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पंजाब में कांग्रेस ने पैर पर मारी एक और कुल्हाड़ी, अब सिर्फ पांच माह का मुख्यमंत्री

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  • अमृतसर से शम्मी सरीन

पंजाब में कांग्रेस ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है। पहली बार नहीं, बार-बार और अगले पांच महीने बाद आने वाले चुनावों के ठीक पांच महीने पहले इसे आप आखिरी बड़ा वार कह सकते हैं। इससे यह तय हो गया है कि इन चुनाव में अब उसे वापस नहीं लौटना। कैप्टन अमरिंदर सिंह यद्यपि उसके सबसे अच्छे विकल्प थे, उनके चेहरे को चुनाव में सामने रखकर ही कांग्रेस राज्य की सत्ता में आई थी। लेकिन उनकी सरकार के साढ़े चार साल और राज्य में कांग्रेस की दशा को देखते हुए स्पष्ट हो चला था कि पार्टी के सत्ता में पुनः वापसी के आसार कम हैं। उनके विकल्प की तलाश में पार्टी ने जिस तरह की कार्यशैली अपनाई, उसने इन संभावनाओं को और धूमिल कर दिया।

कैप्टन की सरकार में भ्रष्टाचार का खुला बाजार चलता रहा। यह बाजार पूर्ववर्ती सरकार में अकाली दल ने भी लगाया था लेकिन कैप्टन की सरकार में यह और ज्यादा फल-फूल गया। कैप्टन ने वीआईपी संस्कृति को खत्म करने की बात कही थी लेकिन वह भी खूब फली-फूली। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक-एक विधायक ने तीस-चालीस गनमैन रखे हैं। लूट-खसोट और अन्य आपराधिक घटनाएं बढ़ गईं। सो, लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि सांपनाथ की जगह नागनाथ आ गए।

कैप्टन की कमजोरी से ही नवजोत सिंह सिद्धू को जगह बनाने का मौका मिला। साढ़े चार साल सरकार को पटरी पर लाने में नाकामयाब आलाकमान ने नवजोत जैसे अपरिपक्व राजनीतिज्ञ को विकल्प के रूप में खड़े करने की नादान कोशिश की। सिद्धू की दिक्कत है कि वह बोलते हैं तो सब कुछ भूल जाते हैं। पंजाबी में कहावत है-एक चुप, सौ सुख। पर सिद्धू चुप नहीं रह सकते। उन्होंने पंजाब के लिए कुछ किया भी नहीं है जिसे कांग्रेस भुना सके।

इसी की वजह से कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने को अपमानित महसूस कर रहे हैं। कांग्रेस को इससे कोई विशेष लाभ नहीं मिला और स्थिति को संभालना हाथ से बाहर की बात हो गया। कांग्रेस को नेतृत्व परिवर्तन करना ही था तो इसे पहले करना चाहिए था। यदि भ्रष्टाचार से शासन बजबजा रहा था तो आलाकमान ने आंखें क्यों मूंदी थीं। अमरिंदर सिंह पर उम्र का दबाव भी था। वे 86 साल के हो चुके हैं। लेकिन कोरोना ने भी अमरिंदर की गतिविधियों और सक्रियता को सीमित कर दिया था। अब कांग्रेस को नवजोत सिंह सिद्धू के लाने से कोई लाभ नहीं मिलता दिखता और न ही अब मुख्यमंत्री के पद पर नया चेहरा लाने से फायदा होगा।

विपक्ष के तौर पर अकालियों की स्थिति देखें तो वे एक तो अपनी सरकार की खराब छवि की छाया से अब तक नहीं उबर पाए, दूसरे भाजपा से गठबंधन टूटने ने उन्हें और कमजोर किया। यही वजह है कि अब लोग तीसरे विकल्प की तरफ देख रहे हैं और आप को फिर से महत्व मिलने लगा है। कई लोग उसकी तरफ सिर्फ इसलिए देख रहे हैं कि वह इन दोनों की तुलना में उसे आजमाकर देख लेना चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी को इस दौड़ में खड़े होने के लिए समय कम बचा है इसलिए उसे जो भी रणनीति बनानी है, आगे के चुनाव के लिए बनानी होगी।

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