Home » आदि शंकराचार्य : अद्वैत वेदांत के जनक

आदि शंकराचार्य : अद्वैत वेदांत के जनक

  • शुभम्ा वर्मा
    आदि शंकराचार्य जी की जयंती पर उनके जीवन के विषय में चर्चा करना आज अत्यंत प्रासंगिक है क्योंकि हाल ही में ज्ञात जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक भारत दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन गया है तथा इसमें से एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है । युवा जनसंख्या को यदि सही दिशा दी जाए तो वो देश के बहुत काम आ सकती है किंतु यही जनसंख्या यदि भटक जाए तो देश का नुकसान भी हो सकता है । अतः आज आवश्यकता है युवाओं को भारत के उन आदर्शो एवं महापुरुषों के विषय में बताने की जिन्होंने अपना जीवन भारत को बनाने में लगा दिया ।
    इस देश और संस्कृति ने कई विदेशी आक्रमण झेले हैं लेकिन इसके बाद भी यहाँ ऐसे महापुरुषों ने जन्म लिया है जिन्होने अकेले अपने दम पर ही इतना कार्य किया की जो कई मनुष्यों के लिए भी संभव नहीं हो सकता है | ऐसे ही महापुरुषों के कारण ही आज यह देश और संस्कृति संरक्षित है | ऐसे ही एक महापुरुष हैं आदि शंकराचार्य जी । इनका जन्म एक ऐसी परिस्थिति में हुआ जब कई स्थानों पर बुद्ध राजाओं ने सनातन संस्कृति एवं धर्म पर प्रतिबंध लगा दिए थे । शाक्त्य, शैव, कापालिक, वैष्णव इत्यादि में भी मतभेद बढ़ गए थे तथा मीमांसको में अहंकार के लक्षण आने लगे थे । ऐसे समय के केरल के कलाड़ी क्षेत्र में आदि गुरु शंकराचार्य जी का जन्म हुआ । बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने संस्कृत, वेद, पुराण एवं उपनिषदों का पूर्ण अध्ययन कर लिया था तथा इतना ज्ञान होने के बाद भी कुछ कमी महसूस होने पर गुरु की तलाश में उन्होंने अपनी माता से आज्ञा लेकर सन्यास गृहण कर लिया । इसके बाद गुरु की तलाश में वो केरल से पैदल यात्रा पर निकले एवं उनकी तलाश पूर्ण हुई महेश्वर में आकर जहां उन्हें गुरु की प्राप्ति हुई। गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भारत भ्रमण के दौरान उन्होंने आपसी मतभेद एवं क्लेशों को जब देखा तो वेदों का सच्चा ज्ञान आमजन तक पहुंचाने हेतु उन्होंने सभी मतों से शास्त्रार्थ करना प्रारंभ किया एवं सभी मतों को शास्त्रार्थ में जीतकर अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को प्रतिपादित किया । इन्होंने भारतवर्ष में चार कोनों में चार मठों की स्थापना की, जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी ‘शंकराचार्य’ कहे जाते हैं ।
    वे चारों स्थान हैं- ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्नम, श्रृंगेरी पीठ, द्वारिका शारदा पीठ और पुरी गोवर्धन पीठ | यही नहीं इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् तथा गीता, ब्रहमसूत्र आदि पर भाष्य भी लिखा। इसके अलावा दसनामी परंपरा जिसमे सरस्वती, गिरि, पुरी, बन, पर्वत, अरण्य, सागर, तीर्थ, आश्नम और भारती उपनाम वाले गुसांई, गोसाई, गोस्वामी आते हैं ऐसे संगठन अंतरराष्ट्रीय जगतगुरु दसनाम गुसांई गोस्वामी एकता अखाड़ा परिषद की शुरूआत भी आदि शंकराचार्य जी ने करी । शंकराचार्य ने पूरे भारत में विधर्मियों द्वारा नष्ट कर दिये गए मंदिरों और शक्तिपीठों की पुनः स्थापना की । नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर इन्हीं द्वारा स्थापित किया माना जाता है। ऐसे ही शिवालिक पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों के मध्य स्थित माता शाकंभरी देवी शक्तिपीठ में जाकर इन्होंने पूजा अर्चना की और शाकंभरी देवी के साथ तीन देवियां भीमा, भ्रामरी और शताक्षी देवी की प्रतिमाओं को स्थापित किया। कामाक्षी देवी मंदिर भी इन्हीं द्वारा स्थापित है । इन सभी कार्यों एवं ऐसे अनेकों कार्यों से भारतभर में प्राचीन सनातन संस्कृति का पुनः जागरण सम्भव हो सका ।

Swadesh Bhopal group of newspapers has its editions from Bhopal, Raipur, Bilaspur, Jabalpur and Sagar in madhya pradesh (India). Swadesh.in is news portal and web TV.

@2023 – All Right Reserved. Designed and Developed by Sortd