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अमृत महोत्सव-स्वाधीनता के स्वर: 1857 महासमर के प्रखर योद्धा शाहगढ़ के राजा बखतबली

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

शाहगढ़ के राजा बखतबली ने 1857 के महासमर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में बुन्देलखंड के सागर और दमोह जिलों से अंग्रेजों के पैर उखाड़ दिये और जनता का शासन स्थापित किया। 1857 के प्रखर योद्धा बानपुर के राजा मर्दनसिंह, तात्या टोपे और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके साथी थे।

राजा बखतबली शाहगढ़ के राजा थे। उनकी रियासत में साढ़े सात सौ गाँव थे जिसमें गढ़ाकोटा, शाहगढ़, मालथौन क्षेत्र भी शामिल था। जिनकी आय चार लाख रुपये वार्षिक थी। उस समय यह राज्य गढ़ाकोटा के नाम से जाना जाता था। सन् 1810 में नागपुर के भोंसले ने गढ़ाकोटा पर आक्रमण किया। ऐसे संकट के समय गढ़ाकोटा के राजा अर्जुनसिंह ने सिंधिया से भोंसले के विरुद्ध सहायता मांगी।

गढ़ाकोटा का आधा राज्य पाने की शर्त पर सिंधिया ने सहायता देना स्वीकार किया और भोंसले की पराजय के बाद सिंधिया ने अपने पास गढ़ाकोटा तथा मालथौन का भाग रख लिया। शाहगढ़ का भाग अर्जुनसिंह के पास रह गया उन्होंने शाहगढ़ को अपनी राजधानी बनाया। 3 जून 1842 को शाहगढ़ के राजा अर्जुनसिंह की मृत्यु हो गयी और बखतबली शाहगढ़ रियासत के राजा हुए।

बानपुर के राजा मर्दनसिंह ने शाहगढ़ के राजा बखतबली को सलाह दी कि अंग्रेजों के कब्जे वाला गढ़ाकोटा का क्षेत्र लेने के लिये दोनों मिलकर काम करें। उन्हीं दिनों झांसी के शासक गंगाधर राव की मृत्यु पर शोक संवेदना प्रकट करने के लिये दोनों राजा झांसी पहुंचे। तात्या टोपे भी वहीं मौजूद थे। यहीं गढ़ाकोटा को वापिस लेने की योजना बनाई गयी। बांदा नवाब ने भी बखतबली को मदद देने का आश्वासन दिया।

यह वह समय था जब उत्तर भारत में मुक्ति संग्राम का शंखनाद हो चुका था। 3 जुलाई 1857 की रात को बखतबली ने 500 पैदल सिपाहियों के साथ पंचमगढ़ थाने पर अधिकार कर वहां अपना थाना स्थापित किया। कुछ दिनों में ही बखतबली और उनके सहयोगियों ने अनेक स्थानों पर अधिकार कर लिया। 7 जुलाई को खुरई थाने पर व 22 जुलाई को गढ़ाकोटा पर अधिकार स्थापित किया गया। गढ़ाकोटा विजय उपरान्त बखतबली का आत्मविश्वास और बढ़ गया। रेहली, गौरझागर, देवरी पर भी क्रांतिकारियों ने अधिकार कर लिया। अंग्रेजों को पराजित करने की योजना बनाने के लिये क्रांतिकारी घने जंगलों के बीच सौरई में मंत्रणा के लिये एकत्र हुए।

बुन्देलखंड में मर्दनसिंह और बखतबली ऐसे अग्रणी योद्धा थे जिन पर क्रांतिकारियों को पूर्ण विश्वास था। इसकी कल्पना अंग्रेजों को भी थी। क्रांतिकारियों के दमन हेतु ह्यूरोज ने बुंदेलखंड में प्रवेश किया। जनवरी 1858 में उसने राहतगढ़ पर अधिकार कर लिया आगे बढ़कर 7 मार्च को उसने मड़ावरा पर कब्जा कर लिया। मड़ावरा पहुंचकर ब्रिटिश सरकार ने शाहगढ़ राज्य के लिये तत्काल जब्ती का आदेश जारी कर दिया। इस विकट परिस्थिति में बखतबली और अन्य क्रांतिकारी नेताओं को लगा कि वे झांसी की रानी, नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों से मुकाबला कर सकते हैं। जब उन्हें समाचार मिला की झांसी की रानी कालपी पहुंच गई हैं तो बखतबली, बानपुर के राजा मर्दनसिंह तथा गढ़ी के नवाब आदिल मोहम्मद खाँ भी कालपी को कूच कर गये।

28 अप्रैल 1858 को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे पांच तोपों तथा चार हजार सैनिकों के साथ कोंच पहुंचे। बखतबली और मर्दनसिंह भी तीन हजार सैनिकों के साथ कोंच पहुंचे। कोंच के युद्ध में झांसी की रानी की पराजय हुई। झांसी और कालपी के पतन के बाद बखतबली और मर्दनसिंह ईसानगर होते हुए शाहगढ़ की ओर लौट गये। दोनों राजाओं ने शाहगढ़ की सीमा में प्रवेश किया। मर्दनसिंह को 5 जुलाई 1858 और बखतबली को 6 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया। इन राजाओं को सागर जिले से निर्वासित करके लाहौर भेज दिया गया। बखतबली को लाहौर में मोरी दरवाजे के पास ‘हकीम राय की हवेली में नजरबंद रखा गया। 1873 में बखतबली को वृन्दावन लाया गया जहां 29 सितम्बर 1873 को उनका देहावसान हो गया।

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