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अमृत महोत्सव-स्वाधीनता के स्वर: बंगला उपन्यास आनंदमठ प्रकाशन दिवस, स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष वंदेमातरम्

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

जन्मभूमि की मां के रूप में पहली कल्पना ऋग्वेद में मिलती है, लेकिन ये किसी देश की भौगोलिक सीमाओं या किसी संस्कृति विशेष का केंद्र भूखंड नहीं अपितु संपूर्ण धरती के लिए है। इसलिये ही संपूर्ण वंसुधरा के निवासियों को एक कुटुम्ब माना गया उन्हें बंधु भाव के सूत्र में पिरोया गया । इसी कल्पना ने द्वितीय चरण में सांस्कृतिक राष्ट्र और तृतीय चरण में भौगोलिक देश की सीमाओं ने आकार लिया और इसी कल्पना से मातृ-वंदना वंदे मातरम् और मादरे-वतन शब्द निकले हैं।

श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसी कल्पना को अपने कालजयी गीत वंदे मातरम् मंप बांधा है। 7 नवंबर 1875 इस रचना की पूर्णता की तिथि मानी गई है। उन्होंने 1880 में वंदेमारतम् को अपने इतिहास प्रसिद्ध उपन्यास आनंद मठ में ढाला। वर्ष 1880 से 1882 के बीच बंग दर्शन में यह उपन्यास धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ। वंदेमातरम् गीत से समृद्ध उपन्यास आनंद मठ के प्रकाशन का दिवस 7 सितंबर 1882 माना जाता है। इस उपन्यास का केंद्र 1857 की असफलता का दर्द और विदेशी सत्ता के विरुद्ध संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि है।

बंकिम बाबू का निधन 8 अप्रैल 1894 को हुआ। इसके 2 साल बाद 1896 में कांग्रेस के राष्ट्रीय सभा के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने पूरे वंदेमातरम् गीत का सस्वर पाठ किया। यह अधिवेशन 28 दिसंबर को कलकत्ता के ईडन-गार्डन यानि आज के रवीन्द्र कानन में संपन्न हुआ था। वंदेमातरम् को सर्वाधिक लोकप्रियता 1905 में मिली। यह बंगाल को पृथक प्रांत बनाये जाने के विरुद्ध आंदोलन था। लोग सवेरे-सवेरे गंगा स्नान को जाते और वंदेमातरम् का जयघोष करते। 7 अगस्त 1905 को कॉलेज चौक की ऐतिहासिक सभा में वंदेमातरम् के उद्घोष से आसमान गूंज गया। महर्षि अरविंद ने वंदेमातरम् को राष्ट्रीय आंदोलन का उद्घोष माना।

1905 में बनारस में आयोजित कांग्रेस के 21वें अधिवेशन में वंदेमातरम् को राष्ट्रगीत की मान्यता दी गई। इस अधिवेशन की अध्यक्षता श्री गोपाल कृष्ण गोखले ने की। इस गीत का गायन रवीन्द्रनाथ टैगोर की बड़ी बहन स्वर्ण कुमारी की पुत्री सरला देवी ने किया था। 14 अप्रैल 1906 को कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन में जिला मजिस्ट्रेट इमर्सन ने वंदेमातरम् गाने पर रोक लगायी और जुलूसों में वंदेमातरम् गाने पर पाबंदी लगी दी गयी। कांग्रेस के इस प्रांतीय अधिवेशन में सुरेंद्रनाथ बैनर्जी और अमृत बाजार पत्रिका के संपादक मोतीलाल घोष आमंत्रित थे।

आदेश के उल्लंघन के आरोप में पुलिस ने लाठी चार्ज किया और सुरेंद्रनाथ जी गिरफ्तार कर लिये गये। 1907 में जर्मन स्थित स्टुटगार्ड के अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस के अधिवेशन में मैडम भीकाजी ने पहली बार राष्ट्रध्वज बनाया और उस पर वंदेमातरम् लिखा। इसके साथ ही प्रत्येक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, फांसी के फंदे तक जाते क्रांतिकारी के जुबान पर वंदेमातरम् आ गया। वंदेमातरम् का पहला विरोध 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन में हुआ। सभापति मोहम्मद अली ने इसे इस्लाम के विरुद्ध बताया और वे उठकर चले गये उनका कहना था कि इसमें हिंदू देवी, देवताओं की वंदना की है। इसी बात को 1937 में मुस्लिम लीग ने आगे बढ़ाया। इस विरोध के चलते 1938 में हरीपुरा कांग्रेस के अधिवेशन में दो अंतरे ही स्वीकार किये गये और वही गाये गये।

समर्थन और विरोध के बीच 25 अगस्त 1948 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संसद में कहा- स्पष्ट तथा निर्विवाद रूप से वंदेमातरम् ही भारत का प्रमुख राष्ट्रीय गीत है। यह गीत हमारे स्वतंत्रता संग्राम के साथ घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है और उसका स्थान कोई गीत नहीं ले सकता। समर्थन और विरोध को पूर्ण विराम लगाते हुए 24 जनवरी 1950 में सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में अंतिम निर्णय सुनाया कि – जन गण मन के नाम से जाने जाने वाले शब्दों और संगीत की रचना भारत का राष्ट्रीय गान है और वंदेमातरम् राष्ट्रगीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता के लिए किये गए संघर्ष में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है – जन गण मन के बराबर आदर का पात्र होगा और उसका स्थान इसके बराबर होगा। मैं आशा करता हूं कि सदस्य इससे संतुष्ट होंगे।

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