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पिता के जीवन संघर्ष से उपजा एक प्रतिभाशाली निदेशक

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एक अजीब सी डरावनी शक्ल के पर्दे पर आते ही हमारे बालसखा ‘शेट्टी शेट्टी..’….की पुकार लगाते हुए तालियां बजाते…। शेट्टी ‘ढिशुम-ढिशुम’ करते हुए खलनायकों में सबसे अग्रणी और जनता के पसंदीदा हो चुके थे। भोपाल के पास राजगढ़ में कई दिनों तक इलाज के दौरान ठहरे थे। उनके बेटे से उनके बारे में बातचीत में उनके संघर्ष के कई पहलू खुले।

  • राजीव सक्सेना, धारावाहिक निर्माता व समीक्षक

सत्तर के दशक में स्कूल के दिनों में सरकारी प्रोजेक्टर पर इस मोहल्ले, उस गली में दिखाई जाने वाली मसाले से लबरेज फिल्मों में छुपे सन्देश को बाल मन चाहे ग्रहण नहीं कर पाया हो पर उम्र के साथ समझ ने भी दिमाग में जगह बनाना शुरु कर दिया था। फिल्मों के मुख्य किरदारों में अभिनय करने वाले और बेहद छोटे कलाकारों में कोई फर्क तब तक महसूस नहीं हुआ था। धर्मेंद्र या विनोद खन्ना…जीतेन्द्र या शत्रुघ्न सिन्हा…मारधाड़ …’ढिशुम – ढिशुम’ की आवाजों के बीच मार खाते, श्याम वर्ण के बालविहीन चिकने सिर से पहचाने जाने वाले ‘शेट्टी’ भी हम मासूम दर्शकों में कम लोकप्रिय नहीं थे। एक अजीब सी डरावनी शक्ल के साथ पर्दे पर एंट्री होते ही हमारे बालसखा ‘शेट्टी शेट्टी..’….की पुकार लगाते हुए तालियां बजाकर बाकायदा स्वागत किया करते…मानों वो आये तभी मजा आएगा न…।

के एन सिंह, प्राण, अजीत, मदनपुरी से लेकर रंजीत तक मुख्य विलैन के खास आदमी बतौर शेट्टी का काम पहले हीरो या उनके परिजनों को धमकाना, अपनी ही स्टाइल में खौफ पैदा करना होता। फिर परंपरा के मुताबिक थोड़े बहुत बचाव के हाथ पैर मारते हुए…ढिशुम ढिशुम की पाश्र्व ध्वनि के बीच हीरो से मार खाने का होता।

शेट्टी जो भी केटेगरी में गिने जाते रहे हों पर उस वक्त हम लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र जरूर थे…किसी इम्पोर्टेन्ट कलाकार से कम नहीं..मुझे याद आ रहा है, मेरे गृहनगर राजगढ़ में तब टॉकीज के नाम पर राजमहल के बरामदे में कपड़े से पैक कर अस्थायी सिनेमाघर बनाया हुआ था जो अधिकतर बंद ही रहा करता था। परिवार को बस में बैठाकर लोग, पच्चीस किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय ब्यावरा जाकर वहां के दो टाकीज में नई फिल्में देखने जाते।

सन् पचहत्तर में ‘बॉबी’ ने धूम मचा दी थी- ‘झूठ बोले कौवा काटे’.. चिकने चुपड़े ऋषि और हॉट सेंसेशन डिम्पल कपाडिय़ा को देखने का लोभ संवरण बड़े भाई बहन भी रोक नहीं पाए। बड़ों का लिहाज करते हुए, नहीं चाहते हुए भी, मुझे भी साथ लाना पड़ा था। बस से उतरकर बारह से तीन वाले शो के लिए टॉकीज की तरफ बढ़ ही रहे थे कि ब्यावरा के सरकारी अस्पताल की तरफ भीड़ उमड़ती दिखाई दी। बड़े भाई और दीदी वगैरह ने सबसे पहले मेरा हाथ थामा… किसी भगदड़ की आशंका से।

पूछने पर पता चला कि बम्बई के फिल्म कलकारों की कार की दुर्घटना हुई है और घायलों को अभी अभी वहां लाया गया है। कौन कलाकार हैं…ये किसी को नहीं मालूम था। आकर्षण या कुछ और… पर्दे वाली फिल्म तो धरी रह गईं। अस्पताल में कराह रहे होंगे। बम्बई वालों की झलक पाने का जुगाड़ भैया और उनके दोस्त बनाने में जुट गए। भीड़ और उसे सम्हालती पुलिस की वजह से अस्पताल में भीतर जाने में जब कामयाबी नहीं मिली तो आखिर फिल्म देखना ही सबको उचित लगा।

द में पता चला कि बम्बई से इंदौर के रास्ते आ रही फिल्म यूनिट में से एक गाड़ी में मशहूर खलनायक रंजीत और हमारी पसंद के शेट्टीजी थे, जो उनकी कार को एक ट्रक की टक्कर होने से घायल हो गए थे। रंजीतजी कम जख्मी थे तो पट्टी करवाकर शिवपुरी की तरफ दूसरी कार से निकल गए शेट्टी साहब वहीं अस्पताल में भर्ती थे। तब तक भीड़ छंट गई थी तो अस्पताल की खिड़की से सिर से पैर तक पट्टी से सने हुए शेट्टी साहब की झलक हम सबको मिल गई। कई दिनों तक शेट्टीजी व्यावरा के उसी सरकारी अस्पताल में पूरी तरह ठीक होने के इंतजार में भर्ती रहे।

आज फिल्म यूनिट के उस महत्वपूर्ण कलाकार के संघर्ष के बारे में सोचकर कितनी ही बातें दिमाग में आती हैं। बरसों बाद बम्बई से मुंबई बन गए महानगर में टीवी शो डायरेक्टर बतौर फिल्मसिटी में दिलवाले के सेट पर नवोदित फिल्मकार रोहित शेट्टी से इंटरव्यू के दौरान उनके सेक्रेटरी से मालूम हुआ कि रोहित, सत्तर के दशक के उन्हीं स्टंटमैन और फाइटमास्टर मधु शेट्टीजी के बेटे हैं। शॉट खत्म होने का इंतजार करते हुए बचपन की वो घटना चलचित्र के फ्लैशबैक की तरह रिवाइंड होने लगी। रोहित जी… पसीना पोंछते हुए एक कोने में छाते के नीचे हमारे पास आकर बैठे तो अपने कैमरामैन को मैंने रेडी किया। खुद एक बोतल से पानी पीने से पहले हमें ऑफर किया और बोले बीस मिनट हैं, प्लीज शार्ट में कर लीजिये।

मैंने वहीं से शुरू किया जो सोचकर रखा था। आपके पिता का संघर्ष मैंने खूब सुना है, बचपन में उनकी फिल्में भी देखीं, और चालीस साल पहले उनकी एक झलक भी देखी। अब आपसे सिर्फ वही जानना चाहेंगे कि ये मुकाम कैसे हासिल किया? मेरे डैडी को आपने कब कहां देख लिया? उन्होंने उल्टा सवाल किया तो मुझे पूरी बात बतानी पड़ी। उनकी ऑंखें चमक गई, बोले ‘बस आपके सवाल का जवाब यहीं मिल गया।।

आपको…मेरे डैडी ने सेवेंटीज की फिल्मों में हीरोज को फाइटिंग सिखाई….खुद उन्हीं से मार भी खाई… यू नो… व्हाये..? बिकाज… फाइट मास्टर के अलावा… उन्हें एक्टिंग का पैसा अलग मिलता था।’ ‘रात दिन काम काम और काम करके उन्होंने कैसे हम भाई बहनों को पाला होगा…यू कांट इमेजिन।’ वो बोलते गए… ‘उनके नहीं रहने पर हम हैंड टू माउथ कंडीशन में आ गए, आप जानते हो, कोई नहीं पूछता। माँ भी बीमार रहने लगीं, सत्रह साल की उम्र में मैंने काम करना शुरू किया। पहली इनकम… यू नो कितनी थी .. ओनली थर्टी फाइव रुपीज।

फूल और कांटे के सेट पर मुझे असिस्टेंट का काम मिला, तब तक न वीरूजी और न ही अजय देवगन को मालूम था कि मैं एक फाइट मास्टर का लड़का हूं।’ दस मिनट ज्यादा यानी आधा घंटे में रोहित शेट्टी ने अपनी स्ट्रगल से सराबोर दास्तां हमारे कैमरे के सामने बयां कर दी और खुद ‘कट’ बोलकर हँसते हुए हमसे बिदा ली। बाकी आर्टिस्ट्स के लिए हमें अगले ब्रेक का लम्बा इंतजार करना पड़ा जो शायद कामयाबी के लिए इन हस्तियों के इंतजार और सब्र के आगे नगण्य था।

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