Home लेख भारतेंदु हरिशचंद्र की 9 सितंबर जयंती : भारतेंदु की राष्ट्र चेतना

भारतेंदु हरिशचंद्र की 9 सितंबर जयंती : भारतेंदु की राष्ट्र चेतना

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  • रंजना चितले, कथाकार व रंगकर्मी

भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम 1857 सभी देशवासियों का पराधीनता से मुक्ति के लिए साझा प्रयास था। इसी महासंग्राम के बाद स्वीधानता की कई धाराएं मुखर हुईं। हिंदी के युग प्रवर्तक भारतेदु हरिशचंद्र तब मात्र सात वर्ष के थे। नौ सितंबर 1850 में उनका जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने स्वाध्याय द्वारा ज्ञान प्राप्त किया और लगभग 20-25 भाषाएं सीखी। भारतेंदु ने पराधीनकाल में अनाचार, अत्याचार, छल, कपट, भारत की दीन-हीन आर्थिक अवस्था के मर्मान्तक, पीड़ोत्पादन, हृदय विदारक दृश्य देखे और उसकी परिछाया में बड़े हुए।

विदेशी आंक्राता भारत की संपत्ति लूट कर ले जा रहे थे। हमारे पारंपरिक व्यवसाय कौशल नष्ट हो रहे थे। अंग्रेजों के क्रूर दमन और आतंक से उपजे भय को भारतेंदु जी ने अपनी कविता वैजयन्ती में इशारे से व्यक्त करने का साहस किया। उन्होंने अपनी कलम से स्वातंत्र्य चेतना, लोकहित और समाज उद्धार की ऐसी धारा का प्रवाह किया जिसमें सभी भारतीय बहने लगे।

उनके लेखन का समय 1857 के बाद से उनके जीवंत रहने 1885 तक रहा। स्वाधीनता चेतना के भारतेंदु प्रवाह ने साहित्य सृजन के एक नवीन युग का सूत्रपात किया। उनके मन में भारत के पुरातन वैभव और वर्तमान दुर्दशा के दोनों चित्र थे। उन्होंने 1877 में भारत जननी नाटक में भारत जननी तू क्यों उदास जैसी पंक्तियों से एक नई राष्ट्रीय भावना उद्वेलित की। इस नाटक में सूत्रधार अपने आरंभिक संवाद में कहता है –
भारत भूमि और भारत संतान की दुर्दशा दिखाना ही इस भारत जननी की इति कर्तव्यता है और आज जो आर्य वंश का समाज इस खेल को देखने प्रस्तुत है, उसमें से एक मनुष्य भी यदि इस भारत भूमि के सुधारने में एक दिन भी यत्न करें तो हमारा परिश्रम सफल है।
उन्होंने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की निंदा कुछ इस तरह की –
भीतर भीतर सब रस चूसें, बाहर से तन मन धन भूसै
जाहिर वातन में अति तेज, क्यों सखि साजन, नहीं अंग्रेज

भारतेंदुजी की रचना में राष्ट्रीय भाव के साथ भारत का स्वर्णिम अतीत और वर्तमान की दुर्दशा का रेखांकन साथ-साथ चला है। पराधीन भारत की दशा पर उन्होंने लिखा –
जहं भीम करन अर्जुन की छटा दिखती,
वहं रही मूढ़ता कलह अविद्या राती
अब जहं देखहु तंह दुखहि दिखाई …,
हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई।

भारतेंदु उस युग के प्रतिनिध रचनाकार थे, उनके प्रतिनिधि नाटक भारत दुर्दशा क्रांतिकारियों के लिए एक प्रेरणा बन गया था। भारतेंदु के कालजयी नाटक अंधेर नगरी में राष्ट्रीय भाव को व्यंग्य के साथ बुना है। जिसमें भारत, अंधेर नगरी का और अंग्रेज चौपट राजा व्यवस्था का प्रतीक है। उन्होंने चने बेचने वाले पात्र से गीत के माध्यम से जन जागृति का प्रयास किया। प्रशासन के लिए चने वाले की पंक्तिया है :
चना हकिम सब जो खाते, सब पर दूनां टिकस लगाते।
इसी तरह पुलिस के लिये चूरन बेचने वाले का कटाक्ष है-
चूरन साहेब लोग जो खाता, सारा हिंद हजम कर जाता।
चूरन पुलिस वाले खाते, सब कानून हजम कर जाते।

भारतेंदु रचित नाटक के यह पात्र आमजन के बीच के पात्र हैं।
साहित्य में भारतेंदु जी की यह दृष्टि उन्हें राष्ट्र जागरण के प्रणेता के रूप में सिद्ध करती है। उनके उपन्यास पूर्ण प्रकाश और चंद्रप्रभा राष्ट्रीय जागरण के स्वर मुखरित करते है। समाज का मूल्यांकन और सूक्ष्म दृष्टि से विवेचन-विश्लेषण के साथ उनका राजनीतिक निबंध है – प्राण लेती और अंग्रेजों पर कटाक्ष करते हुए एक अन्य निबंध लिखा है अंग्रेज स्त्रोत।

भारतेंदु का राष्ट्रबोध उनकी रचनाओं के विविध आयामों में परिलक्षित होता है। भारतेंदुजी की राष्ट्रीयता पर प्रगतिवादी प्रखर आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है-भारतेंदु की महत्ता इस बात में है कि वह अंग्रेजी रात के सच्चे और कटु आलोचक थे। उनके नाटकों, कविताओं और निबंधों ने जनता को अंग्रेजी राज के अन्याय और शोषण के प्रति सचेत किया। देश का हित ही भारतेंदु के लिये सर्वोपरि था। इसीलिये उन्होंने देश की अगणित जनता के हृदय में राष्ट्रीय चेतना की लहर दौड़ाई।

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