क्रांति के भामाशाह अमरचंद बांठिया

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  • रंजना चितले, कथाकार व स्तंभकार

राजस्थान की भूमि राजपूतानी शौर्य और पराक्रम के लिए पहचानी जाती रही है, लेकिन यहां एक ऐसा रणबांकुरा भी पैदा हुआ जिसने अपनी राष्ट्रभक्ति के बल पर इतिहास ही बदल डाला। बीकानेर में जैन श्वेताम्बर सम्प्रदाय में अमीरचंद बांठिया के घर जन्मे अमरचंद बांठिया ने यह साबित कर दिया कि देश की आन-बान और शान में हर जाति हर सम्प्रदाय के लोग मर मिटने को तैयार हैं।

अमरचंद बांठिया के पिता अमीरचंद का बीकानेर में पुश्तैनी व्यवसाय था। लेकिन दुर्भाग्य से कारोबार में घाटा हो गया। व्यवसाय की तलाश में अमीरचंद का परिवार भगवान श्री चिंतामणी पाश्र्वनाथ की प्रतिमा के चल समारोह के साथ-साथ ग्वालियर आ पहुंचा। प्रतिमा की स्थापना हो जाने के बाद यह परिवार ग्वालियर (लश्कर) के सराफा बाजार में ही बस गया और अपना कारोबार शुरू कर दिया। अपनी धर्मनिष्ठा और अच्छे व्यवहार के कारण जल्दी ही यह परिवार सम्मानित लोगों में गिना जाने लगा।

अमरचंद भी अपने पिता की तरह सदचरित्र, संयमी, धर्मनिष्ठ और बेहद परिश्रमी थे। उनकी कीर्ति ग्वालियर रियासत के महाराज जीवाजीराव सिंधिया तक पहुंच गई। महाराज सिंधिया जब उनसे मिले तो इतने प्रभावित हुए कि अपने विशाल खजाने गंगाजली राजकोष का कोषाध्यक्ष बना दिया। लगन और सूझ-बूझ के साथ राजकोष का संचालन करने लगे। लेकिन इतनी व्यस्ततम दिनचर्या के बावजूद भी वे मंदिर जाना और साधु, संतों के साथ सत्संग में भाग लेना नहीं भूलते थे। जब 1857 की क्रांति ने देश की चारों दिशाओं में विप्लव की चिंगारी जला दी थी। तब मध्यप्रांत में क्रांति ने विकराल रूप ले लिया था।

झांसी क्रांतिकारियों के लिए महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया था। झांसी रियासत पर कब्जा जमाने के लिए ह्युरोज की अंग्रेज सेना तैयार थी। तब झांसी के स्वाभिमान की रक्षा करने के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई रणभूमि में कूद पड़ी। ग्वालियर विजय के लिए झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, रावसाहब और मर्दन सिंह ने आपात बैठकें कर युद्ध की रणनीति बनाई। ग्वालियर की सेना रानी की ओर से लड़ी। यह युद्ध रानी ने जीता।

ग्वालियर पर रानी का कब्जा हो गया। महाराज सिंधिया अंग्रेज अफसर के साथ चले गए। इस युद्ध में विजय के लिए अनेक हाथ महारानी लक्ष्मीबाई के साथ थे। इन हाथों में दो हाथ ऐसे भी थे जो सेना के लिए जीवनदान बन गए थे। उस समय लड़ते-लड़ते सारी रसद सामग्री खत्म हो चुकी थी। कई महीनों से सैनिकों को वेतन भी नहीं दिया गया। राशन की व्यवस्था न होने से रानी की सेना कमजोर पडऩे लगी।


यह ऐसी संकट की घड़ी थी जिसका तत्कालिक कोई हल नहीं था। तभी इस विषम परिस्थिति में ग्वालियर रियासत के अर्थकोष के सचिव अमरचंद बांठिया बुंदेलखंड के भामाशाह बनकर सामने आ गए। उन्होंने मातृभूमि की रक्षा करने वाले समर्पित सैनिकों और क्रांतिकारियों के लिए पूरा कोष खोल दिया। इस विपुल धनराशि से क्रांतिकारी सैनिकों के पांच-पांच महीने के रुके वेतन और भत्ते का भुगतान किया गया। राशन का प्रबंध किया गया और पुरस्कार राशियां भी बांटी गई। यह धन राशि अमरचंद बांठिया ने 5 जून 1858 को उपलब्ध करवाई। उन दिनों सरकारी कोष से धन निकालकर क्रांतिकारियों को देने का मतलब मौत को बुलावा देना था।

यह अमरचंद बांठिया की देशभक्ति ही थी कि यह जानते हुए भी कि उन्हें इसके बदले अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा तब भी वे बिना विचलित हुए क्रांतिकारी देशभक्तों की मदद करने के लिए तत्पर हो गए। समय पर मिली इस सहायता के कारण क्रांतिकारी और सैनिकों के हौंसले बुलंद हो गए थे और उनकी मदद के बल पर रानी लक्ष्मीबाई दुश्मनों से युद्ध जारी रखने में सफल हुईं। उन्होंने रणभूमि में अंग्रेज सरकार के छक्के छुड़ा दिए।

विधि को कुछ और ही मंजूर था दुश्मन ने पीछे से घात लगाकर रानी पर वार कर दिया। घायल रानी वीरगति को प्राप्त हुईं। इस गौरवमयी इतिहास के चार दिन बाद ही 22 जून 1858 को परम देशभक्त अमरचंद बांठिया को राजद्रोह के अपराध में सराफा बाजार में ब्रिगेडियर नैपीयर ने नीम के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी।

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