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बदलाव की अभिलाषा से प्रेरित एक कहानी

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  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम की शानदार सफलता, राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर के प्रशासन के प्रयासों का परिणाम है

आकांक्षी जिला कार्यक्रम (एडीपी), स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, कृषि और जल संसाधन, बुनियादी ढांचे और वित्तीय समावेशन व कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में विकास के पैमाने पर भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण 112 जिलों पर केंद्रित है। यह कार्यक्रम जनवरी,2018 में शुरू किया गया था और इसकी अगुवाई स्वयं प्रधानमंत्री ने की है।

  • अमिताभ कान्त

अच्छा भोजन लोगों को या कुछ मामलों में,राष्ट्रों तक को एक साथ लाने में कभी असफल नहीं होता है। पिछली सर्दियों में, एक सुखद व आश्चर्यजनक सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत, पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले चंदौली में उगाए गए काले चावल ने ओमान और कतर में खाने की मेज पर अपनी जगह बनायी।

आकांक्षी जिला कार्यक्रम में शामिल 112 जिलों में से एक, चंदौली को ‘पूर्वांचल क्षेत्र के ‘चावल का कटोरा के रूप में जाना जाता है। क्षेत्र में धान की खेती की लोकप्रियता को देखते हुए, जिला प्रशासन ने किसानों को उर्वरक मुक्त जैविक काले चावल उगाने तथा कृषि उपज में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया। यह प्रयोग उल्लेखनीय रूप से सफल रहा,चंदौली,दुनिया में काले चावल की बढ़ती मांग को देखते हुए वैश्विक बाजार से जुड़ गया और इसने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी काले चावल का निर्यात किया।

आकांक्षी जिला कार्यक्रम (एडीपी), स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, कृषि और जल संसाधन, बुनियादी ढांचे और वित्तीय समावेशन व कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में विकास के पैमाने पर भारत के सबसे चुनौतीपूर्ण 112 जिलों पर केंद्रित है। यह कार्यक्रम जनवरी,2018 में शुरू किया गया था और इसकी अगुवाई स्वयं प्रधानमंत्री ने की है। केंद्र स्तर पर, राज्य सरकारों और जिला प्रशासन के साथ सक्रिय भागीदारी में इसे नीति आयोग द्वारा संचालित किया जाता है। इनमें से कई जिले देश के सुदूर भागों में स्थित हैं।

हालांकि, नागालैंड के किफिरे और मणिपुर के चंदेल से लेकर बिहार के जमुई और राजस्थान के सिरोही तक, ये सभी जिले चुनौतियों से पार पाने और अपनी नई कहानी लिखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। ‘आपसी तालमेल, सहयोग और प्रतिस्पर्धाÓ के तीन स्तंभों के आधार पर कार्यक्रम, विकास की शानदार कहानी प्रस्तुत करने के साथ-साथ कार्यक्रम को एक जीवंत जन आंदोलन बनाने में सफल रहा है, जिसमें 27 राज्यों और भारत की 14 प्रतिशत आबादी की भागीदारी है। चंदौली के काले चावल के प्रयोग की तरह, कार्यक्रम के कारण, इन जिलों से कई अन्य बेहतर तौर-तरीकों और सफलता की कहानियां सामने आई हैं।

कार्यक्रम की स्थापना के सिद्धांतों के साथ-साथ कार्यान्वयन रोडमैप को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरों पर व्यापक रूप से सराहा गया है। जून, 2021 में, भारत में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने कार्यक्रम पर एक स्वतंत्र मूल्यांकन रिपोर्ट जारी की। आकांक्षी जिला कार्यक्रम एक मूल्यांकन शीर्षक से, रिपोर्ट, शासन और अधिकारियों द्वारा बहु-हितधारक भागीदारी के साथ स्थानीय संरचनाओं का लाभ उठाने के सन्दर्भ में एक वैश्विक उदाहरण के रूप में कार्यक्रम की प्रशंसा करती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सतत विकास लक्ष्यों का स्थानीयकरण, एक वास्तविकता बन जाए।

यूएनडीपी आकांक्षी जिला कार्यक्रम को न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी अनुकरणीय मॉडल के रूप में चिह्नित करता है। कार्यक्रम की सफलता की यह पहली ऐसी अंतर्राष्ट्रीय मान्यता नहीं है। सितंबर,2020 में, इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस द्वारा इसी तरह का एक अध्ययन जारी किया गया था, जिसका शीर्षक था – आकांक्षी जिला कार्यक्रम का एक मूल्यांकन ।

प्रसिद्ध हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर माइकल ई. पोर्टर और एमआईटी के प्रोफेसर स्कॉट स्टर्न ने इस मूल्यांकन की प्रस्तावना में कार्यक्रम के तहत प्रत्येक जिले में शासन के विभिन्न स्तरों के बीच सक्रिय सहयोग तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के उपयोग के मॉडल की सराहना की। परिणाम-उन्मुख मेट्रिक्स और डेटा के उपयोग और हितधारक-उन्मुख दृष्टिकोण की दोनों शिक्षाविदों द्वारा बहुत प्रशंसा की गई थी।

यूएनडीपी मूल्यांकन, गुणवत्ता के साथ-साथ संख्या व मात्रा पर शोध के आधार पर तैयार किया गया है। जिलाधिकारियों और कलेक्टरों, प्रभारी अधिकारियों, ज्ञान भागीदारों, विकास भागीदारों और आकांक्षी जिला फेलो के साथ जमीनी-स्तर पर साक्षात्कार, इस शोध के आधार-स्तंभ हैं। तुलनात्मक विश्लेषण करने के लिए एडीपी के दायरे से बाहर के जिलों के कुछ जिलाधिकारियों का भी साक्षात्कार लिया गया था।

जमीनी स्तर पर, कार्यक्रम सक्रिय रूप से इन हितधारकों द्वारा संचालित है, इनमें से अधिकांश युवा,ऊर्जावान और प्रेरित भारतीय नागरिक हैं, जो कार्यक्रम के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं। इन हितधारकों के आपसी तालमेल और सहयोग से यह सुनिश्चित होता है कि कार्यक्रम का कार्यान्वयन इनपुट का विश्लेषण करता है, प्रयासों में तालमेल बिठाता है और परिणाम-प्राप्ति में तेजी लाता है।

सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिलों की मासिक रैंकिंग के साथ ‘चैंपियंस ऑफ चेंज डैशबोर्ड पर पांच फोकस क्षेत्रों के सभी 49 संकेतकों की वास्तविक-समय पर निगरानी, कार्यक्रम में प्रतिस्पर्धात्मक उत्साह जोड़ती है, जिससे जिले, अन्य जिलों से बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित होते हैं। आकांक्षी जिला कार्यक्रम फोकस के प्रमुख क्षेत्रों में विकास और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाने में सफल रहा है। यूएनडीपी मूल्यांकन, इन संकेतकों के महत्व के साथ-साथ देश भर से गूंजती जीवंत सफलता की कहानियों और सर्वोत्तम तौर-तरीकों को खूबसूरती से दर्शाता है।

सबसे पहले, स्वास्थ्य और पोषण के तहत, महिलाओं और बच्चों के लाभ के लिए सभी आकांक्षी जिलों में मॉडल आंगनवाड़ी केंद्र स्थापित किए गए हैं। अस्पतालों में सुरक्षित प्रसव की संख्या में वृद्धि हुई है, साथ ही शिशुओं में गंभीर कुपोषण की दर में गिरावट दर्ज की गई है। शिशुओं की ऊंचाई और वजन मापने के तरीकों को अब मानकीकृत किया गया है।

झारखंड के आकांक्षी जिले रांची से स्वास्थ्य और पोषण संबंधी परिणामों पर नजर रखने का एक शानदार उदाहरण सामने आया है, जिसमें एक ‘पोषण ऐप पेश किया है। यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसमें वास्तविक-समय पर डेटा विश्लेषण किया जाता है और यह जिले में बिस्तरों पर मरीज मौजूदगी, बाल-विकास चार्ट और जिले में प्रत्येक कुपोषण उपचार केंद्र में आवश्यक सामानों की उपलब्धता की निगरानी करता है। ऐप के कारण स्वास्थ्य केंद्रों में बिस्तरों पर मरीज मौजूदगी के स्तर में 90 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।

दूसरा, इन जिलों में शिक्षा संबंधी परिणामों में बड़े पैमाने पर सुधार देखा गया है। नवाचार और डिजिटलीकरण, शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन की आधारशिला रहे हैं। कई जिलों ने अपनी शिक्षा की जरूरतों को पूरा करने के लिए विशिष्ट समाधानों की दिशा में काम किया है। अरुणाचल प्रदेश के सुदूर जिले नामसाई में अपनाया गया ‘हमारा विद्यालय मॉडल एक शानदार उदाहरण है।

इस मॉडल के तहत, जिले के प्रत्येक स्कूल की निगरानी, मूल्यांकन और मार्गदर्शन सुनिश्चित करने के लिए एक स्कूल प्रभारी नियुक्त किया जाता है। यह कार्यक्रम ‘यथासर्वम नामक एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करता है, जिसे प्रौद्योगिकी भागीदार एकोवेशन द्वारा विकसित किया गया हैऔर यह प्रतिक्रियाओं को रिकॉर्ड करने के लिए एक मोबाइल ऐप से जुड़ा हुआ है। इस पहल के परिणाम स्वरूप, नामसाई में पढ़ाई के परिणामों और समग्र शिक्षण प्रथाओं में पर्याप्त सुधार दर्ज किया गया है।

तीसरा, जैसा कि चंदौली के काला चावल प्रयोग से स्पष्ट है, कृषि और जल संसाधन क्षेत्र को आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत विशेष प्रोत्साहन मिला है। जिला प्रशासन ने सिंचाई सुविधाओं और उपज में सुधार के साथ-साथ किसान शिक्षा पर बहुत जोर दिया है। आकांक्षी जिलों के स्थानीय उत्पादों को बाजार संपर्क की सुविधा देने के लिए कई नए तरीके अपनाये गए हैं। असम के एक जिले गोलपारा ने राष्ट्रीय और वैश्विक बाजारों में अपने स्थानीय और कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक ऑनलाइन ई-कॉमर्स पोर्टल, गोलमार्ट की स्थापना की है।

चौथा, इन जिलों में कनेक्टिविटी में सुधार के लिए बुनियादी ढांचा एक प्राथमिकता वाला क्षेत्र है, जिनमें से कई भौगोलिक रूप से दुर्गम इलाकों में स्थित हैं। वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिले, आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस मानक का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में बीजापुर और ओडिशा में मलकानगिरी ने रोडवेज नेटवर्क में काफी सुधार किया है और अपने अधिकार क्षेत्र में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को आगे बढ़ाया है।

पांचवां, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास स्तंभ के तहत, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ने एक अद्भुत उदाहरण स्थापित किया है। महिला स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए जिले में माइक्रो-एटीएम शुरू किए गए हैं। हर लेनदेन के बाद कमीशन आधारित आयदी जाती है। ये एटीएम,निम्न-इंटरनेट सिग्नल पर भी संचालित हो सकते हैं और इनकी मदद से नकद निकासी, जमा, मोबाइल रिचार्ज और बिल भुगतान किये जा सकते हैं।

आकांक्षी जिला कार्यक्रम की शानदार सफलता, राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर के प्रशासन के प्रयासों का परिणाम है, जिसके शीर्ष पर हमारे प्रधानमंत्री की लोगों को सशक्त बनाने की दृष्टि है। ज्ञान और विकास भागीदारों के साथ-साथ नागरिक समाज संगठनों के निरंतर समर्थन के बिना इन जिलों की परिवर्तनकारी विकास की गाथा संभव नहीं हो पाती। इस पैमाने के एक कार्यक्रम ने भारत के विकास की रूपरेखा को फिर से परिभाषित किया है और यह एक के बाद एक प्रगतिशील मील के पत्थर हासिल करते हुए कई और प्रशंसा व सराहना प्राप्त करना जारी रखेगा।
लेखक नीति आयोग के सीईओ हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं।

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