अकबर की बेगम ताजबीबी थीं ‘मुस्लिम मीरा’

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अकबर की बेगम ताजबीबी को कई लोग ‘मुस्लिम मीरा मानते हैं। वे भी मीरा की तरह मान-मरजाद,कुल परंपरा को छोड़कर कृष्णप्रेम में दीवानी थीं। यहां तक कि उन्होंने अपना मजहब तक छोडऩे की घोषणा तक दी थी। दोनों के जीवन में विद्रोही अथवा क्रान्तिचेतना के दर्शन होते हैं। अंतर यह है कि ताजबीबी में मीरा की तरह तेवर नहीं है फिर भी मुसलमान होते हुए भी खुल्लमखुल्ला कृष्णप्रेम में हिन्दुआनी हो जाने की घोषणा करती हैं, यह मध्ययुगीन मुगल शासन में साहस का ही काम माना जायेगा।


राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

ताजबीबी को कई लोग ‘मुस्लिम मीराबाई’ के रूप में जानते-पुकारते हैं। दोनों के बीच व्यापक असमानताओं के बावजूद समानताएं हैं। दोनों नारी हैं और कोई सामान्य नारी नहीं हैं। एक राजवंश की है तो दूसरी भी शाही खानदान की! दोनों की अपनी-अपनी आन- मरजाद, कुल परंपरा और पन्थ है किन्तु दोनों में विद्रोही अथवा क्रान्तिचेतना समान है और दोनों की विद्रोही अथवा क्रान्तिचेतना ने समान रूप से अपनी-अपनी आन- मरजाद, कुलपरंपरा को छोडऩे की घोषणा कर दी। अपनी अपनी आन-मरजाद की रेखाओं को मिटा दिया, मीरा की विद्रोही चेतना ने निस्संकोच होकर कह दिया था कि ‘संतन ढिंग बैठि बैठि लोकलाज खोई !’ अथवा’ लोग कहें मेरा भई रे बाबरी सास कहे घर नासी रे!’

वहीं ताजबीबी मुस्लिम खानदान की हैं, वह स्वयं अपने कवित्त में अपने को मुगलानी – तुरकानी कहती हैं। ताजबीबी किसी मामूली आदमी की स्त्री नहीं हैं, बादशाह की बेगम है लेकिन चुनौती भरे स्वर में कह रही हैं ‘हों तौ मुगलानी हिन्दुवानी है रहोंगी मैं !’ मीरा ने कुलपरंपरा को छोड़ा था पर ताजबीबी कुलपरंपरा को ही नहीं, अपने मजहब को भी छोडऩे की घोषणा करती हैं और खुल्लमखुल्ला कहती हैं- ‘तजे कलमा कुरान ताजे गुनन गहूँगी मैं !’ वह कौन सा तत्व है ? अन्तश्चेतना का वह कौन सा स्तर है, जिस पर पँहुचकर वह कहती हैं कि ‘त्वाड़े नाल प्यारे हिन्दुआनी है रहूँगी मैं !’ निश्चित ही वह तत्व राग है ! प्रेम की गहनता !

ताजबीबी कह रही है-‘सुनों दिलजानी मेरे दिल की कहानी/तव इस्क की बिकानी बदनामी भी सहूंगी मैं/ देव-पूजा ठानी औ नमाज हू भुलानी / तजे कलमा कुरान सारे गुनन गहूंगी मैं/सांवला -सलौना सिरताज सिर कुल्लेदार, तेरे नेह दाघ में निदाघ है दहूंगी मैं/ नंद के कुमार कुरबान तेरी सूरत पै / हौं तौ मुगलानी हिन्दुआनी है रहूंगी मैं ।’

ताजबीबी उस प्रेम करने वाले प्रेम देवता के गुणों का गायन करती है- ‘छैल जो छबीला, सब रंग में रँगीला बड़ा/ चित्त का अड़ीला, सब देवतों से न्यारा है/ माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जोहै कान/ कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिर धारा है/दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज/ चित्त में निहारे प्रन- प्रीति करन वारा है/ नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा/वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहब हमारा है।।’

ताजबीबी निर्द्वन्द्व होकर घोषणा करती है कि ‘वृन्दावन -वारा, कृष्ण साहब हमारा है ! मेरा साहब , मेरा प्रभु तो वृन्दावन वाला ही है ! वह छैलछबीला परम सुन्दर है और सुन्दरता से प्यार करने वाला है, वह रसिक है, रसिया है ! इतना प्यारा इतना प्यारा कि चित्त में अड़ जाता है तो निकाले नहीं निकलता ! देवता तो बहुत से हैं किन्तु इस रसिया की तो बात ही निराली है ! उसके गले में वैजयन्तीमाला है, कानों में मकराकृति कुंडल हैं, नाक में बेसर है सिर पर मोरमुकुट है ! यह वही नन्द का बेटा है , जिसने पूतना तृणावर्त अघासुर बकासुर जैसे दुष्टों का संहार किया था, जो सन्तों , सज्जनों का रक्षक है , जो कंस को पछाड़ देने वाला है ! लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह प्रेम का देवता है, प्रेम करने वाला है !’ यदि हम मीरा और ताजबीबी दोनों को एक ही साथ देखने का प्रयास करें तो दोनों के बीच असमानताएं इतनी स्पष्ट हैं कि सामान्य रूप से लगता ही नहीं कि मीरा और ताजबीबी की कोई तुलना हो सकेगी !

मीरा भारत के लोकजीवन और लोकमानस की इतनी गहराइयों में व्याप्त है, जितनी गहराइयों में उसका मोल में खरीदा हुआ गिरिधर-गोबिंद व्याप्त है -‘माई मैंने गिरिधर लीयौ मोल ! कोई कहै सस्ता कोई कहै मँहगा अरी मैंने लियौ तराजू तोल !’ जब मीरा ने गिरिधर को मोल में ले ही लिया तो फिर मीरा और कृष्ण में भेद ही नहीं रहा ! उपास्य और उपासक का भेद मिट गया ! दोनों एक- रूप एक-रस हो गये ! मीरा और कृष्ण एक हो गये- राधा के भी श्याम और मीरा के भी श्याम !

भारत के भक्तिसंगीत में मीरा एक धारा या परंपरा बन चुकी हैं, जबकि ताजबीबी के संबंध में ऐसा कुछ भी नहीं कहा जा सकता। मीरा की वाणी भारत के लोकमानस के साथ एकरस हो चुकी है। मीरा की साहित्य -सम्पदा बहुत विशाल है, जबकि ताजबीबी की रचनाएं उँगली पर गिनी जा सकती हैंं। मीरा और ताजबीबी में कितना बड़ा अन्तर है? फिर भी सहित्य के अध्येताओं को ताजबीबी के प्रसंग में मीरा की याद आयी, उन्होंने वहाँ मीरा का उल्लेख किया। डॉ. सावित्री सिन्हा ने शोधनिबन्ध ‘मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ’ में लिखा कि यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि ताज अपने युग की एकमात्र सचेष्ट कलाकार थीं। मीरा की अनुभूतियों की प्रखरता कला बन गयी थी, उनकी भावनाओं के अजस्र स्रोत-प्रवाह में सुन्दर मुक्ता मिलती हैं परन्तु ताज की अनुभूतियाँ, उनकी प्रतिभा और कला के स्पर्श से कुन्दन बन गयी हैं!

सावित्री सिन्हा ने लिखा कि धर्म तथा जाति की सीमा को तोड़कर कृष्ण -प्रेम में सर्वस्व समर्पण करके ताजबीबी ने कृष्ण -रूप सौन्दर्य के प्रति नारी के सहज आकर्षण का प्रमाण दिया ! इस्लाम के एकेश्वरवाद में ताज को अपनी आध्यात्मिक -पिपासा का समाधान नहीं मिला ! ताज की रागात्मक -प्रवृत्तियों को कृष्ण के मधुर रूप का आश्रय मिलाजबकि सुमन राजे ने अपने शोधनिबन्ध ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास ‘ में लिखा कि मीरा के बाद ताज महत्वपूर्ण कवयित्री हैं ! उनमें मीरा जैसा तेवर तो नहीं है फिर भी मुसलमान होते हुए भी खुल्लमखुल्ला कृष्णप्रेम में हिन्दुआनी हो जाने की घोषणा करती हैं, यह मध्ययुगीन मुगल शासन में साहस का ही काम माना जायेगा !

सुमन राजे ने अपने शोधनिबन्ध में आगे लिखा है कि मीरा और ताज, इन दोनों के काव्य का आधार है उनका सर्वथा निजी अनुभव ! दोनों की ही प्रेमसाधना लीक से हटकर थी ! उसमें लोक और शास्त्र का विचार नहीं था लेकिन मीरा को जो संघर्ष करना पड़ा, वह ताज को नहीं। यद्यपि समर्पण और साहस की कमी ताज में कहीं नहीं है। आगे सुमन राजे सवाल भी करती हैं कि यह बात आश्चर्य में डालने वाली जरूर है कि मीरा को कृष्ण-संप्रदाय के लोगों ने जिस प्रकार गरियाया था, उन्होंने ताज का इस प्रकार समादर किया, उसका कारण क्या हो सकता था? क्या इसलिए कि ताज अकबर की पत्नी थीं और उनके साथ अकबर भी मन्दिर तक आये थे? मीरा की क्रान्तिचेतना ने राणा को चुनौती दी थी! ऐसी चुनौती कि महात्मा गांधी ने सत्याग्रह -दर्शन की चर्चा में मीराबाई का स्मरण किया था।

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