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अमृत महोत्सव-स्वाधीनता के स्वर : दमोह में क्रांति का मोर्चा थामा हिंडोरिया के किशोरसिंह

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

हिंडोरिया मध्यप्रदेश के दमोह से 16 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व की ओर बांदकपुर रेलवे स्टेशन से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर है। मेरठ-दिल्ली की क्रांति, झांसी का युद्ध, शाहगढ़ के राजा बखतबली के क्रांतिकारी प्रयासों की सूचना मिलते ही 42वीं देशी पैदल सेना के सैनिकों ने 1 जुलाई को सागर में क्रांति की तब उस क्रांति का असर दमोह में भी हुआ।

उस समय दमोह में अजीजुद्दीन डिप्टी मजिस्ट्रेट था। 4 जुलाई की सुबह क्रांतिकारी सागर से दमोह पहुंचे। दमोह में 31वीं, 42वीं तथा 52वीं देशी पल्टन की कई कंपनियां तैनात थीं। इनमें 42वीं पल्टन की दोनों कम्पनियों के सभी सैनिकों ने क्रांति का शंख फूंका। अंग्रेज सरकार को यह भी आशंका थी कि यदि 52वीं पल्टन की दोनों कम्पनियाँ 42वीं पल्टन की कम्पनियों में मिल जाती हैं तो दमोह को बचाना मुश्किल होगा इसलिए निर्णय लिया गया कि 42वीं पल्टन के सिपाहियों को नि:शस्त्र कर दिया जावे, साथ ही 52वीं पलटन की कम्पनियों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाये। इसी कूटनीति से दमोह तथा खजाने को बचाया जा सकता है।

उस समय हिंडोरिया का जागीरदार उमराव सिंह लोधी अवयस्क था। किशोर सिंह लोधी उसके संरक्षक थे। उन्होंने दमोह जिले में क्रांति का मोर्चा थामा। क्रांति का प्रभाव देख अंग्रेज अधिकारी सपरिवार 8 जुलाई को नरसिंहपुर आ गए। दमोह खजाने को पाने में किशोर सिंह लोधी की प्रमुख भूमिका रही है किशोर सिंह की क्रांति चेतना के आगे पलटनों को लेकर अंग्रेजों की कूटनीति असफल रही। क्रांति के समय किशोर सिंह के साथ 52वीं देशी पल्टन के क्रांतिकारी सिपाही भी आ मिले। अब किशोरसिंह को और ताकत मिल गई। राजा शाहगढ़ तथा इन क्रांतिकारियों के सहयोग से किशोरसिंह 10 जुलाई को दमोह की ओर क्रांतिकारियों के साथ आगे बढ़े।

नगर में पन्ना के राजा की सेना थी। उससे क्रांतिकारियों का मुकाबला हुआ। किशोरसिंह के दल ने पहले तो पन्ना राजा की सैनिक टुकड़ी को हराया। फिर वे जेल की ओर गये, क्रांतिकारियों ने जेल के कैदियों को मुक्त कर दिया। फिर वे दमोह शहर की ओर बढ़े। उन्होंने अंग्रेजों की सरकारी इमारतों में आग लगा दी, डिप्टी कमिश्नर के ऑफिस को भी नष्ट कर दिया। अंग्रेज शाहगढ़ के राजा बखतबली, किशोरसिंह और उनके क्रांतिकारी सहयोगियों से आतंकित थे। 20 जुलाई 1857 के पत्र में कमिश्नर ने भारत सरकार को लिखा कि ”किशोर सिंह को पकड़कर उसे तुरन्त दण्ड देना जरूरी है। तथा शाहगढ़ के राजा बखतबली को पकड़े जाने के बाद फांसी पर लटका देना चाहिए और उसके राज्य को जब्त कर लेना चाहिए।

अंग्रेजी सैनिक टुकड़ी ने 21 जुलाई को हिंडोरिया के लिये प्रस्थान किया। किशोर सिंह के गाँव पर धावा बोला तथा गाँव को नष्ट कर दिया। तोपों से किशोरसिंह का महल पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। 28 जुलाई को सुबह शाहगढ़ के क्रांतिकारियों के तीन दस्तों ने, जिसमें एक हजार क्रांतिकारी थे, दमोह पर हमला बोल दिया। ब्रिटिश सेना ने क्रांतिकारियों से कड़ा मुकाबला किया।

क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा और काफी क्षति उठानी पड़ी। किशोर सिंह को जीवित या मृत गिरफ्तार करने के लिये ब्रिटिश शासन ने 1000 रुपये का पुरस्कार घोषित किया। किशोर सिंह से प्रेरित होकर दमोह के मालगुजार देवकरण ने भी क्रांति कर दी। उन्होंने दमोह के थानों पर कब्जा जमा लिया। स्थिति की विकटता को देखकर अंग्रेज अधिकारियों ने जबलपुर से सहायता मांगी। 24 अगस्त को नागपुर की सैनिक टुकड़ी दमोह पहुंची। शीघ्र ही अंग्रेजों ने बालकोट पर अधिकार कर लिया।

एक छोटा किला नष्ट कर दिया गया। उसके बाद ठाकुर किशोरसिंह के हिंडोरिया स्थित किलाबंद मकान पर आक्रमण किया गया। सैकड़ों क्रांतिकारी अंग्रेजों द्वारा पकड़कर मौत के घाट उतार दिये गये। 10 अगस्त, 1858 तक सागर-नर्मदा क्षेत्र के कमिश्नर मेजर एर्जकाइन ने दमोह जिले में शान्ति की घोषणा की। किशोरसिंह भावी क्रांति के लिये अज्ञातवास में चले गये।

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