मजदूरों को राष्ट्रीय दृष्टि देने वाला मार्गदर्शक

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  • नमन राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी : जयंती 10 नवंबर

भारत के आर्थिक मामलों को स्वदेशी दृष्टि से देखने के लिए दिव्य चक्षुओं की जरूरत होगी तो हमें दत्तोपंत ठेंगड़ी याद आएंगे। भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक ने न केवल देश के श्रमिक आंदोलन को समाज और राष्ट्र की पारंपरिक सकारात्मक सोच के सांचे में ढाला अपितु स्वदेशी आंदोलन का भी प्रवर्तन किया।

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना संयोग से वर्ष 1955 में भोपाल में ही हुई थी जिसके बाद वह देशव्यापी बना। दत्तोपंतजी उस समय भारतीय आर्थिक चिंतन का मार्गदर्शन कर रहे थे जब देश पर बहुराष्ट्रीय प्रभाव और अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों का दबाव बढ़ रहा था। तब वे भारतीय स्वाभिमान वाली अर्थव्यवस्था की पुरजोर वकालत कर रहे थे। आज उनके विचार उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने पहले थे।

  • विरजेश उपाध्याय, चेयरमैन, दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड

वैश्विक पृष्ठभूमि पर विगत लगभग 150 वर्षों से विचारधाराओं के टकराव और तत्कालीन समय में दक्षिण की तरफ मुडऩे की चर्चा पर एक रोचक टिपण्णी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने की। हाल में श्री राम माधव की पुस्तक ‘द हिन्दू पैराडाईम: इंटीग्रल ह्यूमनिज्म एंड द क्वेस्ट फॉर अ नॉन-वेस्टर्न वल्र्ड के विमोचन के अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘पिछले वर्षो में दुनिया को जबरदस्ती वामपंथ की ओर धकेला गया था और अब सारी दुनिया वापस से अपने मूल स्थान की ओर जा रही है।

इस सिलसिले में ध्यान रहे कि दुनिया के लेफ्ट आन्दोलन के पीछे जो सबसे बड़ा कारण रहा, वह था मजदूर आन्दोलन पर वामपंथियों का कब्ज़ा। यह मजदूर आन्दोलन ही वह इंजन रहा जिसके जरिये पूरी दुनिया को लेफ्ट विचारधारा की ओर खींचने की कोशिश की गयी। हालाँकि यह भी सच है कि मजदूर आंदोलनों पर इस जबरन वामपंथी कब्जे को विभिन्न देशों में अलग-अलग प्रकार से चुनौती दी गयी। लेकिन इसको सही मायनों में चुनौती भारत में श्री दत्तोपंत ठेंगडी के द्वारा मिली, जिन्होंने न सिर्फ वैचारिक तौर पर बल्कि संगठनात्मक रूप से भी एक नया विकल्प देने का काम किया।

दरअसल आदिकाल से ही विश्व की उत्पादन प्रक्रिया के आधार पर विभाजन किया जाए तो मूलत: दो प्रकार की सभ्यताएं विद्यमान रहीं जिनमे जहाँ एक तरफ दास प्रथा प्रभावी रही। दासों को श्रमिक के तौर पर कोई अधिकार नहीं प्राप्त थे और वे अपने खरीदारों के द्वारा हर तरह से शोषित होने के लिए बाध्य थे, वही दूसरी व्यवस्था के तहत श्रमिकों को तत्कालीन ढाँचे के अंतर्गत योगदान करने और उसके उचित पारिश्रमिक के प्रावधान किये गये।

यूरोपीय अथवा पश्चिमी देशो के उलट विश्व के कई महाद्वीपों, विशेषत: भारतीय उपमहाद्वीप में राजतंत्रीय व्यवस्था के तहत भी स्वस्थ श्रमिक- नियोक्ता सम्बन्ध प्राचीन समय से ही रहे है जहाँ दोनों ही पक्षों के बीच सामंजस्य को प्रधानता दी गयी। अगर प्राचीन ग्रंथो को देखें तो भारत में भी प्राचीन समय से ही श्रमिक, उनके मुद्दे और हितो को लेकर जागरूकता रही है। इनके दस्तावेजों के तौर पर महाभारत का शांति पर्व और शुक्रनीति प्रमुख है।

हालांकि इन विभिन्न ग्रंथो में श्रमिक संगठनों और उनके आंदोलनों के जिस स्वरुप को वर्णित किया गया है वह वर्तमान समय के श्रमिक संगठनों से काफी अलग रहा है। जैसा कि महाभारत के शांति पर्व से विदित है कि श्रमिक सामूहिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए श्रम कौशल के विकास के द्वारा लगातार आगे बढऩे के लिए प्रतिबद्ध रहा। हालांकि भारत में मध्यकाल के दौरान पहले से चली आ रहे श्रमिक- नियोक्ता के संबंधो में भी परिवर्तन हुआ और मध्यकाल में दास प्रथा भी विदेशी आक्रमणकारियो द्वारा प्रारंभ की गयी जिसने भारतीय श्रमिको की मूल राष्ट्रीय भावना को भी प्रभावित किया जिसका असर आधुनिक काल में श्रमिकों के एक तबके के द्वारा साम्यवाद की ओर झुकाव के तौर पर दिखाई दिया।

भारतीय श्रमिको के आंदोलनों पर पडऩे वाले साम्यवादी प्रभाव से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर भी परिचित थे और भारत जैसे राष्ट्र में श्रमिकों के शत्रुतापूर्ण और विघटनकारी रवैये से होने वाली क्षति से वे भलीभांति परिचित थे। इसलिए उन्होंने भारतीय श्रमिकों में राष्ट्रीयता की भावना को फिर से जाग्रत करने के लिए श्री दत्तोपंत ठेंगडी को लगाया।

उन्होंने 1950 के दशक में भारत के अलग अलग प्रान्तों में प्रचारक के तौर पर कार्य किया और वे अपनी संगठनशीलता, मिलनसार स्वभाव और जुझारू व्यक्तित्व के लिए संघ में ही नहीं बल्कि विरोधी संगठनों में भी चर्चित रहे। उन्होंने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के पूर्व ‘गुरूजीÓ के कहने पर आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस में रहकर श्रमिक संगठन की कार्यप्रणाली और उनसे जुडी गूढ़ता को समझा और तदुपरांत1955 में भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की।

दत्तोपंतजी द्वारा राष्ट्र-हित और राष्ट्रीयता को भी प्राथमिकता दी गयी जिसकी उस समय के तमाम तथाकथित प्रगतिशील ट्रेड यूनियन के द्वारा आलोचना की जाती थी। गैर राजनीतिक और स्वायत्त ट्रेड यूनियन के रूप में कार्य करते हुए एक ही विचार से सम्बद्ध होने के बाजूद श्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में बनी भारतीय जनता पार्टी की सरकार (1998- 2004) के दौरान भी श्रमिक से जुड़े मुद्दों पर श्री दत्तोपंतजी द्वारा सरकारी नीतियों के विरूद्ध बड़ा आंदोलन किया गया।

भारतीय मजदूर संघ की 1955 में स्थापना श्री दत्तोपंत ठेंगडीजी के द्वारा दो मूलभूत आधारों को ध्यान में रख कर की गयी, पहला, श्रमिक संबंधों को मालिक और मजदूर तक सीमित न रखकर उन्हें एक विस्तृत परिवार का हिस्सा बनाना जहाँ दोनों ही पक्ष एक दुसरे के साथ शत्रुता का भाव ना रखते हुए परस्पर सहयोग की भावना के साथ कार्यरत हों। दूसरा, इसके साथ ही, श्रमिक आंदोलनों और उद्योग संबंधो को श्रमिक और मालिक तक सीमित न रखते हुए ग्राहकों को भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। इस तरह से ठेंगडीजी द्वारा उत्पादन की पूरी संरचना को संज्ञान में लिया गया जिसमे उपभोक्ता को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।

पश्चिम के प्रभाव में था भारत का मजदूर आंदोलन

भारत के विपरीत पश्चिम में दास प्रथा की प्रधानता रही और नियोक्ता और श्रमिक संबंध भारत के विपरीत लगभग शून्य रहे जिसके कारण वहां शोषण की एक परंपरा रही और इसी परंपरा ने औद्योगिक क्रांति के बाद वहां के श्रमिक संगठनों को वर्ग- संघर्ष पर आधारित होने के लिए बाध्य किया। इसलिए वहां पर श्रमिक आन्दोलन एक सम्पूर्ण अलग मानसिकता के साथ विकसित हुआ जहां दास प्रथा के प्रति डर, नियोक्ताओं/ मालिकों के द्वारा श्रमिकों का शोषण और अत्याचारों ने वहां के श्रमिको के मन में शत्रुता की भावना भरी और इस प्रक्रिया को कार्ल माक्र्स ने आगे चलकर अपने साहित्यों में ‘दुनिया के मजदूर एक हो जैसे नारों के साथ आगे बढाया और 16वी शती से यूरोप देशों के औपनिवेशिक विस्तार के साथ ही, कार्ल माक्र्स के पश्चिमी सिद्धांतो को 19वीं शती तक सम्पूर्ण विश्व के साथ ही भारत में भी लाने के प्रयास शुरू हो गये जहाँ भारत के श्रमिकों की मूल भावना को न समझते हुए, पश्चिमी विचारधारा का धड़ल्ले से प्रचार किया गया।

इन सभी गतिविधियों के बीच, भारत में आधुनिक काल में श्रमिक संगठन और आंदोलनों का विकास स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान हुआ और इसकी पृष्ठभूमि कभी भी वर्ग संघर्ष नहीं रही बल्कि यह श्रमिको को स्वतंत्रता आन्दोलन का एक प्रमुख हिस्सा बनाने की पहल थी। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन के अलग-अलग आयाम थे और सभी लोग स्वतंत्रता आन्दोलन से अलग अलग कारणों से जुड़े। भारत में किसान और मजदूर आधुनिक काल के प्रारंभ से ही राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़े रहे और इसके प्रमाण 19वी शती के अंतिम दशकों में भारत में श्रमिकों के अलग- अलग संगठनों के रूप में दिखने लगे। इसके साथ ही श्रमिकों के संगठन को श्री बालगंगाधर तिलक पर देशद्रोह के आरोप में जेल जाने को लेकर 1908 में मिल मजदूरों के हड़ताल के रूप में देखा जा सकता है।

महात्मा गाँधी के आने के साथ ही मजदूरों और किसानो को स्वतंत्रता आन्दोलन से जोडऩे और उन्हें राष्ट्रीय हितो के प्रति सचेत करने की विस्तृत स्तर पर कोशिश शुरू की गयी जहाँ गाँधीजी के द्वारा प्रारंभिक आन्दोलन किसानो के साथ ही किये गये। इसके बाद मजदूरों को भी स्वतंत्रता आन्दोलन से जोडऩे के लिए उस समय के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक प्रख्यात राष्ट्रवादी नेता, लाला लाजपत राय ने इसमें अग्रणी भूमिका निभाई और 1920 में उनके द्वारा ही आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (्रढ्ढञ्जष्ट) की स्थापना राष्ट्रवादी विचारो से की गयी। लेकिन धीरे धीरे पश्चिम के वर्ग संघर्ष और साम्यवाद के सिद्धांत ने पूरे भारतीय श्रमिक आन्दोलन को अपने प्रभाव में ले लिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि भारत में श्रमिक अपने मुद्दों और राष्ट्रीय हितों से इतर अन्य वैश्विक मसलों में घुस गये जिनका प्रत्यक्षत: उनसे कोई सम्बन्ध नहीं था। इसके साथ ही राष्ट्रीय आदर्शो ंसे प्रेरित भारतीय श्रमिक आन्दोलनों ने वर्ग संघर्ष का रुख इख्तियार कर लिया। भारतीय श्रमिकों के भ्रमित होने और राष्ट्र हत से हटने को गाँधीजी द्वारा काफी पहले ही भाप लिया गया और उनके विचारों से प्रेरित होकर अनसूया साराभाई द्वारा मजदूर महाजन संघ की स्थापना 1920 में अहमदाबाद में की गयी।

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