल चुका था। लेकिन जब प्रधानमंत्री बने तो दिल्ली में बैठा तथाकथित बुद्धिजीवी गिरोह प्रचारित कर रहा था कि मोदी को विदेशनीति की जटिलताओं की समझ नहीं है। यही गिरोह इशारों-इशारों में गुजरात के दंगों की याद करा रहा था। मोदी में तानाशाह होने की संभावना की भविष्यवाणी कर रहा था। लेकिन वे सब हैरान थे कि मोदी ने अपने प्रथम कार्यकाल में ही विदेशों में चमत्कारिक लोकप्रियता अर्जित कर ली।

अमेरिका के एक प्रसिद्ध संपादक-लेखक जोसफ हाप ने न्यूयार्क टाइम्स में लेख प्रकाशित किया था। शीर्षक था ”कौन है मोदी।। उसे भारत की जनता को पढऩा चाहिये। तब उसे समझ में आएगा कि भारत में मोदी विरोधी माहौल बनाने वाले विपक्षी दलों के विचारों का सूत्र कहांँ से संचालित हो रहा हैं? जासेफ हाप लिखते हैं- ”इस आदमी का उदय दुनिया के लिए खतरा है, क्योंकि उसने न केवल भारत के स्वार्थ के लिये एक दूसरे को दुश्मन बनाया बल्कि इसका इस्तेमाल भी किया है। यह केवल भारत के स्वार्थ को देखता है। भारत को सर्वोच्च बनाने का एकमात्र लक्ष्य यह व्यक्ति देखता है। यदि यह व्यक्जि रोका नहीं गया तो भविष्य ऐसा होगा कि पूरे विश्व का एक दिन शक्तिशाली राष्ट्र बनने के बाद भारत हमें भी आंँख दिखाएगा।

वह एक निश्चित रणनीति के साथ आगे बढ़ता है और उसकी रणनीति किसी को भी नहीं समझ आती कि वह क्या करना चाहता है। उसके हंसने वाले चेहरे के पीछे एक खतरनाक राष्ट्रवादी देशभक्त छिपा हुआ है। वह भारत के लाभ के लिए विश्व के सभी देशों का उपयोग कर रहा है।इसी लेख में आगे लिखा गया है कि इस व्यक्ति ने एशिया पर चीन और अमेरिका का प्रभुत्व समाप्त कर दिया है।…….इन सभी षडय़ंत्रों में इसी व्यक्ति की रीढ़ है और अन्य देशों के लिये भारत की ये प्रगति उचित नहीं है।

अंत में साफ तौर पर स्वीकार करता है- ”इसीलिए मैं दुुनिया के सभी बुद्धिजीवियों से चर्चा करने और सोचने भारत के विपक्ष को एकजुट होकर उसके खिलाफ देश को भड़काने के पक्ष में हूंँ। अगर संभव हो तो भारत जैसे पिछड़े देश को दुनिया की महाशक्ति बनने से रोकने का अनुरोध कर रहा हूंँ अन्यथा परिणाम संयुक्त राज्य और समूची मानव जाति के द्वारा उठाए जायेंगे।

इन अन्तिम शब्दों से स्पष्ट है कि भारतीय विपक्ष और तथाकथित डोर किसके हाथ में है और ये सब लोग क्यों एक साथ छाती कूट रहे हैं।
जोसेफ हाप की चिन्ता उस मानसिकता की अभिव्यक्ति है जो अमेरिका सहित अधिकतर पश्चिमी देशों की हैैं। वे अपनी श्रेष्ठता के दर्प में किसी भी राष्ट्र का उद्भव देखना नहीं चाहते। भारतीय संस्कृति और सभ्यता की श्रैष्ठता को स्वीकार करने के लिये उनका मानस तैयार नहीं हो पाता।

भारतीय दर्शन जहांँ मानव में एकात्मता की बात करता है, वहीं पश्चिम मानव समाज को विखंडित स्वरूप में देखता रहा है। इसीलिये यह लेखक कहता है कि मोदी भारत को दुनिया का शक्तिशाली राष्ट्र बना देगा। इस पीड़ा की पृष्ठभूमि में भारत के विपक्षी नेताओं और तथाकथित लुटियन्स विचारकों के दर्द को समझ लेना भी जरूरी है। उनकी चिन्ता यह है कि मोदी देश में उनकी प्रासंगिकता को समाप्त कर देगा।


प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले पांँच वर्षों में ही काश्मीर को भारत से अलग करने का इरादा ध्वस्त करते हुए धारा 370 हटा दी। इस कदम की घोषणा से पूर्व क्या अलगाववादियों के बयानों को भुलाया जा सकता है? उनके ही शब्द थे ”धारा 370 हटाने पर काश्मीर में तिरंगा फहराने वाला कोई नहीं मिलेगा। काश्मीर में आग लग जायगी।

दुनिया ने देख लिया कि धारा 370 हट गई और काश्मीर नये रास्ते पर चल पड़ा। पाकिस्तान के आतंकवादी दस्तों को बालाकोट और ऊरी में ऐसा सबक सिखाया कि दुनिया को बदलता भारत दिखाई देने लगा। लेकिन भारत के विपक्षी दलों को इस कठोर प्रतिकार पर भरोसा नहीं हुआ। वे सेना से सबूत मांगने तक की निल्र्लज्जता पर उतर आए थे। पर जनता देख रही है कि अब देश के ताज होटल, अक्षर धाम और काशी जैसी आतंकवादी घटनाएं बन्द हो गईं। आतंकवाद को लेकर अधिकांश देशों ने भारत की नीति की सराहना की।

राम मंदिर के निर्माण को लेकर विदेशियों से ज्यादा मुखर विरोध भारत के वामपंथियों ने ही तो किया था। कहांँ गए वो इतिहासकार और उनके पैरोकार जो अयोध्या में राम मंदिर होने पर सवालिया निशान खड़े कर रहे थे ? मंदिर विरोध में धृतराष्ट्र बने उन बुद्धिजीवियों ने तो राम के अस्तित्व को ही नकारने का दुस्साहस किया। भारतीय समाज में साकार होते राम को देखने से इंकार करते रहे। चीन की आक्रमकता का उत्तर देने वाले प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ता का परिचय क्या गलवान घाटी में नहीं मिला ? उस घटना के बाद ही आस्ट्रेलिया, जापान, द. कोरिया को यह आशा बंँधी कि चीन की आक्रमकता का उश्रर देने में भारत ही सक्षम है। आज उन देशों का विश्वास नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व पर बढ़ा है।


कोरोना जैसी महामारी का सामना करना देश की कमजोर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए संभव नहीं दिखाई देता था। लेकिन मोदी ने उपलब्ध साधनों से ही महामारी पर विजय पाने की राष्ट्र की संकल्पशक्ति को जाग्रत ही नहीं किया, एक वर्ष से कम समय स्वास्थ्य संसाधनों का विस्तार भी कर दिखाया। पूरी प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय बना दिया। एक तरफ वैक्सीन तैयार कराई तो दूसरी तरफ बिस्तरों से लेकर ऑक्सीजन की व्यवस्था की। जिस ‘टूल किट का पर्दाफाश संवित पात्रा ने किया उसके बाद ऐसा क्यों हुआ कि अस्पतालों में बिस्तरों की कमी, ऑक्सीजन की कमी, इंजेक्शन और दवाओं की कमी, श्मशान घाटों पर इंतजार करते शवों के चित्र या गंगा में बहती लाशों के समाचार आना ही बन्द हो गए?

भारत में यह जो कुछ हो रहा था उसके समाचार अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स में प्रमुखता से छप रहे थे। यह अनुभव कितना दुर्भाग्यपूर्ण था कि उन झूठी और कल्पित खबरों के आधार पर मोदी का विरोध किया जा रहा था। ऐसी महामारी के समय में विपक्षी नेताओं द्वारा भारत में विकसित वैक्सीन पर भ्रामक प्रचार किया गया था। क्या ऐसा नहीं लगता कि विपक्षी दल महामारी के विरूद्ध भारत की जंग को असफल कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकना चाहते हैं?


इन घटनाओं से सिद्ध होता है कि यह केवल नरेन्द्र मोदी का विरोध नहीं है, भारत – विरोधी अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है। प्रत्यक्ष अभिनय करने वाले किरदार भारतीय हैं, लेकिन सूत्रधार विदेशी जमीन से निर्देशित कर रहे हैं। विखण्डन की नई नई साजिशें रचते हैं। हम भारतीयों को पूरी साजिश को समझना होगा। समय पर जागना बेहतर है।

अगर नहीें चेते तो भावी इतिहास में हमारे राष्ट्र की इसी कमजोरी को प्रदर्शित किया जाएगा। क्योंकि अतीत में भी जब जब हम पराजित हुए हैं तो अपने ही लोगों के स्वार्थ और लोभ के कारण। जरूरी है कि देश के जन-जन तक राष्ट्रधर्म को पहुंँचाया जाए। राष्ट्रप्रेम में डूबे समाज को दुनिया की कोई शक्ति पराजित नहीं कर सकती। अब हमें स्पष्ट करना होगा कि भारत के राष्ट्र बोध और राष्ट्रधर्म का उस सांस्कृतिक धारा में समाहित है जो मानव ही नहीं, पशु-पक्षी ही नहीं सम्पूर्ण प्रकृति में व्याप्त परमात्मा की अनुभूति कराती है। पश्चिम के संकीर्ण ‘राष्ट्रवादÓ में उलझे लोग भारत के उदाश्र राष्ट्रधर्म को नहीं समझ सकते।
(लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं।)

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